हम दो जिस्म एक जान हो कर भी ज़माने को हम कहाँ झुका पाए आज फिर ज़माना मुहब्बत पे भारी पड़ी आखिरी बार भी तुम्हें कहाँ गले लगा पाए।
हम दो जिस्म एक जान हो कर भी ज़माने को हम कहाँ झुका पाए आज फिर ज़माना मुहब्बत पे भारी पड़ी आखिरी बार भी तुम्हें कहाँ गले लगा पाए।
ए कविता चल आज कवियों के अंजुमन में। शायद दीदार के क़ाबिल हो जाए उनके अंजुमन में।।
आज बहुत व्यथित थी बार-बार निगाहें दरवाज़े तक जाकर लौट आ रही थीं…. ना जाने कहाँ रह गए वो! मेरा बेचैन मन मुझे अधीर कर रहा था…. कहा तो था जल्दी ही आ जाऊंगा ना […]
भेदभाव की बातें छोड़ो भारत देश सजाओ ऐसे जिसमें सभी समान रूप से गुँथे हुए हों माला जैसे। जाति-धर्म के भेद हमारी एका को कमजोर कर रहे, वो छोटा मैं बड़ा कह रहे नफरत व्यापार […]
प्रेम विरह क्या सही है ,क्या गलत , ना जानू । पर आंखें टपक- टपक नयन-जल बौछार में ; भीगा तनबदन, क्या करूं? क्या ना करूं ? ना जानू। नाराज़ हूं ;मैं खुद से पर […]
स्वप्नों के बीज पर ही कर्म फल लगते हैं स्वप्न सीढ़ियों पर चढ लक्ष्य के फल चखते हैं । बगैर स्वप्न देखे कहाँ हम आगे बढ़ते हैं बगैर इसके कहाँ उपलब्धियाँ हासिल करते हैं । […]
बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू व सुर्ती छीन लेंगे तेरी सारी फुर्ती, छोड़ दे तू सहारा नशे का, इस नशे से बुरा भी न देखा।
जिसके थोड़े से दर्द को देखकर बेचैन हो उठता है यह मन वही तो हो तुम, मेरे प्रियतम। जिसके थोड़े से आँसू देखकर पसीना पसीना हो जाता है तन वही तो हो तुम मेरे प्रियतम। […]
नई भोर है सूर्य का स्वागत करेंगे हम… खिड़कियों से पर्दे हटा किरणों से नहाएगे हम.. तितलियों के पंख से चुरा लेंगे तमाम रंग फीके आसमां पे जा नित नवीन चित्रकारी करेंगे हम.. सागर की […]
अभिमन्यु वध से व्याकुल अर्जुन जयद्रथ की कायरता सुनकर के क्रोध से जल उठा। जल रही प्रतिशोध की आग को शांत करने चीखकर प्रतिज्ञा कर उठा । या तो सायंकाल तक जयद्रथ का मस्तक – […]
चल दिये क्यों फेर कर मुँह राह में हम भी खड़े थे, आपसे मिल लेंगे दो पल चाह में हम भी खड़े थे। मुस्कुराकर आपने गैरों में खुशियों को लुटाया, हम रहे तन्हा, गमों में […]
जीवनदायिनी चीजें ही तो अक्सर प्रचूरता में जिंदगानी ले लेती है अग्नि नित सब का चूल्हा चलाती भोजन को कितना मधुर बनाती अधिकता में स्वाद को ही मिटाती अनजाने में घर तक भी जलाती जल […]
मुझे समझने की कोशिश मत करना, मैं उलझा-सा कोई जाल हूं, जितना सुलझाओंगे , उतना ही उलझ जाओगे अगर सुलझा लिया तो, फिर खुद को ही भूल जाओगे।
ये राजनीति बड़ा ही मीठा जहर, मानवता पर बड़ा ढहाती कहर , होते दंगे ,बिखर जाती लाशें, फिर मिडिया हमारी, दिखाती दलाली, हाए! हिन्दू मर गया , हाए! मुस्लिम मर गया, पर कौन बताए? और […]
‘ज़िंंदगी को इतनी हसरत से नही देखा कभी, जितनी तेरा साथ पाने की है मुझमे आरज़ू..’ – प्रयाग
क्या तुम कभी यह भूल पाओगे क्या फिर कभी वापस आ पाओगे शायद तुम्हे आना पड़े, मजबूरी में मजबूरी बहुत कुछ करवाती है यह ही इन्सान को भटकाती है कैसे भूलोगे तुम, इस मीलों के […]
तुम कुछ बोलो ना बोलो, पर मुद्दे सारे सुलझ गए, सुनो देश के ग़द्दारों तुम गलत जगह पर उलझ गए । है तकलीफ तुम्हे ये के ‘अर्णब’ ने चिट्ठा खोल दिया, जो दूजा ना कह […]
‘बुझा गया है कोई, मैं चिराग था पहले, जो जगह आज बंज़र है, बाग था पहले.. बदल ली करवट कुछ इस कदर तकदीर ने, डरता हूँ आज धुएँ से, मैं आग था पहले..’ – प्रयाग
कठिन पथ पे चलकर, फतह हासिल करने की तू प्रतीक बन जा ! स्वमेहनत से कुछ ऐसा कर, सभी के मन की तू मुरीद बन जा ! अनेक रंगों से सजे, संग- संग गुजारे खट्टे- […]
बस अब और नहीं, गये अब दिन तुम्हारे हैं हमने हंस हंस के, जो अपनाये अंगारे हैं ये अंधेरे में सने पूनम की जो रातें हैं दिये तुमने, पर यही अब संग हमारे हैं । […]
एक छोटा सा सपना पूरा हुआ जब मेरा बेटा आर्यन आया तोतली सी बोली से जब तुमने मुझे पापा बुलाया दिल के सारे दर्द दूर हुए जब नन्हा चेहरा मुस्कुराया तू मेरा लाडला राजकुमार मेरा […]
‘उन्वान-ए-किताब-ए-ज़िन्दगी था रखा कुछ और, लिखा कुछ और, छपा कुछ और, दिखा कुछ और, पढ़ा कुछ और..’ – प्रयाग मायने : उन्वान ए किताब ए ज़िन्दगी – ज़िन्दगी की किताब का शीर्षक
कविता- बहन ——————- पता उसे तेरा बसेरा, डाल पे किससे होता है| यह भी पता था आना जाना, कब कब तेरा होता है| बोल सकी ना तेरे कारण, भैया तुझको कहती है| देख हंसी को […]
निकल ही गई ,जान मेरी! जब नन्हीं-सी जान , पहली बार बीमार हुई। औरों को भी थी गमी, पर आंखों से मेरी, बेमौसम बरसात हुई, नहीं था होश, मुझे ना जाने , कितनी बैचैनियो की […]
‘बेवजह ही है मुझसे जुड़ी हर उम्मीद तेरी, क्या तेरे दिलो-ज़ेहन में खयाल नही उठता.. मैं छोड़ आया हूँ अभी-अभी समंदर को, तेरी झील का रुख करने का सवाल नही उठता..’
चश्मे वाले नेताजी! गजब कमाल करते हैं, करोड़ों जनों को चुना लगाने का; जिगरा सरेआम रखते हैं , ना खाऊंगा ना खाने दूंगा! ऐसे-ऐसे वादे तो; वो खुलेआम करते हैं, चश्मे वाले नेता जी , […]
तुम दीया मैं बाती ही सही मैं बाती बन जली तुम बाती बदलते रहे।
पत्थर का दिल कभी पिघलता नहीं इसलिए तो इसमें गुमान भी नहीं होता। तभी तो इसकी पूजा होती, हर घर में नित सम्मान हीं होता।।
‘मैं गुनहगार ही सही उनका फकत लेकिन, मैं शाद हूँ कि किसी तरह उनका तो हूँ..’ – प्रयाग मायने : फकत – सिर्फ शाद – खुश
‘कैसे रोकेगा मेरे इरादों को ये उफान-ए-समंदर, आतिश को दबाए रखा है आगज़नी के लिए..’ – प्रयाग मायने : उफान-ए-समंदर – समुद्र का उफान आतिश – चिंगारी
आज कल के इस माहौल में, जहां जिम (व्यायाम – शालाएं) बंद हो चुकी है। तो हमें घर पर ही योगाभ्यास करना चाहिए।इसी संदर्भ में मेरी एक प्रस्तुति…… योग करें, सब योग करें रहने को […]
ना जाने बसता कहाँ * ———-*——–*——–* सङको पे चलता कहाँ वह संक्रमण से अनजान है भय व भूख को साथ लिए वो भी एक इन्सान है जानता है यह सफ़र शायद हो अंतिम सफ़र चल […]
माना कुछ बुराईयां है मुझमें, मगर सारी अच्छाईयां नहीं है तुझमें, फर्क इतना-सा , मैं हुबहु कहता, और तू बनाकर।
जिससे ठोकर लगी मेरी, एकाएक वो पत्थर बोला! माना गिरे हो तुम, मगर इतने भी नहीं गिरे हो तुम, जो गिरते ही रहोगें हरदम।
मेरे भारत के युवक जाग आलस्य त्याग, उठ जाग जाग तेरी मंजिल कुछ पाना है, पाने तक चलते जाना है। सोने को तो रात बहुत है क्यों तू दिन में सोता है, दिन में सब […]
‘उँगली उठा तो दी हमने, पर साबित क्या करेंगे, वो तमीज़दार भी इतने हैं कि पत्थर खुद नही फेंकते..’ – प्रयाग
‘वो मेरी बेबसी का इश्तिहार देने निकले हैं, बतौर वजह सुर्खियों में कहीं खुद भी न आ जाऐं वो..’ – प्रयाग मायने : बतौर वजह – वजह के तौर पर
‘न देखा उसने इक दफा भी कभी, के किन तूफानों से घिर गया हूँ मैं.. उसकी शिकायत है आज भी वही मुझसे, कि अपने वादों से फिर गया हूँ मैं..’ – प्रयाग
कितना नादान था वह बचपन जब… माँ मुझे चाँद की कटोरी में खिलाती थी… मैं खाना खाने में नखरे हजार दिखाती थी… पर माँ चाँदनी रात में कटोरी में जल भर लाती थी.. मेरी बाँहें […]
पिता बरगद का साया है, मां ममता की छाया है। जीवन में दोनो ही का, स्नेह मैंने पाया है। एक भी ना हो जीवन में, वो जीवन किसको भाया है। जहां मां का दिल कोमल […]
हमने कभी बयां नहीं किया, आदत नहीं थी गम बताने की। वो भी नहीं समझे दर्द मेरा, यही सज़ा मिली गम छिपाने की।
युग युग से तू ,आंसू बहाती आई पुरुष के अधीन तू, सदा रहती आई अपने घर, अपने बच्चो के लिए युग युग से तू ,मर मिटती आई क्या नारी तेरी यही कहानी ? आंचल में […]
जिधर ले जा रही उधर जा रहे और चाहती क्या है तु जिदंगी।
जिंदगी में ये हुनर भी आजमाना चाहिए, अपनों से हो जंग तो हार जाना चाहिए। और शायरी पढ़े : ज़िन्दगी शायरी
‘आओ कुछ बेहतर करते हैं.. कुछ बाहर जग की परिधि में, कुछ अपने भीतर करते हैं.. आओ कुछ बेहतर करते हैं.. आओ कुछ बेहतर करते हैं.. ये विकट समय की बेला है, दरकार नही साधारण […]
कब से तुम्हारी राह में नजरें बिछाए बैठे हैं। चले भी आओ कि महफिल सजाए बैठे हैं।।
मैं सैनिक हूं, मैं देश को संभालता हूं, हर रोज मृत्यु को मारता हूं, मैं मौत से नहीं डरता हूं, मौत को तो मुठ्ठी में लेकर चलता हूं, परिवार की चिंता नहीं करता हूं, परिवार देश […]
कौन कहता है, पुरुषों के जीवन में रौशनी नहीं है। उनकी अर्धांगिनी की बिंदिया क्या रौशनी से कम है।।
खामोश हम भी थे तुम भी थे और यह ख़ामोशी रिश्ते को खत्म कर गई दोनों एक दूसरे के लिए तड़पते रहे पर यह ख़ामोशी दोनों को रास आ गई सारे वजूहात छोटे थे पर […]
बाबा जी मैं जपूं तेरा नाम सांई नाम की अलख जगा ले भोली सी सूरत अपने मन में बिठा ले सच्चा प्यारे सांई नाम बाबा जी जपूं मैं तेरा नाम कृपा दृष्टि की तेरी माया […]
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