प्रकृति की शोभा से बढ़के कोई शोभा न होता
रब तेरे जैसा यार जहां में कोई ना होता ।।
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हरिश्चन्द्र की शोभा, तु सत्य बनके आया
राम बनके तुमने, सुग्रीव को उबारा
सुदामा की दीन-दशा देखके,
प्रभु तुमने अपना सर्वस्व मित्रता पे लूटाया
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रब तेरे जैसा यार जहां में कोई ना होता ।।1।।
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मित्रता की लाज तुझसे ही बची है जमीं पे
तुझे जो जिस रूप में भजे
उसे तु उसी रूप में मिले
मित्रता की लाज तुझसे ही बची है जमीं पे
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रब तेरे जैसा यार जहां में कोई ना होता ।।2।।
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तुम्हें कोई यार माने
तुम्हें कोई भाई माने
तुम्हें कोई साँई माने
पर तुम सबको सब-कुछ माने
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रब तेरे जैसा यार जहां में कोई ना होता ।।3।।
कवि विकास कुमार
PRAKRITI KI SHOBHA …
Comments
3 responses to “PRAKRITI KI SHOBHA …”
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मित्रता पर आधारित बहुत सुंदर रचना
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हरिश्चन्द्र की शोभा, तु सत्य बनके आया
राम बनके तुमने, सुग्रीव को उबारा
सुदामा की दीन-दशा देखके,
प्रभु तुमने अपना सर्वस्व मित्रता पे लूटाया।
— बहुत सुंदर भाव, बहुत लाजवाब प्रस्तुति -
वाह
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