समन्दर भी ना जाने,
उसमें कितनी नदियां समाती हैं।
ये तो नदिया ही जाने,
उसको कितनी सौतन मिल जाती हैं।
मीठे – मीठे पानी की नदियां,
समन्दर की ओर बह जाती हैं।
फिर , मीठा पानी मिल – मिल कर,
खारा क्यूं हो जाता है।
इतनी नदियों को देख समन्दर में,
हर नदी आंसू बहाती है।
मिलती है , पर खिलती नहीं,
खारा पानी कहलाती है।।
खारा पानी
Comments
12 responses to “खारा पानी”
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Nice Poetry
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Thank you 🙏
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अतिसुन्दर
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धन्यवाद जी
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बहुत ही बेहतरीन
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बहुत बहुत धन्यवाद
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Sunder
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सादर धन्यवाद भाई जी 🙏
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Bahut hi gehrai hai aapki Kavita mein
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Thanks pragya ji. 🙏
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वाह जी खूब
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Thanks Allot Piyush ji 🙏
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