शैतान की नानी, बन्दर-सी शैतानी, जादू की पुड़िया, सोने की गुड़िया, परियों सी रवानी, प्रेम की निशानी, बालों को नोचे, कान को खींचे, शरारतें उसकी मन को भाएं, थकान का आलस पल मे उड़जाए, बेटी […]
शैतान की नानी, बन्दर-सी शैतानी, जादू की पुड़िया, सोने की गुड़िया, परियों सी रवानी, प्रेम की निशानी, बालों को नोचे, कान को खींचे, शरारतें उसकी मन को भाएं, थकान का आलस पल मे उड़जाए, बेटी […]
चार दिन की जिंदगी है चैन से जीना है, बीड़ी-सिगरेट जहर हैं इन्हें नहीं पीना है।
ये न समझ कि रोड़ी फोड़ कर गुजारा करता हूँ तो ऐसा-वैसा ही हूँ , मैं भी इंसान हूँ, भीतर-बाहर ठीक तेरे जैसा ही हूँ।
‘हर आग से वाकिफ हूँ मैं, हर वक्त मैं जला हूँ, वो क्या जलाएगी मुझे, मैं आग में पला हूँ..’ – प्रयाग
एक ऐसा जहाँ, देवी नहीं बस इंसान समझा जाता हो देवी का दर्जा देके न छल, नारी से किया जाता हो। आसमां पे बिठा के अस्तित्व पर भी बन आया है बाहर तो क्या घर […]
हिम्मत न हार, जीत पा कदम बढ़ा, कदम बढ़ा मंजिलें स्वयं तेरे कदम पे लोट जायेंगी। राह है कठिन मगर तू हौसला भी कम न रख हौसले को देखकर राहें सिकुड़ सी जायेंगी। अवरोध की […]
‘दे दे कोई तदबीर मुझे हरकत में रहने की, मैं उसके तसव्वुर में तस्वीर हुआ जाता हूँ..’ – प्रयाग मायने : तदबीर – तरकीब/उपाय तसव्वुर – सोच/विचार
बरस रहा है भाद्रपद रिम-झिम बरसता जा रहा है इस मनोरम मास में गौरा-महेश्वर सज रहे हैं। इन पहाड़ों के शिखर शिवलिंग जैसे लग रहे हैं, गौरा-महेश्वर पूजने घर-घर विरुड़ भीगे हुए हैं। नारियां बाहों […]
ए दोस्त सोचो,अगर राह में रोड़े न होते। जीवन के परिभाषा, हम कैसे समझ पाते।। यही रोड़े सभी को जीवन धारा बदल दिया। वरना संसार के इस सैलाब में हम कहाँ होते।। ठोकर पे ठोकर […]
हे प्राणदायनी नारी ************* हे प्राणदायनी नारी,तेरी करूण कहानी आँचल में है करूणा,पर आखों में पानी । हर युग में क्यू नारी ही सतायी जाती है विरह वेदना सहती,अग्नि में उतारी जाती है कदम -कदम […]
युग युग से नारी पुरुष के हाथों, छलती आई। तभी तो नारी आज की साक्षात देवी कहलाई ।। —प्रधुम्न अमित
‘मेरी वफाओं का खुलकर सिला दिया उसने, न रखा एक भी, हर खत जला दिया उसने.. दूर होने का फैसला क्या खुद तुम्हारा है ? मैंने पूछा तो कैसे सर हिला दिया उसने.. हमें भी […]
‘मेरी वफाओं का खुलकर सिला दिया उसने, न रखा एक भी, हर खत जला दिया उसने.. दूर होने का फैसला क्या खुद तुम्हारा है ? मैंने पूछा तो कैसे सर हिला दिया उसने.. हमें भी […]
संतरूपी कविजन आप हमारी खामियाँ को पढ़कर हमे खूब कोसे खूब परेशान करे, अच्छी बात है लेकिन कोई व्यक्ति इस संसार में किसी भाषा का पूर्ण ज्ञाता नहीं होता । वैसे आज कवियों की भरमार […]
‘कैसी सड़क हो गई है इतने गढ्ढे हैं कि समझ नही आ रहा कि गाड़ी सड़क पर चला रहा हूँ या सर्कस में, मेरा इतना सोचना ही हुआ था कि मैं गाड़ी समेत लड़खड़ा कर […]
यदि नारी से निर्माण हुआ है नया संसार। फिर क्यों नारी पे हुआ घोर अत्याचार।। हम कहते है नारी होती है ममता के सागर। फिर क्यों हुआ बाजार में आज ममता बेकार।। आंचल में हम […]
‘आगाह किये देता हूँ मैं ज़माने की ठोकर को, मैं ज़मीं पे पड़ा पत्थर नही, ज़मीं में गढ़ा पत्थर हूँ..’ – प्रयाग
मनु की संतान पर तंज कसने की कोशिश की है मैनें.. नया विषय और भारत की समस्याओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित करने की चेष्टा की है मैनें… द्वापर छोंड़ दुर्योधन और दुःशासन कलयुग में […]
‘यही हकीकत है मेरी, मैं उम्मीद-ए-जहाँ का पुलिंदा था, मैं तब तक मरता रहा, जब तक कि मैं ज़िंदा था..’ – प्रयाग मायने : उम्मीद ए जहाँ – दुनियाँ की उम्मीद पुलिंदा – ढेर
नसीब सबका है अपना – अपना , कहीं ख्वाब परवान चढ़े, कहीं हुआ झूठा कोई सपना। ज़िन्दगी में जो मिला, वो भी कुछ काम ना था। ऐसा भी नहीं है, कि कोई ग़म ना था। […]
‘जा चुका होता मैं कब का इस जहाँ से, किसी से किये वादे, गर अधूरे नही होते.. वो किया करते हैं औरों के ख्वाब मुकम्मल, जिनके खुद के ख्वाब कभी पूरे नही होते..’ – प्रयाग […]
शब्दों की सीमा लांघते शिशुपालो को, कृष्ण का सुदर्शन दिखलाने आया हूं, मैं देश दिखाने आया हूं।। नारी को अबला समझने वालों को, मां काली का रणचंडी अवतार याद दिलाने आया हूं, मैं […]
‘वो हादसा के सलीके से जिसका ज़िक्र नही, और कुछ लोग थे जो सुर्खियों में आते रहे.. मदद के वास्ते लाज़िम थे कई हाथ मगर, वो सारे हाथ फकत वीडियो बनाते रहे..’ – प्रयाग मायने […]
प्रथम मौलिक जन-जन के गुरु प्रबंधन के पुरोधा,नवाचार की शुरू आस्था के आकाश पर सूर्य से बिराजमान हैं धर्म के धरातल पर रचे कृतिमान हैं मातृभक्ति की वज़ह से पिता की भी की अवहेलना पिता […]
कुछ पाना हमारा मकसद न हो देने की लत खुद को लगाते चलें जीवन हमारा यह रहे न रहे दूसरों का जहाँ चलो बसाते चले । हमने देखा दुनिया की भीड़ में भी हम अकेले […]
यह शहर अनजान सा लगने लगा है तू नहीं तोह बेगाना सा लगने लगा है वह चाय की टपरी वह गालिया आज भी भरे है तू नहीं तोह सब कुछ बेजान सा लगने लगा है […]
आपके लिए तो केवल वो शब्द थे, जो निकल गए जुबान से, मगर जो आघात हुए हैं हृदय से, उनकी खता तो बताइए ,जनाब!
साक्षात्कार था मेरा उस दिन, चिंता से था हृदय धड़कता। एक दस का नोट पड़ा जेब में, ऑफिस तक की भी बस कैसे पकड़ता। दो सौ रुपयों की दरकार थी, ज़िन्दगी से मेरी तकरार थी। […]
आज तू हंस ले , खुलकर मुझ पर, मगर ,थोड़ा सा सब्र कर; अरी; सुन ! मेरी अभागी क़िस्मत! मैं सीख तुम्हें सीखलाऊंगा, मेहनत की जंजीरों से जकड़कर, मुलाजिम तुम्हें बनाऊंगा। मुलाजिम, तुम्हें बनाऊंगा! ——मोहन […]
महामारी का दौर यह कैसा आया , वक़्त ने सबको बेबस बनाया , कुदरत ने इस धरती को बहुत खूबसूरत बनाया , पर इन्सान इस नेमत को सम्भाल ना पाया , तो महामारी ने आकर […]
‘फितरत-ओ-आदत की बात है के मोहब्बत, उनसे की न गई, हमसे भुलाई न गई..’ – प्रयाग मायने : फितरत ओ आदत – फितरत और आदत
अनजान बन कर चैन से जीने वाले । तू क्या जाने कौन गोरा कौन काले।।
संवेदनाएं कहाँ रहती हैं आज-कल, मैं यह जानती नहीं.. लोग क्यों जलाते हैं नफरत के चिराग मैं यह जानती नहीं.. ऊब चुकी हूँ जिन्दगी से अपनी, साँसों की डोर कब टूटेगी मैं यह जानती नहीं… […]
मुद्दत बाद आज ही नहाया हू़ँ अपने अश्क ए तालाब में। कहीं कोई काली नैनो़ से देखा तो नहीं मुझे नहाते हुए।।
पागल पुकारो आवारा पुकारो या तुम दीवाना पुकारो। जो भी पुकारो जरा प्यार से अपना कह कर पुकारो।।
‘निकलती है नेक मकसद को, मुकम्मल वो दुआ होती है, नही होती दुआ अकेली कभी, साथ क़ुव्वते-दुआ होती है..’ – प्रयाग मायने : मुकम्मल – पूरी क़ुव्वते दुआ – दुआ की ताकत
कितनी प्यारी होती हैं बेटियाँ, प्रेम की मूरत होती हैं बेटियाँ.. आती है जब परिवार पर आँच कोई, सबसे आगे खड़ी होती हैं बेटियाँ… प्यार के पालने में झूलती हैं, माँ के आँचल में पल्लवित […]
बुद्धि विनायक पार्वतीनंदन ,मंगलकारी हे गजबंदन वक्रकुंड तुम महाकाय तुम ,करता हूँ तेरा अभिनंदन कंचन -कंचन काया तेरी ,मुखमंडल पर तेज समाया है मूषक वाहन करो सवारी ,मोदक तुमको प्यारा है भक्ति भाव में तेरी […]
‘दिल में छिपाए रखोगे, जज़्बात कब तलक, इतनी ही हुई बात बस नज़रों से अब तलक..’ – प्रयाग
निजी कामों के बीच हमारे हाथ से भी देश लिए कुछ योगदान हो जाये, मेरे भारत में अमन -चैन रहे, खुदा मेहरबान हो जाये।
‘मेरे इज़हार पर कुछ यूँ लगा तू हाँ की मुहर, दुनियाँ देखे कि इकरार किसे कहते हैं.. तेरे सिवा मुझे उस पर भी यकीं है ऐ खुदा, हूँ मुतमईन के ऐतबार किसे कहते हैं.. किसी […]
‘देर न लगी मेरी हकीकत के मायने बदलने में, मैं दरिया था कभी मोहब्बत का, आज दिल्लगी का ज़रिया हूँ..’ – प्रयाग मायने : ज़रिया – साधन
चलो ‘मैं’ को, ‘मैं’ से लड़ाते हैं! जीतकर , फिर ‘मैं’ से ‘हम’ बनाते हैं। विशेष–> यमक अलंकार का प्रयोग एक “मैं ” अपने आप के लिए दूसरा ” मैं ” अहंकार के लिए
कर्म अपने हाथ में है और बाकी कुछ नहीं, एक ईश्वर की है सत्ता और बाकी सच नहीं। जो मुझे यह दिख रहा है अपने चारों ओर का, एक सपना सा है यह सब और […]
‘चारागरों, हम में से किसी एक का इलाज करो, आज़ार उन्हें नफरत का है, तो हमें मोहब्बत का..’ – प्रयाग मायने : चारागर – डॉक्टर आज़ार – रोग
पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाकर प्रेम दिखाती है बिन मांगे अपनी झोली हमेशा ही भरा पाती है हर चीज समय से जुड़ी है प्रत्येक जगह यहां जलीय चक्रीय प्रवृति से भरा है सारा ही जहां […]
वो ना जाने कहाँ रहते हैं आज कल, हमें उनके दीदार का इन्तजार है… बड़ा मीठा बोलतें हैं वो, हमें उनकी हाँ का इन्तजार है..
मेरे इश्क के बीमार नजर आ रहे हैं.. बड़े सीधे सरकार नजर आ रहे हैं..
आँखों से हुई थी अश्कों की बरसात। याद है मुझे वो थी बरसात की रात ।।
कोपलें फूटी अनेकों पेड़ बन पाये नहीं, झाड़ियां उग आई मन में बेर लग पाये नहीं । स्वाद था मीठा सभी में जीभ में परतें जमीं थी इसलिए मीठी नजर महसूस कर पाये नहीं। इस […]
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