न रखना आंख अपनी तुम
इस तरह से सदा ही नम
जरा चिंगारियों के वास्ते
स्थान भी रखना।
किसी की बात कोई सी
न आये आपके यदि मन
उसे इग्नोर कर देना
मगर अपमान मत करना।
जरा चिंगारियों के वास्ते
Comments
7 responses to “जरा चिंगारियों के वास्ते”
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बहुत ही सुंदर कविता, वाह वाह
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बहुत खूब वाह
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बहुत खूब
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बहुत सुंदर भाव , कवि सतीश जी ने किसी का भी अपमान ना करने की बहुत ही सुंदर सलाह दी है । बहुत ज्ञान वर्धक रचना
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वाह वाह बहुत खूब सर
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बहुत ही सुन्दर।👌👌
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👌👌bhut sundar
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