मधुमालती छंदाधारित कविता – शीर्षक – मन
(कुल 14 मात्रा, विन्यास 2212, 2212)
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मन फूल सा, कोमल न हो,
पर ठोस हो, तो बात है।
मन ही न हो, तब आदमी,
क्या आदमी, है खाक है।
मन न छोटा, कर ए मानव,
मन बड़ा रख, जोश में रह।
डूब मत यूँ, दर्द में तू,
त्याग निद्रा, होश में रह।
मन जरूरी, जिन्दगी को
मन नहीं तो, कुछ नहीं है।
कुछ करो तुम, काम लेकिन
मन नहीं तो, कुछ नहीं है।
तू जगा ले, यह ललक अब,
जिन्दगी है, रोशनी है,
रोशनी पा, खूब खुश रह,
अपनी मंजिल, खोजनी है।
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संपादक की पसंद
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मन
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गम मिटाना तुम
रखना लगाव खोलकर के द्वार दिल के तुम।
जितना वो दे उससे भी अधिक प्यार देना तुम।
कभी किसी दुखी का दर्द मत बढ़ाना तुम,
जरा सा नेह देना और गम मिटाना तुम।
चूमो शिखर मगर नजर जमीन पर रहे,
जिस भूमि पर खड़े हो उसे मत भुलाना तुम।
कोई पसंद गर न हो तो छोड़ दो उसे,
जबरन पसंद थोप कर के मत रुलाना तुम। -
भोजपूरी देवी गीत- देवी के चरण मे |
भोजपूरी देवी गीत- देवी के चरण मे |
चला पिया चली जा बाजार होखेला पूजा नवरातन मे |
कीनिहा माई के सिंगार चढ़ईहा देवी के चरण मे |
नौ दिन पिया तू उपवास बरत करिहा |
नौ रूप माई के दरसन खूब करिहा |
ओढ़ईहा चुनरी ओहार पिया माई के चरण मे |
कीनिहा माई के सिंगार चढ़ईहा देवी के चरण मे |
शेरवा सवार माई खूब लहरत अइहे |
खुश होइहे देवी तोहके खूब वर दिहे |
भगतन बदे लिहली दुर्गा अवतार चला माई के शरण मे |
कीनिहा माई के सिंगार चढ़ईहा देवी के चरण मे |
रोज रोज पिया चंडी पाठ करईहा |
नवमी के दिन नौ कन्या खियईहा |
होई जाई तोहरो उद्धार मगन रहा माई के भजन मे |
कीनिहा माई के सिंगार चढ़ईहा देवी के चरण मे |
पंडित जी बुलाई धूप हवन करईहा |
माई के चरनिया गिरि मथवा झुकईहा |
देवी दुर्गा होला जय जय कार सारा जग मण्डल मे |
कीनिहा माई के सिंगार चढ़ईहा देवी के चरण मे |
श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड मोब -9955509286 -
कवि
ओ कवि, जरा सम्भल कर लिखना
यह कविता नही परछाई है तेरी
आत्मा का प्रतिरूप यह
तेरे अन्दर छिपी भावनाओं की प्रतीक है
अच्छे या बुरे उजागर हो जाओगे
फिर दुराव- छिपाव ना रख पाओगे
एक खुली किताब कहलाओगे
उजागर अपनी हर पीड़ा कर जाओगे
कलम तुम्हारा दृषिटकोण समझा जाएगी
तुम्हारा हर अनुभव जग-जाहिर कर जाएगी
फिर रहोगे ना खुद के ,बेपरदा हो जाओगे
दर्पण सा ही अनुभव कर पाओगे । -
अजन्मे भ्रुण की व्यथा
मेरी अभिलाषा को थोड़ा-सा उङान दे दो
हे तात! मुझे मेरी पहचान दे दो
कबतक भटकती रहेगी मेरी आत्मा
यूँ करते रहोगे, कहाँ तक मेरा खात्मा
मुझको मेरा, खोया मुकाम दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा-सा उङान दे दो ।
तुझको जना, वो भी किसी की कली थी
जिसने राखी बांधा, तेरे लिए वो भी भली थी
तेरी भार्या भी किसी तात की परी थी
बता फिर मेरी क्या खता, एक एहसान दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा उङान दे दो ।
जब मैं चलुगी चहकेगा अंगना तेरा
गुलज़ार होगा जब खनकेगा कंगना मेरा
चुका दूंगी मोल इस जीवन का मैं
मेरी जिंदगी मुझे ही उधार दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा उङान दे दो ।
जाने से पहले दधी साग लाने कहूँगी
आते ही पानी, चाय लेकर दौङुगी
तेरे कहने से पहले सारा कुछ करूँगी
बस एक बार इस जहाँ का दीदार दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा उङान दे दो ।
मेरे जन्म से क्या परेशानी होगी
मेरी किलकारी से क्या हैरानी होगी
कुछ ऐसा जिऊँगी, नाम रौशन करूँगी
बस थोड़ी सी जमी, थोड़ा आसमान दे दो
मेरे हौसलों को थोड़ा उङान दे दो ।।
। -
मौसम
हो गई है भोर,
गुनगुनी सी धूप है,
ना व्यर्थ का कोई शोर
बदल रहा है मौसम,
तुम ना बदल जाना
अच्छा लग रहा है,
सर्दी का यूं धीरे-धीरे आना*****✍️गीता
-
शब्द चित्र – सुबह हो रही है
सुबह हो रही है,
घौंसले से बाहर आने को आतुर
चिड़िया ने पंखों को भुरभुराया,
सहलाया, मानो योग कर रही हो,
गर्दन इधर की, उधर की
फुर्र उड़ी
अपने दैनिक कार्य निपटाने चली।
समय की पाबंद
अपनी प्राकृतिक ब्यूटी में
लग गई है ड्यूटी में
भोजन की व्यवस्था करने
खुद के लिए भी
अपने बच्चों के लिए भी।
अब आप भी उठो ना
कुछ काम में जुटो ना। -
लोकनायक
शत-शत नमन उस जन-नायक को
लोकनायक से जाने जाते थे
भारत-रत्न से सम्मानित,
इंदिरा विरोधी कहलाते थे ।
आज जन्म दिवस है उनका
हम नतमस्तक हो जाते हैं
विमल प्रसाद जिन्हें
“मानव पिता” कह जाते हैं ।
सितावदियरा की वह पावन भूमि
जहाँ जे.पी . का चेतनत्व हुआ
प्रभादेवी के संग, दाम्पत्य का श्रीगणेश हुआ
पर घर तक कहाँ वे सीमित रह पाते हैं
भारत-रत्न से सम्मानित, इन्दिरा विरोधी कहलाते हैं ।
आजादी के संघर्षों में सक्रिय होकर
कांग्रेस समाजवादी पार्टी का निर्माण किया
जन-आनंदोलन से समाजवाद का विचार दिया
“समाजवाद क्यूँ” की रचना कर,
पुनर्निर्माण सिद्धांत के रचयिता बन जाते हैं
भारत-रत्न से सम्मानित, इन्दिरा विरोधी कहलाते हैं ।
धर्म के नाम पर फूट डालो की नीति जब चलती थी
हमारे मतभेदों के बल पर अंग्रेज़ों की रोटी बनती थी
राष्ट्रवाद की अवधारणा को धर्मनिरपेक्षता का आधार दे
जाते हैं
भारत-रत्न से सम्मानित, इन्दिरा विरोधी कहलाते हैं ।
मानव पशु बन पाए, जो उसकी की हर भौतिक आवश्यकता पूरी हो,
नैतिकता को साथ बस उतना ही, जो जीवन की खातिर जरूरी हो
नैतिक मूल्यों को अपनाकर, आदर्शों का प्रतिष्ठान कर जाते हैं
भारत-रत्न से सम्मानित, इन्दिरा विरोधी कहलाते हैं ।
सदियों से सुसुप्त भारत में, पुनः जन संघर्ष प्रारम्भ किया
देश की तन्द्रा जाग्रति करने को नवक्रान्ति का संचार किया
नव भारत की रचना हेतु ” संपूर्ण क्रांति ” मंत्र दे जाते हैं
भारत-रत्न से सम्मानित, इन्दिरा विरोधी कहलाते हैं । -
अगर मालूम होता
तुम्हें खोने का डर
एक अनजाने,अनचाहे
मुकाम तक पहुंचाएगा
खुद को वही रोक लेती
अगर मालूम होता
हस्र न होता यह अपना ।
नीचे गिर कर संभलना
सीखा था हमने
खुद की नजरों से गिरकर
न आया संवरना
अगर मालूम होता
हस्र न होता यह अपना ।
तमाम अकुलाहटे झकझोरती
खुद से तर्क-वितर्क कर निचोड़ती
आपसी द्वेष को करें दरकिनार
द्वैत का भाव फिर से है तैयार
अगर मालूम होता
हस्र न होता यह अपना । -
इंतज़ार
इंतज़ार
ये नन्हा सा पौधा,
जो फूट निकला है
धरती की गोद से,
कितना नाज़ुक है ये
कितना सौम्य,कितना पवित्र,
किसी नन्हे बच्चे की तरह
आंखें खोलता,बंद करता
अपने आस पड़ौस दूसरे
पेड़ पौधों को देखता,
फिर महसूस करता कि…
मेरे पत्ते इतने कम क्यों हैं?
मेरी टहनियां इतनी कम क्यों हैं?
मुझपे न फूल हैं न फल,
मैं इतना छोटा क्यों हूँ?
इतनी हसरतें, इतनी ख़्वाहिशें
आँख खुलते ही दिल में!
और मुझे लगता था कि
हम इंसान शायद ऐसे हैं,
बेसब्र, बेकैफ़, बेकरार
मगर, हमारी तरह इनको भी
करना होगा ताउम्र बस,
इंतज़ार, इंतज़ार इंतज़ार।आरज़ू
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क्या बेटी होना गुनाह है
क़भी कोख़ में ही मार डाला उसे,
कभी काट के फेंक दिया खलिहानों में!!कभी बेंच दिया उसे देह के बाज़ारों में ,
क़भी सरेराह नोचा सड़कों और चौराहों पे!!जब जी चाहा पूजा देवियों सा,
कभी अपमानित किया उसे गालियों से!!आगे बढ़ने की चाहत की तो दीवारों में क़ैद हुई,
कभी मान की ख़ातिर उसको झोंक दिया अंगारों में!!दुर्गा,काली की धरती पर कैसी ये विडंबना ,
इस देश में बेटी होना क्यों है एक गुनाह.. ??©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
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विचार के जुगनू
कभी कभी मेरे मन के अंधेरे कमरे में
न जाने किस झरोखे से चले आते हैं
जुगनुओं से झिलमिलाते विचार…!!मैं अपना हाथ बढ़ाकर कोशिश करती हूँ
उन्हें छू लेने की और वे छिटककर
आगे बढ़ जाने की…!!बड़ी जद्दोजहद के बाद जब अपनी हथेलियों
में क़ैद कर लेती हूँ इक चमकता विचार…
तब उसे रख देती हूँ किसी कोरे कागज पर
ताकि उसकी रोशनी से कुछ पल के
लिये ही सही मिट सके मेरे
मन का अंधकार..!!© अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
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वर्ष पुरानी
कविता -वर्ष पुरानी
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आज अचानक,
कुछ खोज रहा था,
कई वर्ष पुरानी कॉपी मिलती है|मैं साफ किया उसे,
फिर खोल उसे पढ़ने लगा,
पढ़ते-पढ़ते, मै रोने लगा|उसमें पड़ा गुलाब संग एक खत था,
सूख गया गुलाब पर,
खत यादें ताजा कर डाला,
कॉलेज की मेरी दोस्ती,
खत ने सब कुछ कह डाला|उसमें कुछ ऐसी बात लिखी थी|
परसों कॉलेज आओगे,
मत लंच बॉक्स लाना,
परसों जन्मदिन तुम्हारा है,
उस दिन को –
यादगार बनाना हम चाह रही हूं|
उस दिन कुछ अपने हाथों से
बनाकर लाऊंगी,
कुछ प्यार भरी बातें होगी
फिर अपने हाथों से खिलाऊंगी|मैं खत मे नहीं ,बतला सकती,
परसों क्या बनाकर लाऊंगी,
मेरी तरफ से उपहार समझना,
आप कहां और मैं कहां-
हम आपके लिए ,महंगा गिफ्ट नहीं ला पाऊंगी|मेरे खत का जवाब,
फेंक गिरा के मत देना,
आना जब कल कॉलेज,
मेरे खत का जवाब लिखकर,
मेरी कॉपी में रख कर देना|बहुत लिखी थी बातें उसमें,
सौ बार कुशलता पूछी थी,
सच में, जिस दिन कॉलेज न जाता था,
कॉलेज में क्या क्या हुई पढ़ाई,
वह सब कुछ लिखती थी,
अनुशासन ,प्यार-भरा ,डाट के संग
एक खत लिखकर-
वह अपनी कॉपी हमें देती थी|रोते-रोते खत को-
सौ बार चूमा,
खुदा दुआ मै तुझसे करता हूं,
जा उसकी रूह से मेरी यादें ताजा कर दे,
उससे कहना, वह याद किया है,
खत पाके चूमा रोया है,
आज तुम्हारे “ऋषि” का ,फिर से जन्मदिन आया है|
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***✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”—— -
दर्द का जो स्वाद है
दर्द का जो स्वाद है,
उससे दिल आबाद है,
मुफ्त है जग में,
खुदगर्जीया !मक्कारियां सरेआम है,
दर्द का जो स्वाद है,
उससे दिल आबाद है।मदहोशियों का माहौल हैं
बहरूपियों की यहां फौज हैं,
पराया यहां,
किस -किस को कहें,
अपनों की जरा खोज है,बैचेनियां, तन्हाईयां,
बदनामियां!
आजाद हैं,
दर्द का जो स्वाद है,
उससे दिल आबाद है। -
उलझी-सुलझी कविता – जगा आग
अंधेरे में घिरा आकाश
ठीक वैसा
जैसा खुद पर न हो विश्वास।
तारामंडल का टिमटिमाना
ठोस निर्णय ले न पाना,
ठीक एक जैसा है,
अपनी बात पर
स्थिर न रह पाने जैसा है।
कदम उठाना
तब उठाना
जब विश्वास हो खुद पर।
अंधेरा चीरने का
संकल्प हो जब
तब कदम उठाना
अन्यथा पड़े रहना
दिवास्वप्न देखना,
नहीं नहीं
आ अंधेरा तो
मिटाना ही होगा,
रात स्वप्न देखकर
सुबह उसे
सच बनाना होगा।
जाग, खुद पर
कर विश्वास,
मन स्थिर रख,
आगे बढ़ने की जगा आग। -
पुरसुकून की तलाश में
नित नए विवादों से तंग आकर
क्या निकल पङू परसकून की तलाश में ।
काश कोई करी मिल जाए करार की
दस्तखत कर सकें, हर उस मसौदे पर
जिसपर सुकून का,आखिरी इकरारनामा अंकित हो
अदला-बदली करें अंतर्मन के द्वंद से,
क्या मैं निकल पङू, अक्षुण्ण शान्ति की तलाश में भी।
संजीदगी लिए कोशिशें, क्या मुकाम को पाएगी
धीर हुए मन में,फिर वे स्वप्न क्या सजीव हो पाएंगे
बेखौफ़,पूरी गरीमा के साथ,
अपनी क्षमता को आकार देने
क्या मैं निकल पङू, एक पुरसुकून की तलाश में । -
भूल गयी खुद को
बनी बनायी राहों पर चलते-चलते
भूल गयी खुद को, औरों की सुनते-सुनते ।
ज़मीर जिसकी गवाही न दे, क्यूँ बढे अबूझ चिन्हों पर
अच्छी बनकर, खुद से लङकर, सह गयी डरते-डरते ।
अपमान का विष, कब तक पान करूँ
कब तक मूक-चीख से प्रतिकार करूँ
थक गयी, संघर्ष की घङियो से, रार करते-करते ।
खुद को कैसे मशगूल रखू, कबतक आखिर धीर धरूँ
रोजमर्रा की बात है ये,आखिर कैसे वहन यह पीङ करूँ
बिखरी आशाओं की लङियाँ, टूट गये सब सहते-सहते ।। -
साँझ
धीरे-धीरे चुपके चुपके
पड़ रही है साँझ
हम भीतर ही थे
पता ही नहीं चला कि
कब आई दबे पांव साँझ।
अभी तो उजाला था,
चहक रही थी चिड़ियाएं,
दिख रही थी
चारों ओर के पहाड़ों की छटाएं।
अब झुरमुट अंधेरा छा रहा है,
शहर शांत हो रहा है।
बिलों में छुपे चूहों का
सवेरा आ रहा है।
दिन भर किसी का समय था
अब रात किसी का समय आ रहा है।
बता रहा है कि
सभी का समय आता है
दिनचरों का भी रात्रिचरों का भी
बस समझने की बात यही है कि
समय का सदुपयोग
कौन कर पाता है -
तुम्हारी मुस्कुराहट में
आज तुम्हारी
मुस्कुराहट में
वो बात दिख रही है,
जिस पर लिखने को
कलम – कागज लिए
हजारों हाथ भी
काँपते हुए, घबराते हुए
असहाय होकर,
नहीं लिख पाते हैं, सीधी कविता।
असहाय हाथ, उलझी कविता,
असहाय शब्दों की कठोरता,
तोड़ देती कलम
झटक देती है हाथ,
लय भी छोड़ देती है साथ।
आंखें शरमा जाती हैं,
उसी अवस्था में पहुंचा कवि
व उसकी कलम
अवाक सी
इस मुस्कुराहट पर स्थिर हो गई है। -
सजाकर भाव रसना से
अहो, कविता!!
तुम तो
बहुत ही खूबसूरत हो,
सजाकर भाव रसना से
मधुर अभिव्यक्ति करती हो।
जीवन का सुख व दुख
सब कुछ समेटे हो
स्वयं में तुम,
समझ संवेदनाओं को
विलक्षण रूप देती हो।
जरा सी पंक्तियों में तुम
बड़ी सी बात कहती हो
सहृदय में विचरती हो
दिलों में राज करती हो।
जहां कोई न पंहुचा हो
वहां तक तुम पहुंचती हो,
बनी जीवन का आईना तूम
सुखद राहें दिखाती हो। -
विरह वियोग
कविता- विरह वियोग
——————————
अब हम किससे
अपना दर्द कहे,
कहां हम जाएं की-
अपने दर्द की दवा मिले|जब भी चेहरा याद आता है,
शृंगार रस के सपनों में डूब जाता हूं,
जैसे ही चेहरा दुख देता है-
विरह वियोग में हो जाता हूं|उसकी एक गलती-
आंखों में आंसू भर देती है,
मेरा सच्चा साथी, कलम कॉपी,
हस के हमसे कहता है,
उठा मुझे और भड़ास निकाल ले,
या मन में उठे विचारों की राह बदल दे|तुझे क्या लगता है-
जीवन में सब कुछ तू ही खोया है?
हे पागल प्रेमी दीवाना,
शीश उठा देख जरा,
तेरे जैसी कईयों रोए हैं|तू क्या खोया क्या पाया,
हम तुझको आज बताता हूं,
तू वह खोया जो तेरा था ही नहीं,
तू वह पाया जग में जो सब को मिला नहीं|जिसको प्यास लगी पानी पीता,
जिसको भूख लगी भोजन करता,
जब जब किसी के दिल पर-
आवारा पागल प्रेमी का इल्जाम लगा,
तब ऐसे पागल प्रेमी आवारा ही-
जिद में आकर सुंदर सा इतिहास रचा|अब मत रो हंसने की बारी है,
अब मत सो चलने की बारी है,
तु आज है रोया, कुछ ऐसा कर,
कल तेरी खुशियों में पूरी दुनिया रोए|
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****✍ऋषि कुमार “प्रभाकर”——- -
आशु कवि
जब कविता लिखने का कोई
मूड नहीं बन पाता है
मार सुड़ुप्पा चाय का प्यारे !
ये दिल आशु कवि बन जाता है
दो-तीन कपों में मैं तो पूरी
कविता लिख लेती हूँ
पाँच कपों में खण्डकाव्य और
निबंध का सृजन कर लेती हूँ
यदि होती कोई टेंशन है तो
चाय का सुट्टा मार के मैं
खुद को टेंशन फ्री कर लेती हूँ
यदि पी लूँ पच्चीस प्याला चाय
तो टोन में फिर आ जाती हूँ
महाकाव्य लिखकर ही मैं
नशे से बाहर आती हूँ… -
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस है
दस अक्टूबर है आज
जीवन के लिए है खास
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस है आज
थोड़ा जगाना होगा समाज।
जिस तरह जरूरी है तन का
स्वस्थ और सुडौल रहना,
ठीक उसी तरह तरह जरूरी है
मन में सकारात्मक सोच रखना।
उदासी को, निराशा को
दूर भगा देना है,
गुस्सा, चिड़चिड़ापन और
खालीपन मिटाना है।
जरा सी बात पर चिंता
जुंनूँ उल्टा, अनिद्रा,
भ्रम करना, और डरना
आत्महंता सोच रखना,
इन सभी पर वक्त पर है
सावधानी अब जरूरी
मानसिक पीड़ाएँ हैं ये
इनको मिटाना है जरूरी।
यदि कभी घर और बाहर
आपको पीड़ित दिखे तो
सावधानी से उसे
पहचानना है अब जरूरी।
अवसाद से रखनी है दूरी
आज सबने आप हमने,
स्वस्थ जीवन के लिए है
स्वस्थ मन बेहद जरूरी। -
‘कोरी जिन्दगी’
तेरी तस्वीर को व्हाट्सएप पर देखा
आज मैंने कई सालों बाद
वो दौर याद आ गया
जब हम रात-रात भर
बातें किया करते थे
उन होंठों से काफी
पुराना रिश्ता रहा है मेरा
जो तस्वीर में खामोश
दिख रहे थे
आँखों में वो चमक भी नहीं थी
जो पहले हुआ करती थी
मैं तो सिमट ही गई हूँ
अपनी कोरी जिन्दगी में
पर तुम्हें क्या हो गया ?
बडे़ उदास नजर आ रहे हो !
वो प्यारी-सी हँसी कहाँ गई ?
जो कभी होंठों पर सजा करती थी….!! -
कुछ नया तो नहीं
तिल-तिल के जलना,
मिलना -बिछङना
कुछ नया तो नहीं
रोज की बात है ।
जैसे दिनकर का जाना,
संध्या का मुस्काना,
गगन धरा के मिलन का भरम
कुछ नया तो नहीं
रोज़ की बात है ।
हर सुबह नयी
उम्मीदें जगाना
रात को, सुनहले पलों के
ख्वाब सजाना
फिर दैनिक क्रियाकलापों में
बिखर कर रह जाना
कुछ नया तो नहीं
रोज़ की बात है ।
थोङी- सी और लगन
मन्जिल तक पहुँचाती,
कुछ ख़ास ख़्वाहिशों की,
हर दिन की अनदेखी
असफलता दिलाती
बगैर ईमानदार कोशिश की ही
सफलता पाने की चाहत
कुछ नया तो नहीं
रोज़ की बात है । -
वो ज्वार है इश्क
मर के भी ना खत्म हो
वो जुनून है इश्क
जी कर जो अधूरी रह जाए
वो कहानी है इश्क
तेरे-मेरे दर्मियां जो
रिश्ता है
उसका नामोनिशान है इश्क
बीच की खिड़की खोलकर
जो बातें होती हैं
उन बातों का बहाना है इश्क
रब होगा पर देखा नहीं
मेरे लिए तो मेरा भगवान है इश्क
नजरों से नजरें टकराने पर
जो होता है
वो एहसास है इश्क
मेरे होंठों ने जो ना कहा
मेरे कानों ने जो ना सुना
वो अल्फाज है इश्क
तेरे सामने आते ही जो मचती है
हलचल दिल में
वो ज्वार है इश्क
तेरे स्पर्श से जो रोंम-रोम
पुष्पित हो उठता है
उस बसंत की बहार है इश्क.. -
छोटा सा बीज पीपल का
छोटा सा बीज पीपल का
बड़ा सा पेड़ बनकर
हजारों वर्ष तक
प्राणवायु देता है
जिसे पूजकर
हर कोई
हुमायूं होता है।
इसी तरह न समझो
कि छोटा कभी बड़ा नहीं बनता है
बल्कि मौका और मेहनत से
गरीब का बच्चा भी एक दिन
शहंशाह बनता है। -
जिन्दगी के हर दौर का मजा लेती हूँ
छोंड़कर शिकायत बस
शुक्रिया अदा करती हूँ
जितना है पास बस
उसी का मजा लेती हूँ
जिधर से भी निकलती हूँ
मीठी मुस्कुराहट बिखेरती हूँ
जिन्दगी के हर दौर का
मजा लेती हूँ
अश्क देख ना ले कोई
मेरी आँखों में इसलिए
आँखों में ही छुपा लेती हूँ…. -
किसी गरीब की
किसी गरीब की
कभी मदद न की हो तो
आज ही कीजिए,
टेंशन न लीजिए
देर मत कीजिये
खुदा के वास्ते
कुछ दान-धरम कीजिये।
खुदा भले ही न दे
इसके बदले में तुम्हें,
मगर अब तक जो मिला
उसी को ध्यान में रख
किसी मुफ़लिस कभी
मदद न की हो तो
आज ही कीजिये,
टेंशन न लीजिए
आपको सुख मिलेगा
सदा बरकत रहेगी,
दुआ कुबूल होगी,
रब की रहमत मिलेगी। -
दोस्ती और मुहब्बत
मुहब्बत में कभी-कभी,
घर छूटते हैं
मुहब्बत में अक्सर ही,
दिल टूटते हैं
दोस्ती की देखो,
निराली ही शान है
दोस्ती के सिर पे,
ना कोई इल्ज़ाम है
मुहब्बत के मैं, विरुद्ध नहीं,
बशर्ते मुहब्बत हो शुद्ध और सही
एक बार मुहब्बत,
हो जाए किसी से
फ़िर दुबारा भी हो,
वो तो मुहब्बत नहीं है
दोस्ती का रिश्ता,बड़ा ही पाक है
दोस्ती के दामन पर, ना कोई दाग है
एक बार ही मुकम्मल,
हो जाए इस जहां में मुहब्बत
ये ही क्या कोई कम बड़ी बात है
हाथों में गर हाथ है किसी का,
होली है दिन और दीवाली की रात है
दोस्ती की अपनी अलग ही शान है,
दोस्ती का कुछ अलग ही मान है ..*****✍️गीता
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मानवता को बचाओ..
जरा कम ही शोर मचाया करो
क्योंकि मैंने अक्सर शोर मचाने वालों को
भीड़ का हिस्सा बनते देखा है
जिनका स्वयं का कोई
अस्तित्व नहीं होता है
सिर्फ दूसरों का अनुसरण करते हैं
खुद की होती नहीं कोई पहचान
दूसरों की परछाई बनते हैं
है तेज तुममें तो शोर मत मचाओ
जाओ घर से बाहर
मरती मानवता को बचाओ
जाकर देखो जरा
दुनियाँ की परेशानियों को
अपनी परेशानी छोटी नजर आएगी
जब लगेगी भूँख तो सूखी रोटी भी
स्वादिष्ट बन जाएगी
जैसा बनाकर देती हूँ
चुपचाप खा लो वरना
जाओ किसी हलवाई से ब्याह रचा लो….. -
पाप करता हूँ
भरी बरसात है
फिर भी कलम से
प्यास लिखता हूँ,
समर्पित हो मगर फिर क्यों
वहम को पास रखता हूँ।
नजर पर रख कोई पर्दा
हमेशा पाप करता हूँ,
यहीं पर हीन हूँ मैं
बस गलत का जाप करता हूँ।
सही दिखता नहीं पर्दे से
कमियां खोजता हूँ बस,
मूढ़ हूँ यदि स्वयं के प्रिय पर
करता हूँ कोई शक। -
सुनकर कांव कव्वे की
मुहल्ले में खड़े टावर में
सुनकर कांव कव्वे की,
सभी यह सोच कर खुश हैं
अब मेहमान आयेगा।
मगर वह पाहुना आयेगा
किसके घर किसी को भी
पता कुछ है नहीं
केवल भरोसा है कि आयेगा।
प्रियसी सोचती है आज उसका
प्रिय आएगा,
वृद्ध माँ सोचती है आज
उसका पुत्र आयेगा।
पत्नी सोचती है
दूर सीमा में डटा पति आज
डेढ़ महीने के लिए
छुट्टी में आयेगा।
बच्चे खुशी से सोचते हैं
जो भी आयेगा,
कुरकुरे, चॉकलेट और
चिप्स लायेगा।
मुहल्ले में खड़े टावर में
सुनकर कांव कव्वे की,
सभी यह सोच कर खुश हैं
कि कोई आज आयेगा।
– डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड। -
इन्सान
इन्सान नहीं कुछ बोलता
वक़्त हैं बोलता
बंदा कुछ नही
हालातों से घिरा हुआ
यह दिल है कुछ भरा हुआ
काफिला खट्टी-मीठी यादों का
छलकता पैमाना खुशियों का
दर्द भरे जज़्बातों का
समेटे कुछ आम – कुछ खास एहसासों का
पुलिंदा गलतियों का
नए पुराने किसी साज सा
उम्मीदों से बंधा हुआ
खवाबों से सजा हुआ
इन्सान बोले भी तो क्या बोले
नाच रहा किस्मत के हाथों
कठपुतली सा। -
काला पानी (भाग 2)
डेविड बेरी,जेलर था सैल्यूलर जेल का
डेविड बेरी को “बैरी” कहते थे ,
सारे हिन्द के सैनानी ।
उसके किए की भी ,
क्या ख़ूब सज़ा मिली
ये जानें सारे हिन्दुस्तानी ।
आज़ाद भारत जब हो गया,
उसका भी दम कम हुआ
लंदन जाता था अपने घर,
कलकत्ता में ही बेदम हुआ
औरों का घर छीना जिसने,
उसको अपना भी ना नसीब हुआ ।
जय-हिन्द की गुंजार ने,
सारे हिन्द को फिर एक किया
वन्दे मातरम् के नारे ने,
काम बहुत ही नेक किया ।
अब वर्तमान भारत की सोचो,
क्या ऐसा ही भारत चाहा होगा
एक अच्छे भारत की
चाह में ही तो,
अपना शीश कटाया होगा ।
तो आज से हम एक काम करें,
इस देश का कुछ उद्धार करें
देश-प्रेम ही देश-प्रेम हो,
यह जन-जन में, संचार करें ।।*****✍️गीता
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समर्पण :- जबरदस्ती या प्यार
समर्पण:- जबरदस्ती या प्यार
कोने में दुल्हन बनी मै खड़ी थी,
हाथों में सिंदूर की डिबिया पड़ी थी,
वक्त था मेरे घर से विदा होने की,
छोड़ सब सखियां को जाने की बेला हो चली थी,
ये कैसा शोर था जिसमें खुशियों से ज्यादा डर का मोहल था?
सब अपने छोड़ कर अनजानों से भरा पड़ा ये घर था,
रस्मो के उलझन में ये मेरा मन बड़ा डरा पड़ा था,
जब आई बेला समर्पण की तो मन में एक जीझक था,
ऐसा नहीं कि मुझे किसी और से प्यार था,
बस ये सब को लेकर मेरा मन अभी तैयार नहीं था,
अनजान से इंसान के सामने मेरा मन अभी कहा खुला था,
फिर ये जोर कैसा था सारी ताकत की आजमाइश कैसी थी,
माना समर्पण प्यार की निशानियां होती है पर इसमें जबरदस्ती की गुंजाइश कहा थी?
समर्पण के आड़ में भला ये जबरदस्ती की क्या जरुरत थी,
सूट बूट में तो वह दिखते हीरो पर अंदर से इतने मैले क्यों थे,
सब कहते हैं कि मां बाबा अच्छा वर ढूंढते हैं फिर उनकी पसंद की ये खरीदी हुई दर्द क्यों थी?
भला क्या कसूर था मेरा की सिंदूर से पाक रिश्ते में भी मैं छली थी,
समर्पण के नाम पर उस रात मेरी अश्मित भला क्यों जली थी
इतना के बावजूद भी मुझे उस घर में रहने की फरमान क्यों मिली थी?
माना फेरे, शादी और सिंदूर बनाती है किसी को किसी की अमानत फिर भला उस रात मै किसी की जागीर क्यू बनी थी?
सवाल भला करूं तो करूं किस से खोखलेपन से तो भरा पड़ा है ये समाज!
जहां हर रोज झूठी रिवाजे और धुंधली रस्मों के नाम पर कई लड़कियां जबरदस्ती की शिकार है ,
कब थमेगा भला कब ये रुकेगा कब आएगी समझ कि बिना मन का प्यार नहीं होता
समर्पण का मतलब ही प्यार है इसमें कतई जबरदस्ती नहीं होता।
Pallavi joshi -
चाय-पानी !!
ना जाने कितनी परीक्षाओं से
गुजरना पडे़गा
आखिर और कितना
पिसना पडे़गा
नसीहत सब देते हैं पढ़ने की
अब नौकरी के लिए क्या
किताबें घोलकर पीना पडे़गा
अरमां हैं आसमान छूने के
पर हकीकत की जमीन पर
ही रहना पडे़गा
युवावस्था में क्या यूं ही
आत्मनिर्भर का पाठ पढ़ना पडे़गा
अगर पता होता कि
ऐसा कुशासन आएगा
युवा बैठकर यूँ ही गाल बजाएगा
जीवन भर पकौडे़
तलने पडे़ंगे
फसेगीं भर्तियां कोर्ट में
धरना देने पर पड़ेेगे कोड़े
ना पढ़ाई में पैसा बहाते
ना किताबों में आँखें गडा़ते
ना व्यर्थ करते अपनी जवानी
ढाबा खोलकर सबको कराते
चाय-पानी !! -
पर्वतीय सौन्दर्य
सिक्किम के सौन्दर्य का,
मैं कैसे करूं बखान
वहां से लेकर हम यादें,
आए अद्भुत, आलीशान
स्वर्णिम सूर्य उदित होते हैं,
पर्वतों के पार
बनते बादलों की छटा है,
सुन्दर अपरम्पार
झरने झर-झर बहें यहां पर,
शीतल पवन का शोर
सुन्दर हरियाली बिछी हुई है,
यहां पे चारों ओर
कंचन जंगा की बर्फीली चोटी,
के दर्शन यहां हो जाते हैं
बादल खेलें आंख-मिचौली,
बरस कभी भी जाते हैं
पर्वतों से कुछ प्यार सा है,
पर्वत सदा ही भाते हैं
जब करता है दिल कभी,
पर्वतों से मिलने चले जाते हैं ..*****✍️गीता
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वो एक कप कॉफी***
वो एक कप कॉफी का वादा
तुम्हें याद होगा
रोज़ मिला करते थे तुम मुझसे
उसी वादे की खातिर
कहना चाहते थे मगर
कह नहीं पाते थे
कि चलोगी मेरी बाइक
की बैक सीट पर बैठकर
एक कप कॉफी पीने ?
जो वादा किया था
तुमने एक रोज़
पर कहने वाली एक बात भी
ना कहते थे तुम और
ना जाने कितनी बातें कर जाते थे
वो एक कप कॉफी तुम्हारे साथ
पीने को बेताब मैं भी थी
पर तुम कभी कह ही नहीं पाए और
वो एक कप कॉफी का वादा
अधूरा रह गया !!
वो एक कप कॉफी अगर हम साथ पीते तो… -
कविता : वो एकतरफा प्यार
वो एकतरफा प्यार ,जिसके लिये हुआ दिल बेक़रार
मैं ढूंढता रहा उसे ,होकर बेक़रार
उसका मुस्कुराना देखकर
आँखों का झुकना देखकर
उसके आगे लगने लगे
महखाने सारे बेअसर
वो जाते जिधर जिधर
मैं पहुंचता उधर उधर
जैसे मृग कस्तूरी के लिए ,भटके इधर उधर
अब तो दिन कटता था ,रस्ता उनका देखकर
उनसे मिलने का मौका ढूंढता था ,दिल तो जानभूझकर ।।वो कॉलेज कैन्टीन में मिलना ,न कोई इत्तेफाक था
वो क्यूँ न समझ पाए ,ये इत्तेफाक ही मेरा प्यार था
अब तो प्यार का रंग मुझ पर चढ़ने लगा था
चेहरे पर मेरे ,गज़ब निखार आने लगा था
मैं फ़िल्मी गीतों को गुनगुनाने लगा था
हर गीत हमको अपनी ही दास्तान लगने लगा था
बेतुकी बातें भी उसकी ,अच्छी लगने लगी थीं
सारी कमियों में उसकी ,खूबियां दिखने लगी थी ||खूबसूरत दिखूं मैं कैसे ,परेशान रहता था
वो कॉलेज क्यों नहीँ आई ,सवाल रहता था
अपने बर्थडे से ज्यादा ,उसके बर्थडे का इंतज़ार रहता था
उसे पहले विश करना ,ऐसा ख्याल होता था
अगर वह विश कर दे,तो अपना बर्थडे यादगार होता था ||सोंचता था कह दूँ उससे अपने दिल की बात
याद तुझे करता हूँ मैं दिन और रात
डरता था कर दे न कहीं वो मेरे प्यार को इंकार
कर दे न कहीं मेरी भावनाओं को तार तार
जब बताने गया उसे ,अपने दिल की ये बात
तो देखा किसी और को उसके साथ
टूट गया मेरा दिल कांच की तरह
बिखर गए सपने मेरे रेत की तरह
अफ़सोस है जिस प्यार का बरसों किया इंतज़ार था
मेरा पहला प्यार ही एकतरफा प्यार था || -
शुरूआत कैसे करें
तुम्हीं बताओ कैसे
एक नयी शुरुआत करें,
तुझे जानकर भी
फिर से तुझपर
कैसे इन्तिखाब करें ।
जिनकी फितरत
रही हैंअकसर
ताश के पत्तों की तरह,
जिनकी बातें
जल में उठते
बुलबुले की तरह ,
फिर बताओ तुम्हीं
कैसे पहले-सी बात करें ।
टूटे हुए धागों को
पहले-सी आकृति
देने की कोशिश,
पूरी तरह साकार
क्या, कभी हो पाई है
गहरे घावों के
दर्द की भरपाई
कहाँ हो पाई है
जाते-जाते भी
छोङे निशानों से
बताओ मुलाकात कैसे करें
एक नयी शुरुआत कैसे करें । -
भोजपुरी देवी पचरा गीत- करा तू अंजोर |
भोजपुरी देवी पचरा गीत- करा तू अंजोर |
अब नाही अइबु त कब माई अइबु ,
बलकवा रोवे बड़ी ज़ोर |
भारती पुकारे ले अवतू ये काली माई |
जीनिगिया मे करा तू अंजोर |
सुनीला पुकार तू हमरो ये काली माई |
रहिया ना लउके केवनो ओर |
एक वर दिहा दूसर वर दिहा ,
तीसरे उद्धार करा माई मोर |
भारती पुकारे ले अवतू ये काली माई |
जीनिगिया मे करा तू अंजोर |
चंड मुंड मरलु तू रक्तबीज मरलु ,
महिषा सुर के कइलु संघार |
दुखवा हमार कब टलबू ये काली माई |
डगमग नईया बाड़े मोर |
भारती पुकारे ले अवतू ये काली माई |
जीनिगिया मे करा तू अंजोर |
कालन के काल माई भगतन ढाल माई |
काटी अनहरिया करा तू अंजोर |
काली काली केसिया लाली लंबी जीभिया |
लहरत आवा माई होला बड़ी शोर |
भारती पुकारे ले अवतू ये काली माई |
जीनिगिया मे करा तू अंजोर |
छोडब ना चरनीया काली कलकत्ता वाली |
लाल अड़हुलवा होलु तू वीभोर |
लाल सेनुर केरा नारियर चढ़ाइब |
लाली चूड़िया खनके बड़ी ज़ोर |
भारती पुकारे ले अवतू ये काली माई |
जीनिगिया मे करा तू अंजोर |श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड मोब -9955509286 -
“उम्र और जिंदगी”
उम्र और जिंदगी में फर्क:-
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उम्र वो है दोस्तों जो बीते अपनों के बिना,
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जिंदगी वो है जो अपनों के साये में गुजरती है| -
मेरा आईना…!!
मैंने गुस्से से उसे देखा
उसने भी गुस्से से देखा
मैंने आँखें दिखाईं
वो भी आँखें दिखाने लगा
मैं तंग आकर हँसने लगी
तो वह भी खिलखिला उठा
मैं मुस्कुराई वह मुस्कुराया
मैं इतरायी वह शर्माया
मैं रो पड़ी जब कभी
वह भी फूट-फूटकर रोया
मेरी तरह वह भी
जाने कितनी रातें जगा
ना सोया
मेरे जीवन वो अभिन्न हिस्सा है
सब झूठे हैं एक वह ही
सच्चा है
मेरे सजने पर सबसे पहले
वही मुझे देखता है
मेरी सभी कमियों को
बिना हिचक बता देता है
मेरा दोस्त है मेरे जीवन का
हिस्सा है…
मेरा आईना…. !! -
जानती हँ
मैं लड़ना जानती हूँ
मगर चुप रहती हूँ !
**************
क्योंकि अगर मैं जीत गई
तो जानती हूँ
सब कुछ हार जाऊंगी -
चंद्रशेखर
भीम पार्टी आई देखो
भीम पार्टी आई
दलित को गोद में लेकर
खुद को नेता समझे भाई
वह कहती है
ब्राह्मण, ठाकुर और तलवार
इनको मारो जूते चार
और सभी प्यारे बंधु
दलित पर हो रहा है अत्याचार
यह कैसी सोंच है भाई ?
और कहाँ कि है नैतिकता
भारत लड़ लेता है
बाहरी दुश्मनों से पर
आस्तीन के सांपों के
आगे ना टिकता
गंदी राजनीति करके
चंद्रशेखर क्यों फूट डालते हो
हम हिन्दू भाईयों में
पहले से ही है संग्राम छिड़ा
पाकिस्तानियों और चीनियों में
एक कानून देश में लागू है
लोकतंत्र का देश है
सब रहते हैं स्वतंत्र यहाँ
यह हमारा प्यारा देश है… -
गैया तुम तो मैया हो
गैया तुम तो मैया हो
है दूध अमृत तुम्हारा
जीने एक सहारा
जिससे पोषित होता है
मन और शरीर हमारा।
हर तरह काम आती हो
जीना हो या मरना हो
हर जगह जरूरत पड़ती
शुभ-अशुभ कर्म करना हो।
दूध, दही, घी, गोबर
गोमूत्र सभी कुछ पावन
जहाँ बंधी रहती हो
पावन होता है आंगन।
कहते ज्ञानीजन यह भी
भवसागर पार लगाती हो
इहलोक में अमृत देती
वह लोक सजाती हो।
गैया तुम तो मैया हो
है दूध अमृत तुम्हारा
जीने एक सहारा
जिससे पोषित होता है
मन और शरीर हमारा। -
जलता धागा
जब जलता जाए धागा,
इक रौशनी के वास्ते
ये देख कर..
मोम ने भी ली नसीहत,
और पिंघलना सीख गया ..*****✍️गीता
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बेटी
कहीं भ्रूण हत्या बेटी की,
कहीं पर हुआ बलात्कार है
कहीं एसिड अटैक सुना
और कहीं दहेज़ की, सही मार है
गर यूं ही चलता रहा तो,
भारत में भगवान भी
बेटी ना देंगे
पैदा होने से ही डर गई बेटियां,
तो कहां से वंश बधाओगे
बेटी ही ना होगी तो ,
बहू कहां से लाओगे
संसार को कैसे रच पाओगे ।।सही (सहन करी)..
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चुनाव
अरे भाई,चुनाव का वक़्त आया है ,
क्या करना है?
कुछ भी करो,
धर्म-धर्म खेलो,
जाति-जाति खेलो,
औरत संग अनाचार करवा लो,
हर दुखती रग पर नमक डालो,
बस चुनाव नही हारना है।