‘एक माटी का दीपक सिखा गया’
November 15, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता
एक माटी का दीपक सिखा गया
खुलकर हँसना,
हँसकर जीना,
जीकर अपना सपना पूरा करना
एक माटी का दीपक सिखा गया…..
बोला प्रज्ञा !
मत रो पगली
आज तो है दीवाली अपनी
मुझे जला तू रौशन कर दे
अपना घर और अपना मन
मुझमें जीने की
अलख जगा गया
एक माटी का दीपक सिखा गया….
दीप जलाये मैंने कितने
मुझको भी कुछ याद नहीं
पिया मिले थे मुझको छत पर
थोड़ा मुझको रुला गये
दीप ने टिमटिम करके मुझको
देखो कैसे हँसा दिया
जी ले तुझमें है
प्रज्ञा शक्ति !
ऐसा मुझको बता गया
फिर से जीना,
फिर से हँसना
एक माटी का दीपक सिखा गया…