वो चली गई!
वो रात भर खांसती!
चिल्लाती!
घबराती!
फड़फड़ाती!
भुखी-प्यासी, आंसू बहाती,
अकेली तड़पती,
चलीं गईं!
छोड़ सांस ,
वो चली गई।
मगर बेटे बड़े संस्कारी!
ऐसे ना भुखा जाने देंगे,
जीते जी तो कुछ कर ना पाए ,
मगर आज पूरा ध्यान देंगे,
जिसके लिए कितना तरसी वो,
पूरा वो मान देंगे,
पूरा वो सम्मान देंगे!
Nice
बहुत बहुत धन्यवाद
यथार्थ पर आधारित रचना, समाज के सच को सामने लाया गया है।
भाव को समझने के लिए हार्दिक धन्यवाद
सुंदर
बहुत बहुत धन्यवाद शास्त्री जी
समाज में दिन प्रतिदिन हमारे बुजुर्गों सम्मान घटता जा रहा है
जिस मां ने छाती से चिपका कर रखा ,उसी को एक अलग कोठरी में मरने के लिए छोड़ दिया जाता है,बेटेअपनी पत्नियों के पैरों में पैर रखते
जब वो मृत्यु को प्राप्त होती है
फिर तरह तरह के पकवान बनाते हैं,भोज रखा जाता है
सच को दिखाती बहुत सुंदर रचना
बहुत सुंदर समीक्षा, कविता के समस्त भाव को आपने सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया। धन्यवाद
सुन्दर अभिव्यक्ति
Thank you
Well said
Thank you
धन्यवाद
समाज के चंद स्वार्थी पुत्रों पर तंज कस्टी हुई बहुत सुंदर प्रस्तुति
……. हृदय स्पर्शी रचना ।
बहुत बहुत आभार गीता मैम
“तंज कसती हुई”
बहुत बहुत धन्यवाद
बहुत बहुत आभार