vinayak sharma, Author at Saavan's Posts

सफर फासलों का

सफ़र फासलों का है ये बड़ा दर्द भरा, गर हो मुम्किन,तो कोई और अज़ाब दो ना बड़ा नहीं देखूँगा तेरी सूरत मैं कभी, इन आँखों को कोई और पता दो ना ज़रा बातों-बातों में बनी खामोशी की दीवार है ये लफ़्ज की एक चोट से गिरा दो ना ज़रा अश्क के दरिया में हूँ डूबा, गम के शरर में दहकता और कब तक है तड़पना, ऐ मुंसिफ़ बता दो ना ज़रा रोज मरता है विनायक, तुझपे मरता हुआ कर मुकम्मल मुझको,मेरी चिता सजा दो ना ज़रा….. www.facebook... »

डर लगता है

देखो तो मजमा आजकल उनका इधर लगता है मतलब की है यारी, सर-बसर लगता है कहते थे कभी मुल्क की आवाम के हैं सेवक देखो तो आज बनारस ही उनका घर लगता है कब्रिस्तान और श्मशान की हो रही बराबरी बनाएंगे पूरे हिन्दुस्तां को, मुजफ्फरनगर लगता है महंगा हुआ है खाना, महंगी है रसोई शिद्दतों से आये अच्छे दिन का असर लगता है आतंक और करप्शन तो हैं ही दर्द-अंगेज़ नए पनपते देशभक्तों से भर गया शहर लगता है बंद लब कर, चुप बैठा है... »

ना पूछना कभी इन आँसुओं की कीमत

ना पूछना कभी इन आँसुओं की कीमत, तुम गुज़रा हुआ वक़्त लौटा नहीं पाओगे…. »

देश के इसी हालात पर रोना है

देश के इसी हालात पर तो रोना है, 69 साल हो गए आजादी के फिर भी आँखें भिगोना है, रो रहा कोई रोटी को और किसी के पास सोना-ही-सोना है, देश के इसी हालात पर तो रोना है। भारत के वीर सपूतों ने आज़ादी के लिए दिए थे अपने प्राण, पर आज लग रहा है व्यर्थ चला गया उनका बलिदान, आज देश में चारो ओर फैला है भ्रष्टाचार, लोग भूल गए हैं अपनी सभ्यता-संस्कृति और संस्कार, बापू ने कहा था हिंसा छोड़,अहिंसा के बीज बोना है, हम भूल... »

शबनमी बूँदें

एक सुबह असामान्य सी हाँ, क्योंकि उस दिन मैं जल्द जग गया था, मैंने देखा था गुलाब के पत्तों पर शबनमी बूंदों को बेहद आकर्षक, अत्यन्त शीतल, काफी खूबसूरत थीं वो बूंदे, जिन्होंने, एक असामान्य सुबह को असाधारण बना दिया, मैंने चाहा उन्हें अपनी हथेली पर ले लूँ, और लिया भी लेकिन,अब ना तो उनमें वो शीतलता रही और ना ही, वो खूबसूरत ही लगती हैं….. For more poetries/stories Like our page Fb.com/ghazabyvinaya... »

जिन्दगी और कविता

जब होश संभाला तो तुमसे जिंदगी को समझाया जाता था अब कुछ भी समझता हूँ तो तुम्हारा सृजन होता है जब मस्तिष्क का ताल दिल के तारों को छेड़ता है तो झंकृत हो तुम बाहर आती हो तुम तब भी होती हो जब रात चोरी-छिपे दिन से मिलकर भाग रही होती है और तब भी, जब नदी किनारे आसमान वसुंधरा की गोद में अपना सर रख अपने प्यार का इजहार कर रहा होता है तुम जीवन की हरेक खुशहाली में शहद की तरह घुली तो हो ही जीवन के नीम अँधेरे में... »

सब देखता है

ये शब देखता है और सब देखता है, सावन में भी पेट में है आग , कोई कब देखता है। दहक जेठ की,या पूस की ठिठुरन में सश्रम है कोई,क्या रब देखता है! कब मैं जलूँगा,या ठिठुर कर मरूँगा, या यूँ ही सड़ते-सड़ते मैं ज़िंदा रहूंगा मेरे इन्तेहाँ की क्या हद देखता है…। सूखे का मंजर,बाढ़ की आफत, “सेल्फ़ी” की आंधी में,हर शख्स देखता है। बेरहम कुदरत,स्वार्थी फितरत ये मैं ही तो हूँ, जो सब झेलता है, मैं ही तो ह... »