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संपादक की पसंद

  • गज़ल – प्यार की महक |

    गज़ल – प्यार की महक |
    तुम्हारे प्यार की महक अभी बाकी है |
    दूरिया ही सही तेरी याद अभी बाकी है |
    रहे जहा बनके चाँद तू चमकता रहेगा |
    तू पास रहे न रहे धमक तेरी बाकी है |
    जिंदगी रेत सही बना लो घरौंदा मुझे |
    मै जुगनू ही सही चमक अभी बाकी है |
    याद करोगे जब भी पास मुझे पाओगे |
    मचल कर आओ चाहत अभी बाकी है |
    बिरान जिंदगी तेरी गुलशन बना दूंगा |
    जहां हो चर्चा तेरा ललक अभी बाकी है |
    तेरे सिवा नजरों मेरे कोई टिकता नहीं |
    तेरी दीवानगी की सनक अभी बाकी है |
    कहकर बेवफा गुनाहगार न बना मुझे |
    साथ जीने मरने की बहक अभी बाकी है |
    कर के इतनी मोहब्बत पागल न बन तू |
    परवाना हूँ जल जाने दहक अभी बाकी है |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • बेरोजगार की हालत कब सुधरेगी

    बेरोजगार की हालत
    कब सुधरेगी,
    कैसे सुधरेगी,
    कब बनेंगी नई नीतियाँ।
    कब खुलेंगी खूब भर्तियां।
    कोचिंग कर चुके
    नौजवान को
    कब मिलेगा परीक्षा देने का मौका
    कब चलेगा उनका
    चूल्हा चौका।
    परीक्षा कोई पास कर पाए
    या नहीं कर पाये
    लेकिन पद तो आएं
    परीक्षा तो हो,
    निजी क्षेत्र की हो
    या सार्वजनिक क्षेत्र की हो
    लेकिन रोजगार की नीति तो हो।
    परम्परागत शिक्षा के स्थान पर
    आम आदमी की पहुँच तक
    तकनीकी शिक्षा तो हो।
    कुछ न हो लेकिन
    युवाओं के लिए सही दिशा तो हो।

  • *वन प्रकृति की आभा*

    प्रकृति से दूर हो रहा मानव
    दु:खों से चूर हो रहा मानव,
    वन प्रकृति की आभा बढ़ाते ,
    शुद्ध पवन दे उम्र बढ़ाते
    वृक्ष बचाओ वृक्ष लगाओ
    वरना एक दिन पछताओगे,
    ना खाने को भोजन होगा,
    शुद्ध पवन भी ना पाओगे।
    देख कुल्हाड़ी कांपा तरुवर,
    रोता है चिल्लाता है,
    उसकी चीख ऐ लोभी मानव,
    तू क्यों ना सुन पाता है
    मात्र मृदा और जल देने से,
    तरु हमको क्या-क्या दे जाता है
    फ़ल-फ़ूल तरकारी देता,
    प्रकृति सुरम्य बनाता है,
    उसकी रक्षा का दायित्व
    मानव तुम पर ही आता है।।
    ____✍️गीता

  • बम्बई मिठाई वाला

    टन- टन टन- टन करते वो
    फेरीवाला आता था।
    गदा के जैसे डब्बा अपने
    काँधे पर ले आता था।।
    सिर पे टोपी गले में गमछा
    नाक पे ऐनक बड भाता था।
    बम्बई मिठाय,,लड़का सब खाय
    बूढ़ा ललाय गाते गाते आता था।।
    खड़ा हो गया घर के आगे
    हम बच्चों की टोली आई।
    आजा बाबू पास हमारे
    लेकर आया बम्बई मिठाई।।
    दस पैसे में माला ले लो
    घड़ी मिलेगी चार आने में।
    मात्र अठन्नी काफी है एक
    मोटरसाइकिल बन जाने में।।
    पूरा रुपया लेकर आओ
    तुम्हें दिखाएँ हवाई जहाज।
    खाया खेला मौज मनाया
    क्या था बचपन क्या है आज।।

  • *दिनकर आए हैं कई दिनों के बाद*

    दिनकर आए हैं कई दिनों के बाद,
    विटामिन डी ले लो।
    बांट रहे हैं मुफ्त में सौगात,
    विटामिन डी ले लो।
    बातें करो धूप संग कुछ देर बैठ कर,
    किरणों को बैठाओ देकर आसन
    दिनकर होंगे बहुत प्रसन्न,
    विटामिन डी ले लो।
    दिनकर आए हैं कई दिनों के बाद,
    विटामिन डी ले लो।
    अकड़ा सा बदन खुल जाएगा,
    सर्दी में थोड़ा ताप मिल जाएगा,
    आज है दिवस सुनहरा,
    विटामिन डी ले लो।
    दिनकर आए हैं कई दिनों के बाद,
    विटामिन डी ले लो।
    पवन भी मंद-मंद है, छुट्टी पर है कोहरा
    है अवसर सुनहरा,
    विटामिन डी ले लो।
    दिनकर आए हैं कई दिनों के बाद,
    विटामिन डी ले लो।
    _____✍️गीता

  • लौट आओ

    अंधेरी रात में यूँ छोड़कर
    रूठ कर चल दिये थे
    तुम अचानक
    सोचते रह गए हम
    कि आगे क्या होगा,
    मगर देखा सुबह तो
    रोज की ही भांति
    सूरज उग आया।
    उड़गनों ने सदा की
    तरह ही गीत गाया।
    जहाँ कल तक थी किरणें
    अब भी हैं,
    जहाँ रहती थी अब भी है छाया।
    नलों में आज भी पानी आया
    उदर की पूर्ति को है
    आज भी खाना खाया।
    धड़कनें आज भी हैं सीने में
    जिन्दगी आज भी है जीने में।
    चल रही हैं घड़ी की सुइयां भी
    रोज की ही तरह
    तुम नहीं हो कमी है इतनी सी,
    मगर ये दुनिया चल रही है
    रोज की ही तरह।
    जरा सा आंगन उदास है,
    गमले उदास हैं,
    खिल रहे फूल थोड़ा सा निराश हैं,
    हम भी उदास हैं।
    इसलिए लौट आओ,
    रूठने की अंधेरी रात थी जो
    वो अब नहीं है
    अब सवेरा है, वो बात थी जो
    अब नहीं है।
    लौट आओ
    अब सवेरा है।

  • खूब निराश हो ना

    हार गए
    इसलिए उदास हो ना
    खूब निराश हो ना
    दिल टूट गया है ना
    उत्साह रूठ गया है ना
    सब तरफ से हताश हो ना,
    हाथों में माथा टेककर
    सोच रहे हो ना क्या करूँ
    तो सुनो, सबसे पहले उदासी छोड़ो,
    निराशा की कड़ी तोड़ो,
    जीवन की दिशा को
    आशा और उत्साह की तरफ मोड़ो।
    जो हुआ सो हुआ,
    अब करो दुआ
    खुद के लिए भी
    दूसरों के लिए भी।
    ऐसे मथो माखन
    कि उपजे सुगन्धित घी,
    मन की हार है
    अन्यथा कुछ नहीं है,
    जन्म लेते समय कुछ नहीं लाये थे साथ,
    तब क्या है हारने की बात।
    समझ गए ना
    तुम्हें निरुत्साह को है हराना,
    जीवन का सच समझ कर
    अपना मार्ग है बनाना।

  • रास्ता हूँ मैं

    रास्ता हूँ मैं
    युगों युगों से
    लोग चलते आये हैं मुझ पर
    न जाने कितने पदचापों की
    ध्वनि को मैंने सुना है।
    न जाने कितनों ने
    चल कर मुझ पर सपनों को बुना है,
    लोग आते रहे, जाते रहे
    नए उगते रहे
    पुराने विलीन होते रहे,
    आने और जाने का गवाह हूँ मैं
    चलती जिन्दगी का प्रवाह हूँ मैं
    मैं देखता रहता हूँ
    आते-जाते अस्थिर मानवों को
    बनती बिगड़ती चाहतों को,
    हर तरह की आहटों को।
    उनका आना-जाना लगा रहा
    मैं स्थिर रहा,
    आने पर खुशी और
    जाने पर आँसू बहता रहा
    पदतलों से दबते-दबते
    ठोस बनता रहा,
    वे मुझे निर्जीव समझते रहे
    मैं उन्हें अस्थिर समझता रहा।

  • सत्य को भूलना मत

    खिलौना मत समझना
    किसी धनहीन को तुम
    मन चले तोड़ दिया
    मन चले जोड़ लिया।
    भूख पर वार करके
    दबाना मत उसे तुम,
    दिखाकर लोभ-लिप्सा
    दबाना मत उसे तुम।
    सरल, कोमल व भोला
    मुफलिसी का हृदय है,
    दिखाकर शान अपनी
    लुभाना मत उसे तुम।
    अहमिका में स्वयं की
    सत्य को भूलना मत
    संपदा देखकर तुम
    मनुज को तोलना मत।
    अक्ल को साफ रखना
    शक्ल मुस्कान रखना
    धन नहीं मन का मानक
    सदा यह भान रखना।

  • खाएंगे

    मुक्तक-खाएंगे
    ——————
    अब बनाने वाले ही खाएंगे ,
    कोई खाने वाला रहा नही,
    लगता है, सब दावत मे गए,
    या घर सब, रुठ के छोड़ गए
    पर गए कहां यह पता नही,
    पता होता तो हम उन्हें बुलाते,
    अब घर सूना सूना लगता है,
    कवियों के बिन सावन अपना
    रुखा रुखा सा लगता है|
    जो जुड़े हुए हैं ईश्वर उनके साथ रहो,
    जो जुड़ कर चले गए –
    ईश्वर उनको मेरा पैगाम सुना दो,
    कोई याद किया है
    कविता शायरी गजल गीत,
    पढ़ने के लिए उत्सुक है,
    ———————————
    **✍️ ऋषि कुमार प्रभाकर–

  • बताओ कैसे निभा सकोगे

    जो मन में है तुम उसे कहो ना
    न बोलो चुपड़ी सी बात ऐसे
    दिखावा करके दिलों का नाता
    बताओ कैसे निभा सकोगे।
    भरा है नफरत का भाव भीतर
    अधर हैं बाहर खिले हुए से
    ये दो तरह के दबाव लेकर
    व्यवहार कैसे निभा सकोगे।
    निभा लो चाहे किसी तरह से
    मगर न सच्चे कहा सकोगे,
    भरी है अंतस में आग अपने
    उसे कहाँ तक छिपा सकोगे।
    दिखावा करके सखा का फिर तुम
    दगा करोगे, बताओ कैसे,
    बिठा के दिल में छुरा चला दो
    जमीर देगा सलाह कैसे।
    सभी को धोखा सभी से नफरत
    करोगे जीवन निबाह कैसे।

  • उजालो पे हो अख्तियार तेरा

    यह दर्द मेरा
    लिखा है जिसपर नाम तेरा
    ढूँढे जो कोई हमदर्द
    बेदर्द में शामिल नाम तेरा।
    सही अगर तुम हो
    नाम, गलत होगा किसका
    धर्म के पथ पर चलने वाले
    कर्महीन सही होगा नाम तेरा।
    मेरे आश की हर कलियाँ
    जुङकर फूल बनने को आतुर
    तेरे सिवा कोई चाह नहीं
    हर उम्मीद पे है लिखा नाम तेरा।
    शिकायत की कोई चाह नहीं
    यह दम निकले कोई आह नहीं
    ढूँढ रहे चैन, मिले कहीं ठौर नहीं
    अब खुशी कहीं है और नहीं
    तिमिर मेरे, उजालो पे हो अख्तियार तेरा।

  • बेकारी (कुंडलिया छन्द)

    बेकारी पर आप कुछ, नया करो सरकार,
    युवाजनों को आज है, राहत की दरकार।
    राहत की दरकार, उन्हें, वे चिंता में हैं,
    पायेंगे या नहीं नौकरी शंका में हैं।
    कहे ‘लेखनी’ दूर, करो उनकी आशंका,
    आज बजा दो आप, जोश का कोई डंका।
    *************************
    बेकारी पर नीतियां, बनी अनेकों बार,
    लेकिन उस हुआ नहीं, सच्चा सा प्रहार,
    सच्चा सा प्रहार, नहीं होने से बढ़कर
    बेकारी की बाढ़, चली लहरों सी बनकर।
    कहे लेखनी करो, आज ऐसा कुछ नूतन,
    जिससे राहत पाए, मेरे मुल्क का युवजन।
    ————— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय।
    प्रस्तुति- कुंडलिया छन्द में

  • नैराश्य

    खुशियां सदा अमावस की रात की
    आतिशबाजी की तरह आईं
    मेरे जीवन में…
    जो बस खत्म हो जाती है क्षण भर की
    जगमगाहट और उल्लास देकर…
    और बाद में बचता है तो एक लंबा
    सन्नाटा और गहन अँधेरा….

    वहीं नैराश्य मेरे जीवन में आया किसी
    धुले सफ़ेद आँचल पर लगे
    दाग की तरह ..!!
    जो शुरुआत में तो बुरा लगता है परंतु
    धीरे धीरे लगने लगता है उस आँचल
    का अभिन्न हिस्सा…!!

    वस्तुतः ‘नैराश्य’ मेरा स्थायी भाव है
    जो बस है मेरी कांतिहीन आँखो
    में प्रतीक्षा बनकर…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • थल सेना दिवस

    15 जनवरी को हम थल सेना दिवस मनाएं,
    73वें थल सेना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
    तिरंगे की शान हैं सैनिक,
    भारत का मान हैं सैनिक,
    पूरी रात जो जागे सीमा पर,
    उसी का नाम है सैनिक।
    रात होते ही हम, सुकून से सो जाते हैं,
    वो रात दिन ना देखें , तैनात हो जाते हैं
    दुश्मन की एक आहट पर चौकन्ना जो होवे,
    जागते हैं रात भर ताकि चैन से हम सोएं
    कैसे बताऊं मैं,छोटी सी कविता में उनकी कहानी,
    सरहद पर वह देते हैं जाने कितनी कुर्बानी।
    एक सैनिक का जीवन आसान नहीं होता,
    कुर्बान कर देते हैं वो, देश की हिफाजत में अपनी जवानी।
    साहस और शौर्य से, भारत मां की रक्षा करते,
    वो वीर हैं दुश्मनों से नहीं डरते।
    देश की सुरक्षा में कुर्बान जिनका जीवन,
    देश के सैनिकों को मेरा शत् शत् नमन।
    _____✍️गीता

  • थल सेना दिवस पर देशक सिपाही केर सम्मान में मिथिला केर भाव

    हमर देशक सिपाही हमर शान छै।
    देशक रक्षा में जिनकर प्राण छै।।
    नञ भोजन केॅ कोनो फिकीर छै।
    नञ छाजन केॅ कोनो फिकीर छै।।
    जाड़ गरमी तऽ एकहि समान छै।
    हमर देशक सिपाही हमर शान छै।। देशक रक्षा में….
    छोड़ि जीवन केॅ आस
    मोन में भरल हुलास
    छोड़ि चिल्ला केॅ मोह
    नञ तिरिया बिछोह
    देशक रक्षा में तन मन प्राण छै।
    हमर देशक सिपाही हमर शान छै।। देशक रक्षा में….
    कहियो असमिया पहाड़ी
    कहियो चंबल केॅ झाड़ी
    कहियो समुद्रक किछार
    कहियो नौका सवार
    सब थानहि में ड्यूटी समान छै।
    देशक रक्षा में तन मन प्राण छै।। देशक रक्षा में…
    हिनकर बलिदानक नञ कोनो मोल छै।
    देशभक्ति केर भाव अनमोल छै।।
    ई भावे ‘विनयचंद ‘ करथि सम्मान छै।
    देशक रक्षा में तन मन प्राण छै।। देशक रक्षा में….

  • मजबूरी

    फेंक रहे थे जब तुम खाना,
    मैं भोजन की आस में थी।
    रोटी संग सब्जी जी भी है क्या,
    मैं वहीं पास में थी।
    तुमने शायद देखा ना होगा,
    मैं काले मैले लिबास में थी।
    तुम तो बैठे थे कार में अपनी,
    मैं वहीं अंधकार में थी
    छिप कर बैठी थी राहों में,
    भूख मिटानी जरूरी थी।
    निर्धन हूं पर युवा भी हूं,
    छिपना मेरी मजबूरी थी।
    ____✍️गीता

  • मकरसंक्रांति आई

    मकरसंक्रांति
    अलग अंदाज लिए,
    हर प्रान्त में,
    अपनी छटा बिखेर रहा ।
    सूर्य चले उत्तरायन हो
    छटा नव आशा की
    किरण बिखेर रहा ।
    सकारात्मकता का संदेश लिए
    अपनी संस्कृति, अपनी परिवेश
    की झलक बिखर रहा ।
    यह पर्व है धरती पुत्रों का
    उनकी पौरूष, त्याग्, मेहनत की
    अद्भुत गाथा बिखेर रहा ।
    इस दिन को मनाने की परंपरा
    आधुनिकता के दौर में भी
    प्राचीन छवि को बिखेर रहा ।
    पतंगो को धागे से जोर
    थामें मन से हर रिश्ते की डोर
    सभ्यता को सहेजने की, समझने की
    जङ-चेतन की अहमियत बिखेर रहा ।

  • मकर संक्रान्ति की बधाई

    धीमी-धीमी धूप संग में,
    मीठी-मीठी खुशियां लाई।
    तिल, गज्जक की खुशबू लेकर,
    सर्दी में संक्रान्ति आई।
    मकर संक्रान्ति मनाना है,
    गंगा जी में नहाना है
    गंगा जी ना जा पाओ तो,
    घर में जरूर नहाना है,
    सर्दी है तो हुआ करें,
    ना करना कोई बहाना है।
    तन में हो मस्ती मन में उमंग,
    नीले अम्बर में रंग-बिरंगी उड़े पतंग।
    कभी-कभी किसी की कटे पतंग,
    हम भी छत पर ले कर खड़े पतंग।
    ऊंची उड़ान ले पतंग आपकी,
    टूटे ना डोर कभी विश्वास की।
    हर पल सुख हो, हर दिन हो शांति,
    सबकी ऐसी हो मकर सक्रांति।
    गज्जक और पकवान है लाई,
    मकर संक्रान्ति की आपको बधाई।।
    _____✍️गीता

  • चलो पतंग उड़ाएं

    चलो पतंग उड़ाएं
    लूट लें, काट लें पतंग उनकी
    सभी रंगीनियां अपनी बनायें
    चलो पतंग उड़ाएं
    चलो पतंग उड़ाएं।
    उनके चेहरे की
    खुशियों को चुराकर
    चलो आनंद मनायें
    चलो पतंग उड़ाएं।
    कटी पतंग दूसरे की
    जिस दिशा में हो
    उस तरफ दौड़ लगाएं
    चलो पतंग उड़ाएं।
    वो उड़ाने में कुशल हों न हों
    मगर हम
    काटने में कुशल बन जायें,
    न कोई प्यार, न झिझक रखनी
    बस काटने में लग जाएं
    चलो पतंग उड़ाएं।
    आंख से आंख लड़ाकर उनसे
    खुद की आंखों में जरा उलझा कर
    काट लें डोर, लूट लें उनको
    चलो पतंग उड़ाएं।
    गर किसी की पतंग अपने पथ
    उड़ रही हो न कर बाधा हमको
    तब हम टाँग अड़ायें
    चलो पतंग अड़ायें,
    जरा इंसान कहायें।

  • कविता -मकर संक्रांति चलो मनाए |

    कविता -मकर संक्रांति चलो मनाए |
    मकर संक्रांति आई पतंग चलो उड़ाए |
    उड़े ऊंचाई जैसे सोच पेंच चलो लड़ाये |
    डोर पतंग की थाम खूब तुम रखना |
    कट न जाये उम्मीदे डोर चलो बचाए |
    उड़ने दो अरमानो को उंची पतंग जैसे |
    गिर ना जाये जमीन जमीर चलो बचाए |
    सर्दियों का मौसम ठंड है बहुत यहा |
    काँपते गरीब को कंबल चलो ओढ़ाए |
    दही चूड़ा तिलकुट है मजा खूब लेना |
    वहा भूखे प्यासों की भूख चलो मिटाये |
    अहले शुबह गंगा स्नान तुम कर लेना |
    धोकर बुराई अपने पाप चलो मिटाये |
    खत्म हुआ खरमास शुभ कर्म अब होगा |
    है सुंदर पर्व गले अछूतो चलो लगाये |
    लगा मेला संग बच्चो खुशिया मना लो |
    रोते हुये बच्चे बाहो झूला चलो झुलाए |
    माता -पिता बड़े बुजुर्गो भूलना नहीं |
    छूकर पाँव मकर संक्रांति चलो मनाए |
    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • आपको नींद आ गई आधी

    आपको नींद आ गई आधी
    और हम गीत लिख रहे हैं अब
    क्या करें यह कलम भी चंचल है
    जागती तब है, सो गए जब सब।
    स्वप्न में भी मनुष्य की पीड़ा
    भाव को शिल्प को जगाती है
    तन अगर चाहता है सोना भी
    ये कलम खुद ब खुद लिखाती है।
    कुछ न कुछ बात उठा जीवन की
    लेखनी नींद उड़ा देती है,
    आपके स्वप्न में भी आकर यह
    हंसाती और रुला देती है।

  • इस सड़क पर लिखी कहानी है

    राग कहाँ रागिनी कहाँ मेरी
    इस सड़क पर लिखी कहानी है,
    दो घड़ी आप भी खड़े होकर
    देख लो क्या है मेरी कहानी है।
    लोहड़ी क्या, कई त्यौहार आये
    आपने खीर पुए खूब खाये
    मगर मुझे तो बस सुगन्ध आई
    वो भी जब यह हवा बहा लाई।
    कभी तो सोचता हूँ मैं नहीं मानव
    मगर ये हाथ-पांव, मुंह-आंखें
    किसी मनुष्य की तरह ही हैं
    जो मुझे भी मनुष्य कहती हैं।
    ठंड क्या गर्मियां हों बारिश हो
    कोई त्यौहार हो या रौनक हो
    मगर मैं एक सा रहा अब तक
    पड़ा हूँ इस तरह से बेदम हो।
    राग कहाँ रागिनी कहाँ मेरी
    इस सड़क पर लिखी कहानी है,
    दो घड़ी आप भी खड़े होकर
    देख लो क्या है मेरी कहानी है।

  • लोहड़ी की बहार है

    खुशियाँ अपार है
    प्यार का त्योहार है।
    वेहरे बीच आग जली
    लोहड़ी की बहार है।।
    गैया का गोबर पाथ-पाथ
    पाथी लिया बनाय।
    सुक्खा लक्कड़ काट-काट
    लोहड़ी लिया सजाय ।।
    घच्चक मूंगफली रेवड़ी
    संग खिल्लां का भण्डार है।
    आजा वीरां नच्चां गावां
    लोहड़ी दा त्योहार है।। खुशियाँ अपार है……….
    दादा जी दे गोद बैठ जा
    काका काकी आन के।
    लोहड़ी दा इतिहास सुनावां
    खुशी परव महान के।।
    दुल्ला भट्टी के शौर्यकथा की
    कहानी का आधार है।।खुशियाँ अपार है……
    संदल बार का राजपूत घराना
    राय फरीदखान भट्टी का पुतर।
    यूँ तो लुटेरा कहते थे कुछ
    पर था वह रक्षक शेर सुपुतर।।
    दयावान था दिल उसका
    सब कहते सच्चा सरदार है।। खुशियाँ अपार है…..
    सोलवीं सदी के उत्तरार्ध में
    मुगलकाल की सुनो कहानी।
    अमीर घरानों के खातिर
    होती फरोख्त कुड़ी मुलतानी।।
    देख दशा अबलाओं की तब
    उसका दिल कहे अनाचार है।। खुशियाँ अपार है…
    मुक्त करा नित कुड़ियों का
    हिन्दू संग व्याह करबाबा था।
    सुन्दरिए मुन्दरिए दो बहना थी
    जिसका भी व्याह करबाया था।।
    यही कहानी अच्छाई की
    आज गाता सब संसार है।। खुशियाँ अपार है….
    जाड़े में अमृत है अग्नि
    ये कहते वेद-पुराण है।
    ‘विनयचंद ‘त्योहार नहीं
    ये अग्नि का सम्मान है।।
    खुशी -खुशी नित खुशियाँ बाँटो
    खुशियों का त्यौहार है।। खुशियाँ अपार है…..

  • बढ़ती हुई बेरोज़गारी

    बेरोज़गारी बढ़ती ही जा रही है,
    सुरसा के मुख सम खुलती ही जा रही है।
    चयन हुआ पर नियुक्ति नहीं है,
    युवाओं की प्रतीक्षा बढ़ती ही जा रही है।
    दो-दो वर्ष से प्रतीक्षा कर रहे युवा,
    अब तो यह प्रतीक्षा खलती ही जा रही है।
    कोई कैसे कहे दर्द अपना,
    नौकरी पाना बन गया है एक सपना।
    चयन होने के पश्चात भी, दर-दर भटक रहे हैं
    ताने मारें पड़ोसी, हंसी उड़ाएं कुटुंबी,
    सबके तंज की मार दिल पर,सहते ही जा रहे हैं
    ये युवा यूं ही पिसते ही जा रहे हैं।।
    ____✍️गीता

  • वापसी का रास्ता

    वो पुरानी गिटार पुरानी बाइक
    वो गली वो नुक्कर वो चौबारे
    वो बेहतर ज़िन्दगी बनाने के सपने

    कोई छीन नहीं सकता वोह जज़्बा आगे आने का
    वो खुली आँखों के सपने
    वो रात के तारे गिनने के दिन

    आज अपार्टमेंट थोड़ा बड़ा ही है
    दिल छोटे कमरे बड़े ही है
    आज हम बड़े है

    कमाया इज़्ज़त नहीं पैसे बहुत
    भूख क्या है भूल चुके है हम
    याद नहीं कब फॅमिली के साथ खाना खाया

    इस कॉपरेट दुनिया मे वैसे पार्टी करने के बहुत फ्रेंड्स है
    कोई नहीं जो मेरे खामियों के साथ मुझे एक्सेप्ट करें
    झूठे इस शहर मे कोई नहीं जो अपना है

    वापस जाना है उस गाओं मे मेरे
    थोड़ा कम मे जीना है
    रास्ते वही है क्या,चकराव्यूह तोर सकते है क्या
    क्या हम इस पराधीनता की बेरियों को छोड़ वापस जा सकते है क्या

  • जीवन का दर्द लिखो कहती है

    जीवन का दर्द लिखो कहती है
    कलम आज बोलो कहती है
    उपेक्षित-शोषित-उत्पीड़ित की
    आवाज बनो कहती है।
    प्यार-मुहब्बत पर लिखता हूँ
    रोमांचित होने लगता हूँ,
    जैसे ही रमने लगता हूँ
    कलम मुझे कहने लगती है,
    भूखे-प्यासे जीवन की
    आवाज लिखो कहती है
    कर्तव्य न भूलो कहती है।
    मानव आधारित भेदभाव को
    दूर करो कहती है,
    समरसता हो जीवन में कुछ
    ऐसा लिखने को कहती है।
    सबके अधिकार बराबर हों
    ऐसा प्रसार करो कहती है,
    मानव-मानव में एका का
    प्रसार करो कहती है।
    जीवन का दर्द लिखो कहती है
    कलम आज बोलो कहती है
    उपेक्षित-शोषित-उत्पीड़ित की
    आवाज बनो कहती है।

  • पूँजी तेरे खेल निराले

    पूँजी तेरे खेल निराले
    जिसकी जेब में भर जाती है
    उसका संसार बदल जाती है,
    धीरे-धीरे आकर तू
    मानव व्यवहार बदल जाती है।
    दम्भ, दर्प, मद, गर्व आदि
    संगी साथी ले आती है।
    तेरे आने से मानव की
    आंखों में पट्टी बंध जाती है,
    सब कमतर से लगते हैं
    फिर अहं भावना आ जाती है।
    पूँजी तेरे खेल निराले
    किसी को नहला जाती है,
    लद-कद कर घर भर जाती है,
    किसी को सूखा रख देती है,
    भूखा ही रख देती है।
    कोई मेहनत कर के भी
    दो रोटी नहीं कमा पाता है
    कोई बिना किये कुछ भी
    खातों को भरता जाता है।
    पूँजी तेरे खेल निराले
    सचमुच तेरे हैं खेल निराले।

  • रिक्शा

    एक निर्जीव -सी मोटर गाड़ी ।
    शानो शौकत की बनी सवारी।।
    ये भी मांगे तेल और पानी।
    घिस गए पुर्जे हुई पुरानी।।
    अपने जैसा वंदा अखीर।
    खीचे रिक्शा लगा शरीर ।।
    एक अकेला खींच रहा हो।
    हम बैठे हो आखिर दो दो।।
    खून पसीना बहा रहा है।
    रामू से रिक्शा कहा रहा है।।
    शर्म नहीं आती क्यों हमको।
    न उचित मजूरी देते उसको।।
    ‘विनयचंद ‘ वो भी मानव है
    उसका नित सत्कार करो।
    उसका भी एक परिवार है
    ,सेवक बन आधार बनो।।

  • मेरे पापा

    अब मैं बड़ा हो गया हूं,
    पापा हो गए हैं बूढ़े
    निज परिवार में रमता जा रहा हूं,
    पापा को विस्मृत करता जा रहा हूं
    कुछ कम ही सुनता है उनको आजकल,
    कुछ कम ही दिखता है
    एक ही बात बार-बार कहने पर,
    मेरा मन भी अक्सर चिढ़ता है
    अतः सुबह या शाम,
    उनसे एक बार ही मिलता हूं
    बहुत बीमार रहते हैं पापा,
    जब से मां चली गई
    कभी-कभी कमरे से उनके,
    आती रहती कुछ बदबू सी
    एक लड़का रखा है मैंने,
    पापा की सेवा करने को
    उसने कहा एक दिन मुझसे,
    कोई पुरानी स्वेटर देने को
    ढूंढ रहा था स्वेटर पुराना,
    पुरानी एल्बम गिर गई
    उसमें मेरे बचपन की,
    सारी तस्वीरें मिल गई
    उन दिनों पापा दफ्तर से,
    थके हारे से घर आते थे
    मैं दिन भर की बात बताता,
    मुझे गोद में बैठाकर सारी बातें सुनते थे
    बहुत बार नहलाते थे मुझको,
    बाज़ार भी ले जाते थे
    उन दिनों मेरे पापा, सुपर पापा कहलाते थे
    युवा हुआ था जब मैं, मुझको
    एक बाइक दिलवाई थी
    बहुत दुखी थे पापा उस दिन,
    जब बाइक से मैंने पहली बार चोट खाई थी
    आज पापा की इस हालत पर,
    मेरी आंख भर आई थी
    पूरी एल्बम भी पलट ना पाया,
    दौड़ा-दौड़ा पापा के पास आया
    गीले कपड़ों में पापा,
    उठने की कोशिश कर रहे
    देख के मुझको हुए,गुनहगार सम
    उनकी आंखों से आंसू झर रहे
    “कोई बात नहीं पापा”, कह
    लिपटकर फूट कर रोया
    अभी बदलता हूं मैं वस्त्र आपके,
    अब जाना इतने दिन मैंने क्या खोया
    पापा बोले रहने दो बेटा,
    तुम कैसे कर पाओगे
    क्यूं पापा, जब मैं था छोटा
    तो मैं आपका बच्चा था
    अब मैं बड़ा हुआ हूं तो,
    अब आप मेरा बच्चा हो
    यह कहकर पापा से गले लगा,
    अब मुझे सुकून सा मिलने लगा
    ______✍️गीता

  • विश्व पटल पर हिंदी चमके

    कविता-विश्व पटल पर हिंदी चमके
    ——————————————
    विश्व पटल पर
    हिंदी चमके
    ऐसा राग सुनाता हूं,
    दुनिया भर के लोग सुनो
    क्यों हिंदी में कविता लिखता हूं,
    जब दुनिया में
    कोई भगवान नहीं
    हरि ने दुख हरा नारी का
    असुर खींच रहा था पल्लू
    हरि ने चीर बढ़ाकर-
    लाज बचाई नारी का,
    दुनिया में जब दर्द बढ़ा
    भारत से एक धीर बढ़ा,
    दुख का निवारण तब होगा
    बुद्ध शरण में जाना होगा,
    दुनिया जिसमें शौक रखे,
    महावीर उसे इनकार करें,
    नग्न ही रहकर संदेश दिया,
    कामुकता उनको छू न सकी
    ऐसे-ऐसे धीरे-वीर थे भारत में,
    ईश्वर भी माथा टेके गुरु चरणों में,
    शिष्यों में कुछ शिष्य हैं ऐसे,
    गुरु प्रतिमा सम्मुख विद्या सीखें,
    दुनिया जब शून्य से शून्य रही,
    तब भारत ने शून्य दिया,
    भारत देश निराला है
    बहुभाषी कई संस्कृत वाला है,
    आयुर्वेद मिलेगा
    योग मिलेगा,
    वैदिक ज्ञान सहित-
    गुरुकुल का इतिहास मिलेगा,
    चंद्रगुप्त की धरती है यह,
    युद्ध छोड़ जो-
    बुद्ध का उपदेश दिया
    उस अशोक की धरती है यह,
    सारी महिमा संस्कृत में
    संस्कृत, हिंदी भाषा की जननी है,
    क्यों न गाऊँ हिंदी मैं
    मेरी मातृभाषा हिंदी है
    सर्वत्र रहे यह हिंदी
    विश्व पटल पर मेरी हिंदी हो।
    ————————————
    **✍️ ऋषि कुमार प्रभाकर

  • बोलो उसकी क्या गलती थी

    तुम्हारी नादानी थी
    बोलो उसकी क्या गलती थी
    वो पेट में खेला करती थी,
    बाहर आकर दुनिया देखूंगी
    मन में सोचा करती थी।
    वो कलिका अपने जीने के
    सपने देखा करती थी,
    तुम से मम्मा कहने को
    मन ही मन आतुर रहती थी।
    लेकिन पैदा होते ही
    अपनी लाज बचाने को
    तुमने उसका गला दबाया
    मार दिया बेचारी को।
    तुम्हारी नादानी थी
    बोलो उसकी क्या गलती थी
    उसको तो कुछ पता नहीं था
    वो तो नन्हीं सी कोपल थी।

  • *विश्व हिन्दी दिवस*

    हिन्दी केवल भाषा ही नहीं,
    मेरे वतन की पहचान है
    हिन्दी का है हृदय में स्थान,
    हिन्दी ही मेरा सम्मान है
    हिन्दी की गूंज हो देश विदेश,
    ऐसा मेरा अरमान है
    हिन्दी मेरे भावों की जननी,
    हिन्दी में चले मेरी लेखनी
    हिन्दी में मेरा गर्व छिपा,
    हिन्दी में छिपा मेरा गौरव
    हिन्दी से जुड़ी मेरी सब मेरी भावना,
    हिन्दी का हो विश्व प्रचार खूब
    अब यही है मेरी कामना
    भारत की बेटी है हिन्दी,
    भारत के भाल की है बिंदी
    कश्मीर से कन्याकुमारी तक,
    हिन्दी हिन्द की पहचान है
    हिन्दी में ही हो मेरी भावभिव्यक्ति,
    हिन्दी है मातृभूमि पर मिटने की शक्ति
    आइए हिन्दी बोलें, सीखे और सिखाएं,
    विश्व हिन्दी दिवस की आज आपको शुभकामनाएं।
    ______✍️गीता

  • प्रवासी भारतीय

    अपने वतन की मिट्टी को,
    क्या कभी तू भुला पाएगा
    जिस आंगन में खेला-कूदा,
    क्या वो याद ना आएगा
    जिस विद्यालय कॉलेज से
    ली शिक्षा तुमने युवक
    क्या उसके प्रति भी,
    नतमस्तक ना हो पाएगा
    जिस डिग्री के बलबूते गया परदेस,
    वह डिग्री यहीं से पाई थी
    क्या उस डिग्री को देख कर भी
    आंख ना कभी भर आई थी
    बन-संवर कर जहां से चला था,
    क्या वो गलियां याद ना आती हैं
    वो घर,शहर तेरा देश तेरी राह देखता
    वो यादें कभी तो याद आएंगी,
    तू लौटकर आएगा एक दिन,
    ये मिट्टी तुझे बुलाएगी ।
    _____✍️गीता

    प्रवासी भारतीय दिवस पर मेरी ओर से प्रस्तुति

  • ठेके का रिक्शा खींच दिन भर

    आ बैठ जा
    मैं गीत लिख दूँ आज तुझ पर
    है उपेक्षित तू सदा से
    ठण्ड की रातों में
    सोता है खुली ठंडी सड़क पर।
    ठेके का रिक्शा खींच दिन भर
    जो कमाता है उसे
    भेजता है गांव में परिवार को,
    रोज खपता है भले
    रविवार हो शनिवार हो।
    हांफ जाता है चढ़ाई पर
    जोर टांगों से लगाकर
    शक्ति को पूरी खपाकर
    मंजिलें देता पथिक को,
    सब यही कहते हैं कम कर
    कोई नहीं देता अधिक तो।
    जो मिला कम खा बचा
    कर्तव्य अपने है निभाता
    पत्नी-बच्चे, वृद्ध वालिद
    पेट भरकर है खिलाता।
    इस तरह तू इस शहर में
    खींच रिक्शा है कमाता
    जिन्दगी को जिन्दगी भर
    खींच कर अपनी खपाता ।

  • दुख-सुख का निरंतर चक्र है

    मन !!जरा सी बात पर
    तू मत दुखित हो इस तरह
    जिन्दगी है हार भी है
    जीत भी, संघर्ष भी।
    गर कभी है अवनयन तो
    है यहां उत्कर्ष भी।
    डूबने का भय कभी है
    तो कभी है नाव भी
    है कभी ढलती पहाड़ी
    और है चढ़ाव भी।
    है कभी खुशियों की बारिश
    है कभी दुःख की डगर
    इन सभी को देखकर अब
    मन मेरे तू दुख न कर।
    सब लगा रहता है
    दुख-सुख का निरंतर चक्र है
    ईश खुश है तो कभी
    उसकी नजर भी वक्र है।
    राह में कंटक भले हों
    हैं सजे कुछ फूल भी,
    याद रख खुशियों की बातें
    दर्द के पल भूल भी।
    मन !!जरा सी बात पर
    तू मत दुखित हो इस तरह
    जिन्दगी है हार भी है
    जीत भी, संघर्ष भी।
    गर कभी है अवनयन तो
    है यहां उत्कर्ष भी।

  • सत्य के लिए लड़ना पड़ता है

    यह संसार है
    यहां के कुछ नियम होते हैं
    यहाँ दिखावे की बजाय
    लोग दिल से अपने बनाने होते हैं।
    यहां इज्जत पाने से पहले
    दूसरे को सम्मान देना पड़ता है।
    शिखर में चढ़ने के लिए
    झुकना भी पड़ता है,
    दिलों में राज करने के लिए
    त्याग करना पड़ता है,
    स्वार्थ त्याग कर
    दूसरों के लिए भी
    कुछ करना पड़ता है।
    सत्य के लिए लड़ना पड़ता है,
    अन्यथा सब नहले के दहले होते हैं,
    कौन किस से कमतर होता है,
    वक्त आने पर
    सीधा भी प्रखर होता है।

  • ऐ ज़िन्दगी तेरा शुक्रिया

    ऐ ज़िन्दगी तेरा शुक्रिया
    ज़िन्दगी तूने जो दिया,
    उसके लिए तेरा शुक्रिया
    कल कहने का वक्त मिले ना मिले,
    जो भी तूने मेरे लिए किया
    उसके लिए तेरा शुक्रिया
    बचपन में ऐ ज़िन्दगी तूने ख़ूब हंसाया मुझे,
    जवानी में मेहनत करना सिखाया मुझे
    मेहनत से जो मिला ,
    उसके लिए भी तेरा शुक्रिया
    ऐ जिंदगी तेरा शुक्रिया
    किसी के काम आ सकूं मैं कभी,
    तूने ही सिखाया है ऐ जिंदगी
    तेरी सीख के लिए तेरा शुक्रिया,
    ऐ ज़िन्दगी तेरा शुक्रिया
    चलते चलते कभी गिरी,
    गिरते-गिरते कभी उठी
    संभालने के लिए तेरा शुक्रिया,
    ऐ ज़िन्दगी तेरा शुक्रिया
    आगे भी साथ देना यूं ही
    थामे रहना मेरा हाथ यूं ही
    करती रहूं मैं तेरा शुक्रिया,
    ऐ ज़िन्दगी तेरा शुक्रिया
    ____✍️गीता

  • सबकुछ ये सरकार खा गई

    राशन   भाषण  का  आश्वासन  देकर कर  बेगार  खा गई।
    रोजी रोटी लक्कड़ झक्कड़ खप्पड़ सब सरकार खा गई।
     
    देश   हमारा   है    खतरे   में,   कह    जंजीर    लगाती   है।
    बचे   हुए   थे  अब तक जितने, हौले से अधिकार खा गई।

    खो खो  के घर  बार जब अपना , जनता  जोर  लगाती है।
    सब्ज बाग से  सपने देकर , सबके  घर  परिवार  खा गई।

    सब्ज  बाग  के  सपने    की   भी,  बात  नहीं  पूछो   भैया।
    कहती  बारिश बहुत हुई है, सेतु, सड़क, किवाड़  खा  गई।

    खबर उसी की शहर उसी के दवा उसी की  जहर उसी  के,
    जफ़र उसी की असर बसर भी करके सब लाचार खा गई।

    कौन  झूठ से  लेवे   पंगा , हक    वाले   सब   मुश्किल में।
    सच में झोल बहुत हैं प्यारे ,नुक्कड़ और बाजार खा गई।

    देखो  धुल  बहुत शासन   में , हड्डी लक्कड़  भी ना छोड़े।
    फाईलों   में  दीमक  छाई  सब  के सब  मक्कार खा गई। 

    जाए थाने  कौन सी साहब, जनता रपट लिखाए तो क्या?
    सच की कीमत बहुत बड़ी है, सच खबर अखबार खा गई।

    हाकिम जो कुछ भी कहता है,तूम तो पूँछ हिलाओ भाई,
    हश्र  हुआ क्या खुद्दारों का ,कैसे  सब  सरकार  खा  गई।

    रोजी  रोटी  लक्कड़  झक्कड़ खप्पड़ सब सरकार खा गई।
    सचमुच सब सरकार खा गईं,सचमुच सब सरकार खा गईं।

    अजय अमिताभ सुमन

  • तुम्हारी भाग वाली खोपड़ी है

    हमारी मुफलिसी को क्या समझो तुम
    तुम्हारे महल, हमारी झोपड़ी है,
    हमारी राह में संघर्ष खड़ा
    तुम्हारी भाग वाली खोपड़ी है।
    हमें नसीब बड़ी मुश्किल से
    रोटियां पेट भर को खाने को,
    तुम्हारे पास फेंकने को है,
    कूड़ेदानों में डालने को है।
    तुम्हें तो मूल्य का पता ही नहीं
    दाने-दाने में कितना जीवन है,
    उसके एवज में रात-दिन खपते
    तब कहीं साँस लेता जीवन है।
    तुन्हें जीवन मिला है वरदानी
    विधाता ने दिया है धन-पानी
    उड़ाओ खूब मजे ले लो मगर
    नजर बना के रखो इंसानी।

  • आ मेरे मीत!! कर बहाने मत

    आ मेरे मीत!! कर बहाने मत
    दे मुझे अश्रु से नहाने मत,
    बह रहे भाव खूब आंखों से
    अब इन्हें रोक ले, दे आने मत।
    जब से फेरी है तूने पीठ मुझे
    तब से मन के चिराग मेरे बुझे,
    ऐसा लगता है तनिक सी भी नहीं
    रही परवाह मेरे मन की तुझे।
    यह हवा चल रही है छू कर तन
    तेरे बिन हो रही है बस सिहरन
    चैन लेकर चला गया है तू
    अब यहां बच गई केवल उलझन।
    आ मेरी उलझी लट बना जा तू
    विरह के गम को अब मिटा जा तू,
    आ भले दो घड़ी को आ जा तू
    खुद का चेहरा मुझे दिखा जा तू।
    ———- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
    काव्य विशेषता- यह परकीय विरह की कविता है। इसमें श्रृंगार के वियोग पक्ष को अभिव्यक्त करने का प्रयास है। नायिका की विरह वेदना है।

  • कवि का धर्म

    मुक्तक-कवि का धर्म
    ————————-
    कवि का कोई
    धर्म नहीं हो सकता है,
    मंदिर मस्जिद चर्चो में
    भगवान नहीं हो सकता है,
    दुख को दुख कहता है जो
    सुख को सुख कहता है जो
    खुद के ,चाहे औरों पर हो,
    सबके आंसू को आंसू समझे,
    लाख मुसीबत आए उस पर,
    सत्य के सिवा कुछ ना समझे
    जो मानव को नीच बताएं
    वह इंसान नहीं हो सकता है,
    गाली बकते नारी को जो,
    ईश्वर से आशीष नहीं पा सकता है,
    सम्मान करो अपमान नहीं
    इंसान बनो भगवान नहीं
    भक्त-मित्र बनो सुदामा जैसे,
    मत भक्त बनो रावण जैसे,
    गीत लिखो या प्रीत लिखो,
    हार लिखो या जीत लिखो,
    लिखना जो भी सोच समझ के लिख
    देश धर्म जनता के सब हित में लिख
    ———————————————
    —-ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’

  • लगा जैसे मां आ गई

    पूस की ठंड में,
    वह सिकुड़ता सिमटता सा जा रहा था
    कोहरा भी उसकी ओर आ रहा था
    सूर्य भी धरा से विदा लेकर,
    अपने भवन जा रहा था
    दिन ढलने लगा था,
    तिमिर छलने लगा था
    आग तापने की सोची उसने,
    तभी झमाझम जल गिरने लगा था
    फुटपाथ पर इतनी ठंड में,
    कहां जाए वो बेचारा
    ना कोई घर है उसका,
    ना कोई है सहारा
    बचने को आ गया,
    एक छप्पर के नीचे
    एक छोटी सी शॉल को
    लपेटता ही जा रहा है,
    तभी उसने देखा कि,
    सामने से कोई आ रहा है
    अधेड़ उम्र की एक महिला आ गई,
    उसको एक स्वेटर थमा गई
    आ गई उसकी जान में जान
    एक पल को लगा उसे,
    जैसे उसकी मां आ गई।
    _____✍️गीता

  • कमा लो धन भले कितना

    कमा लो धन भले कितना
    मगर नजरें धरा पर हों,
    किसी को तुच्छ मत समझो,
    नजर से सब बराबर हों।
    पढाई उच्च हासिल कर
    मिला प्रमाण कागज में
    वही व्यवहार में दिख जाये
    तब है बात कागज में।
    अन्यथा कुछ नहीं है
    शून्य है जो भी पढ़ा हमने
    अगर व्यवहार में लाये नहीं
    तब क्या पढ़ा हमने।
    कमाया हो अरब से भी अधिक
    लेकिन किसी धनहीन का
    सहारा बन न पाये गर
    कमाया क्या भला हमने।
    भलाई साथ जाती है
    अधिक रहता यहीं पर है,
    किसी को भी हमेशा को
    नहीं रहना जमीं पर है।

  • पूस की रात

    पूस की रात
    ————-
    कड़कड़ाती सर्दी,सिसकती सी रात
    ठिठुरन, सिहरन आरंपार।
    पूस की रात जो हुई बरसात
    कांप उठी सारी कायनात।
    ना जाने कब
    होगी ये प्रातः।

    ठंड और कोहरे ने
    गला दिए हाड़ मांस।
    खून जम चुका है
    प्रभु से लगी है आस।

    कांप रहे जन
    जिनका नहीं है बसेरा कही।
    शीत से बचने को
    चिथडो में
    लिपटे कुछ प्राण है।

    शीत का प्रकोप जारी
    ठंड है या कोई महामारी
    जान पे बनी है
    कायनात पर पड़ी हैं भारी।

    एक तरफ जश्न है
    लोग सब मगन है
    एक तरफ कफ़न है
    इस ठंड में भी नग्न है।

    दीनो को संभालो प्रभु
    देवदूतों को उतारो प्रभु
    सड़के बनी शमशान
    अब तो देदो प्राण दान प्रभु।

    चक्र को घुमाओ प्रभु
    संकट मिटाओ प्रभु
    द्रोपदी की साड़ी सा
    कंबल बन जाओ प्रभु।

    रक्षक तो थे ही
    रक्षाकवच बन जाओ प्रभु।

    निमिषा सिंघल

  • लम्हे

    लम्हें
    —–
    कुछ गहरे घाव से दुखते होंगे,
    कुछ गहरे तंज जो आज भी चुभते होंगे।
    कुछ वक्त के मरहम से भर चुके होंगे,
    कुछ सुगंधित फूल से महकते होंगे।
    कुछ लम्हें तोहमतें,
    कुछ तोहफों से जंचते होंगे।
    कुछ लम्हें ख्वाबों के उड़ानों के,
    कटे पंखों से भी उड़ते होंगे।
    कुछ लम्हें बंजारे तो कुछ बेहद दिलकश लगते होंगे। ‌
    खट्टी-मीठी सी जिंदगी
    के सारे पन्ने,
    कभी कड़वे तो कभी रसीले लगते होंगे।
    चलो कुछ कड़वापन भुलाते हैं,
    मीठे लम्हों की कश्ती के चप्पू चला कर…
    ए जिंदगी कहीं दूर निकल जाते हैं।
    निमिषा सिंघल

  • सफलता

    सफलता
    ———–
    बुझ रहे हो दीयें सारे, ओट कर.. जलाए रखना।

    जल विहीन भूमि से भी, तुम….
    निकाल लोगे जल..
    विश्वास को बनाए रखना।

    अंधकार व्याप्त हो.. सूर्य की तलाश हो,
    मार्ग जुगनूओं की रोशनी से तुम सजाए रखना।

    मुश्किलें मिले अगर, डर के लौटना न तुम..
    आत्मविश्वास की चमक चेहरे पर खिलाए रखना।

    मान को बनाए रखना,
    सम्मान को बचाए रखना।
    रच दो इतिहास , ऐसा परचम फहराये रखना

    ज्ञान की मशाल से रोशनी फैलाएं रखना।
    जीत लेना दुनिया को,
    ह्रदय सदा विशाल रखना।

    अस्थियां जलाकर अपनी वज्र का निर्माण कर,
    सूर्य की तपिश को भीनी चांदनी बनाए रखना।

    तप कर… चोट खाकर ही
    निखरता है सोना खरा,
    उस तपन की शुद्धता को व्यक्तित्व में समाये रखना।

    स्वेद की बूंदों को …ललाट पर सजाए रखना
    कर्म करके भाग्य रेखा को पुनः चमकाए रखना।
    श्रम की चमक घोल अपने कर्म में मिलाएं रखना।

    हौसला विमान हो सपनों की उड़ान हो,
    रोक पाए न आंधियां ,
    ऐसा जज्बा -ए तूफान हो।
    जीत की ललक को .. अपनी आंखों में सजाए रखना।

    पर्वतों को तुम झुका कर रास्ता अपना बना लो,
    गति कहीं अवरुद्ध ना हो मंजिले ‘जिद ‘तुम बना लो।
    लक्ष्य निरंतर भेद कर,
    खुद को अलभ्य बनाये रखना।

    निमिषा सिंघल

  • मृगमरीचिका

    मृगमरिचिका
    मृगतृष्णा यह जीवन सारा
    तृष्णा में डूबा जाता है,
    तृष्णाग्रस्त हो खोया रहता है,
    हाथ नहीं कुछ आता है।

    मरुभूमि में उज्जवल जल सा…
    बार-बार बहकाता है।
    कस्तूरी की तरह दिशाविहीन हो भटका- भटका जाता है।

    रेत खार की परतों पर
    सूर्य, चंद्र जब प्रकाश बरसाता है,
    लगता जैसे भरा जलाशय
    पास जाओ तो अदृश्य हो जाता है।

    दीपक तले पतंगा फिर फिर -फिर,
    आकर्षित हो जाता है।
    अपने पंख जलाकर
    औंधे मुंह धरती पर आता है।

    चांद से मिलने खोई चकोरी
    प्यासी उड़ -उड़ जाती है
    खाती है अंगार मोह में
    अपनी चोंच जलाती है।

    इटली के मैसीना जल से
    आकाश में दृश्य बनते हैं
    घर, महल हवा में दिखते
    जादुई तिलस्मी लगते है।

    जापानी तोयामा खाड़ी
    आकाश में दृश्य बनाती है
    बार-बार लोगों के मन में
    डर और भ्रम फैलाती है।

    सत्यता को जांचे बिना जब..
    तृष्णा में हम मरते हैं।
    जान नहीं पाते सच्चाई,
    भूगर्भ की उथल-पुथल से
    कोहरे और गैस से
    हवाओं में दृश्य बनते हैं।
    ऐसा ही ये जीवन सारा
    भटका -भटका जाता है।
    परमपिता में लीन हुए जो
    उन्हें कोई न भटका पाता है।

    निमिषा सिंघल

  • महफिल

    महफिल
    ———-
    महफिल में हंसते चेहरे भी. …
    अक्सर बेचैन से रहते हैं,
    वह हंसते-हंसते जीते हैं
    आंसुओं को भीतर पीते हैं।

    महफिल में रौनक छा जाती …
    जब प्रेम के नग्मे बजते हैं,
    कुछ यादों में खोए रहते हैं
    कुछ गमों को पीते रहते हैं।

    आबाद हो महफिल कितनी भी..
    मन में वीरानी रहती है,
    लोगों के बीच में रहकर भी,
    यादें आती जाती रहती हैं।

    यह नशा बहुत ही जालिम है…
    बर्बाद ये दिल को करता है,
    महफिल में हंसकर गाकर भी दिल खोया खोया रहता है।

    निमिषा सिंघल

    स्वरचित/मौलिक
    रचना #निमिषा सिंघल

  • बाबुल

    बाबुल —————- ‌‌ याद आए बाबुल जब-जब तेरी,
    आंख भर आए तब तब मेरी।
    मैं चिड़िया थी अंगना तेरे,
    चहका करती सांझ सवेरे।
    गोद में हंसती रोती गाती,
    थपकी तेरी मुझे सुलाती।
    थी बाबुल तेरी शहजादी
    याद तेरी आ आके रूलाती।
    याद आए बाबुल जब-जब तेरी,
    आंख भर आए तब तब मेरी।

    2. आती है जब याद तिहारी
    भर जाती आंखों की प्याली।
    आंखों में तस्वीर घूमती,
    बाहों में तेरी मैं झूलती
    मन को मेरे बहुत सताती।
    याद तेरी आ आके रूलाती।

    बाबुल तेरी याद सताती।

    3.प्यार दुलार से पाला तुमने,
    बाबुल तेरी याद सताती।
    अंधेरों में तेरी शक्ति
    हर पल रक्षक बन कर आती।

    कैसे कांधे लटक -लटक कर चीनी का बोरा बन जाती।
    आंख मेरी आंसू भर लाती।याद तेरी जब आके सताती।

    स्वरचित/मौलिक
    रचना #निमिषा सिंघल

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