“दिल का बोझ”

दिल पर एक बोझ लिये घूमती हूँ
ना जाने कहाँ रहती हूँ
क्या सोंचती हूँ
दिल की बेचैनी और बढ़ जाती है
जब तेरे करीब से गुजरती हूँ
तुम्हें हो ना हो मेरी जरूरत
पर मैं तो तुझे ही खुदा समझती हूँ
हर दुआ में मांग लेती हूँ तुझको
मैं तेरे ही ख्वाब देखती हूँ

Comments

5 responses to ““दिल का बोझ””

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  3. अति सुन्दर भाव एवम् सुन्दर प्रस्तुति

  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

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