जिस नर को अपनी धरा पे अपनी भोग की वस्तु उपलब्ध न हो ।।

जिस नर को अपनी धरा पे अपनी भोग की वस्तु उपलब्ध न हो ।।
वह नर नहीं वह तो निज धरा की बोझ है ।
अगर उन्हें निज धरणी से प्यार नहीं ।
तो क्या उन्हें पर महि से प्यार होगी?
जिस नर को अपनी धरा से प्यार नहीं,
वह नर नहीं वह तो नररूप सम पशु समान है ।
ऐसे ही जन कहलाते जग में मातृपुत्र कलंक है ।
जो अपनी मातृभूमि की लाज न रख सकी,
वह क्या पर मातृभूमि की सम्मान करेगी क्या?
जो नर अपनी मातृभूमि की गरिमा को न बचा सकी,
उसे खंडित-खंडित देख हँसी,
इसका जीता-जागता सबूत हम भारतवासी है ।
हम चार उपलब्धियाँ कैसे गँवा चुकी।।
कभी हम विश्वगुरू थे, सोने की चिड़ियाँ थी हमारी देश,
अखण्ड रूप था हमारा, सभी देशों में महान थे हम ।।
अब क्या बनके रह गये हम? क्या बताये आपसे हम?
ढ़ोंगीगुरू है हम, धनहीन, निर्बल-असहाय, दीन-दुःखी है हम,
खण्डित-खण्डित हो चुके है हम व मूर्खों का देश बन चुके हैं हम ।।

Comments

4 responses to “जिस नर को अपनी धरा पे अपनी भोग की वस्तु उपलब्ध न हो ।।”

  1. This comment is currently unavailable

  2. Satish Pandey

    जो नर अपनी मातृभूमि की गरिमा को न बचा सकी,
    ये क्या है विकास जी, नर में स्त्रीलिंग का प्रयोग क्यों कर रहे हैं आप?

  3. हां, ये तो बहुत ही हास्यास्पद है

Leave a Reply

New Report

Close