“दिल का बोझ”
दिल पर एक बोझ लिये घूमती हूँ
ना जाने कहाँ रहती हूँ
क्या सोंचती हूँ
दिल की बेचैनी और बढ़ जाती है
जब तेरे करीब से गुजरती हूँ
तुम्हें हो ना हो मेरी जरूरत
पर मैं तो तुझे ही खुदा समझती हूँ
हर दुआ में मांग लेती हूँ तुझको
मैं तेरे ही ख्वाब देखती हूँ
क्या बात है प्रज्ञा जी इतनी लाजवाब रचना बहुत खूब
अतिसुंदर
Beautiful line
अति सुन्दर भाव एवम् सुन्दर प्रस्तुति
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति