बात ठंडी हो चुकी थी फिर लगाने आग आये सोचते हैं जो कहें हम सब करें स्वीकार उसको। दूसरों पर फेंक कीचड़ मत बनो यूँ पाक-साफ़ खुद की गलती देख लो पहले करो स्वीकार उसको।
बात ठंडी हो चुकी थी फिर लगाने आग आये सोचते हैं जो कहें हम सब करें स्वीकार उसको। दूसरों पर फेंक कीचड़ मत बनो यूँ पाक-साफ़ खुद की गलती देख लो पहले करो स्वीकार उसको।
गमज़दा सा हूं ;उसके लिए जो तुमने मेरे साथ किया। और बहुत ही निशब्द सा है, यह दर्द जो तुमने मुझे हर पल दिया। मगर रहे तू हमेशा बाग़-बाग़ , चल छोड़ो ! हमने तुम्हें […]
चल आ मैदान में पुलकित हो, ना रख चिंता ना विचलित हो.. तेरे मार्ग की हर इक-इक व्याधि, तेरी आत्म शक्ति से परिचित हो.. भय बंधन काट के बाहर आ, नित क्रंदन काट के बाहर […]
रास्ते जलमग्न हैं हर तरफ बरसात है, दूसरे की छतरियों में भीगते जज्बात हैं
जीवन में सबके होते हैं ऐसे लोग… जो रिश्तों महज खिलौना ही समझते हैं.. जब तक मन करता है खेल लेते हैं.. जब जी चाहे रिश्ते तोड़ देते हैं..
‘तेरे एहसास में रहूँगा मैं असर बनकर, या कभी दिल में ही साँसों की रवानी बनकर.. संभालकर मुझे रखना है इम्तेहान तेरा, अब मैं रहूँगा तेरी आँखों में पानी बनकर..’ – प्रयाग मायने : रवानी […]
कैसे रिश्ते और कहाँ के.. पल टूट ही जाते हैं.. अपना उल्लू ना सीधा हो तो खुद ही रिश्तों से मुकर जाते हैं..
हम खूबसूरती को अलग पैमाने से आंकते हैं, वे चेहरा देखते हैं, हम दिल में झांकते हैं। 1। हजारों बार कान भरे फिर भी हमें बदल नहीं पाये वे ऐसा क्यों करते हैं आशय नहीं […]
मेहनत बेकार नहीं जाती है आज नहीं तो कल वह उग कर, नई कली बन मुस्काती है। आज सोचते हैं हम इतना करने पर भी मिला नहीं कुछ, लेकिन करने पर मिलता है, यही शाश्वत […]
अपनी कुटिल मुस्कान से तू मुस्कुरा मत आज हम पर (भाजी बनाने को), आलू जरूरी हैं जरा सा दाम कम कर।
मुस्कुरा मत इस तरह अंजान राही पर अधिक दर्ज होगा जब मुकदमा दण्ड पायेगा पथिक।
सुनहरी धूप है, चारों तरफ प्रकाश है, आज लगता कि बारिश ने लिया अवकाश है। यूँ तो बारिश के बिना इस जिन्दगी कल्पना कर नहीं सकते हैं हम सृजन की प्रमुख साज है। फिर भी […]
मेरी छः महीने की गुड़िया आज लगी है स्वयं पलटने, हूँ, हाँ, करती, हाथ उठाती धीरे-धीरे लगी समझने। अगर गोद मे नहीं उठाओ तो लगती थोड़ा सा रोने, प्यारी सी लोरी गाते ही मीठी नींद […]
‘किसी की आह से महसूस हुआ है मुझको, कि बहुत दूर तक पहुँची है आज मौज-ए-लहू..’ – प्रयाग मायने : मौज ए लहू – खून की लहर
रोशनी आई अचानक बादलों ने घेर ली, दे गए खुद ही दिलासा आंख क्यों फिर फेर ली।
कोशिश कर आगे बढ़ने की बंदे, तुझमें है सिंहों-सा दम… ना मान हार तू लहरा दे, अपनी ताकत से जग में परचम… नित अग्रसर हो जीवन पथ पर, मत गवां समय तू रुक-रुककर… तू जवाँ […]
वो भी क्या उमर थी,जब मस्ती अपने संग थी , सारी फिकर और जिम्मेदारियाँ, किसी ताले मे बंद थी, वो गलियाँ जिसमे खेलते थे क्रिकेट,पतंग उड़ाते कभी थे, कभी तोड़ते थे कांच तो कभी पेंच […]
“साँस लेता हूँ फकत ये भी कोई कम तो नही, ज़िंंदगी तू ही बता मुझपे तू सितम तो नही.. कभी पूछा न ज़माने के शरीफ लोगों ने, ‘दीवाने ये बता कि तुझको कोई गम तो […]
दूसरे को ठेस देने से पहले यह याद रखो चोट दिल पर लगेगी अहसास रखो चार दिन की जिंदगी में नफरत नहीं प्रेम पास रखो ककड़ी सी शीतल तासीर रखो जलेबी सी गर्म मिठास रखो […]
सब रूठ सकते हैं लेकिन माँ नहीं रूठती है। सब थक जाते हैं लेकिन माँ थक कर भी नहीं थकती है। सब सो जाते हैं, लेकिन माँ नहीं सोती है। वो हमारे लिए रात-रात भर […]
पहली बार जगे थे , जो अरमान ! तुम्हें देखकर! वो ,निहारने का अंदाज अभी भी रमा है, मेरे जहन में । आंखों का आंखों से वार्तालाप! करने का हुनर अभी भी बसा है, मेरे […]
कुछ इस तरह तेरा तूझे याद किया करते हैं, सब हैं करीब, पर तेरी ही कमी महसूस किया करते हैं। ज़िक्र चलता हैं किसी ओर का, बातों ही बातों में हम तेरा किस्सा छेड़ दिया […]
ओज कविता – बिरो की धरती भारत | बिरो की धरती भारत बिरो से कभी खाली न होगी | राष्ट्र पर प्राण करेंगे न्योछावर जननी सवाली न होगी | भ्रमजाल मायाजाल लोभ लालच मे कभी […]
‘सोचता हूँ तो हर वजह ही बेवजह सी लगे, मेरी साँसों से मेरे दिल का वास्ता न होता तो क्या होता…? मुझ पर से गुज़र कर न जाने कितने चले गए, मैं औरो के मक़ाम […]
कहीं तो छुपा है, किसी ना किसी कोने में, दुबका हुआ सा, मौके की तलाश में, कम या फिर ज्यादा, मगर छिपा जरूर है, हर मस्तिष्क में! और बचा तो ‘मानुष’ तू भी नहीं , […]
बहुत दिनों से ढूंढ रहा था, जिसे मैं डगर -डगर, वह मुझे घर के पास ही मिल गया। कौन कहता है विभीषण मर गया , जिंदा है वो, मुझे मेरे अपनो में ही मिल गया।
एटीएम सी है जिंदगी मेरी , जब तक कैश होता है, तब तक प्रेम की बरसात और लोगों की आवाजाही होती रहती है।
‘ये चाहता मैं भी हूँ के ठोकरें लगती रहें तेरी, तुझे मैं याद रख सकूँ, ये आग जलती रहे मेरी.. मेरे सब्र को मेरी बेबसी की इन्तेहाँ मत समझना, ये तूफाँ का इशारा है जो […]
‘हम तो समझ बैठे थे, ये काँटो की वफ़ा है, पर शुक्र हैं कि कभी नंगे पैर न थे..’ – प्रयाग
तू बहुत ही खूबसूरत है कहूँ तब भी परेशानी तुझे, नहीं है खूबसूरत तू कहूँ तब भी परेशानी तुझे, कुछ न बोलूं चुप रहूं तब भी परेशानी तुझे, अब अधिक नादान मत बन चैन लेने […]
‘ये मेरी मोहब्बत की, शिद्दत का सिलसिला था, दरिया था कभी मुझमे, अब उससे जा मिला था.. ज़िद थी गज़ब की मुझमे, तुझको जीताने की, हर बार हारकर भी, जीता जो हौसला था.. मुझमे रवाँ […]
सृष्टि कल्याण को कालकूट पिया था शिव ने, मैं भी जन्म से मृत्यु तक कालकूट ही पीती हूं। मैं स्त्री हूं। (कालकूट – विष) मचा था चारों ओर घोर त्राहिमाम जब,कोई ना था […]
ओस के मोतियों जड़ा एक हर बनाऊ मैं फलक के सितारों से तेरी मांग सजाऊंगा मैं । काली घटाओं से मांग लूं तेरी आंखों का काजल झिलमिलाती लहरों से बनाऊं तेरी पायल । श्वेत चांदनी […]
तुम्हारी बात पर इतना कहेंगे आज हम, काबिल हो तुम काबिल काबिल रहो इससे नहीं नाराज हम। लेकिन न समझो दूसरे को भूल कर भी खुद से कम, क्या पता कमजोर भी सहसा दिखा दे […]
जिंदगी है बुलबुला पानी मे उठता बुलबुला फूट जाता है अचानक सत्य को मन मत भुला। सोचता है आदमी मैं सौ बरस जीवित रहूँगा, और कैसे भी रहें, पर मैं सदा ऐसा रहूँगा। इस तरह […]
कुछ अलग ही दिख रहा हूँ पानी मे उठता बुलबुला फूट जाता है अचानक सत्य को मन मत भुला। सोचता है आदमी मैं सौ बरस जीवित रहूँगा, और कैसे भी रहें, पर मैं सदा ऐसा […]
‘इतना कुछ लिखा गया फितरत किताबी आ गई, ज़िंदगी के मंच पर जुर्रत खिताबी आ गई.. उंगलियाँ उठी तो अल्फाजों को ताकत मिल गई, सवाल इतने उठ गए हाज़िरजवाबी आ गई..’ – प्रयाग मायने : […]
मुझे निगलने चला था , नाग-सा अभिमान मेरा, मगर मोर से संस्कार; मेरी मां के , मुझे बचा लेते हैं।
कविता कहाँ मैं आजकल बस उलझनें ही लिख रहा हूँ, सामने हूँ आईने के कुछ अलग ही दिख रहा हूँ। भूल कर पहचान खुद की मुग्ध हूँ अपने ही मन में, उड़ रहा आकाश में […]
वो घड़ी है कौन सी जिस घड़ी खुश रहते हो तुम, अब घड़ी की जगह मोबाइल ने ले ली हर घड़ी उसी में गुम रहते हो तुम।
तल घिसा जूता समझ मुझको पहन मत बे-अकल काई लगे हैं रास्ते फिसलन अधिक है आजकल।
सच है कि सच हमेशा कड़वा बताया जाता है सच्ची में सच्चा आदमी अक्सर सताया जाता है। लेकिन जो सच है सच है सच ही हमेशा सच है, हर झूठ को हमेशा सच से हराया […]
मेरे भारत की युवाशक्ति मत हो शिकार नशे की तू यह नशा तुझे निगल जायेगा मत हो शिकार नशे की तू । आगे बढ़ने की सोच निरन्तर मत घबरा संघर्ष से तू, अपना लक्ष्य ऊंचा […]
‘लड़ा था खुद से ज़मीं पर तेरी खुशी के लिए, फलक में रहके खुदा से भी जंग वही होगी..’ – प्रयाग मायने : फलक – आसमान
‘किस तरह रोकेगी गुज़रती हवा-ए-सर्द मुझे, ओढ़कर उसकी तमन्ना घर से निकलता हूँ मैं..’ – प्रयाग मायने : हवा ए सर्द – ठंडी हवा
वो मां का हाथ पकड़कर चलना, वो दौड़कर भाई का पकड़ना। वो दादी के किस्से कहानी सुनना, वो धागे में हाथ पिरोना। वो गर्मी में नानी के घर जाना, वो मामा का गोद में उठाना […]
कुछ खार जमाने में हर चमन में होते हैं, चुभते हैं जिस्म को लहूलुहान कर देते हैं, तो कुछ खार लफ्जों से घायल कर देते हैं, उन खारों से कोई जाकर पूंछे, क्या उन्हीं का […]
इनायत की थी मैने कोई शिकायत नहीं। बेवजह कह गए वो आपसे कोई रिश्ता नहीं।।
उठो फिर से मेरे यारो, यहाँ कुछ काम करना है| शहर है जाम यदि यारो, कही से राह देना है लड़ो सरकार से भाई, हमें इतराज ना तुमसे| पर परवाह करो मेरी भी,एक जुड़ी जान […]
हे दीनबंधु,परमपिता परमात्मा, करते हम तुमसे बस यही प्रार्थना, सच्ची आजादी दिला दो तुम , एक ऐसा देश बन दो तुम। बेटियां जहां कोख में ही ना मारी जाती हो, हर घर में हर नारी […]
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