Tag: संपादक की पसंद

संपादक की पसंद

  • जन्म-दिन का उपहार

    शिशु वस्त्रालय के पुतले से,
    एक बालक कर रहा था बातें ,
    कितने सुंदर वस्त्र तुम्हारे
    एक भी ऐसे नहीं पास हमारे।
    परसों मेरा जन्म-दिन है,
    नए वस्त्र पहनने का मन है,
    मां को मालकिन ने पैसे नहीं दिए तो,
    नई वस्त्र नहीं आएंगे।
    मां के आगे कुछ ना बोलूंगा,
    पर नयनों में अश्रु आएंगे,
    थोड़ी देर एकान्त में रो लूंगा।
    पापा भी तो नहीं हैं मेरे,
    मम्मी बोली बन गए तारे।
    मैं भी कुछ लेने को आई हूं,
    इस बालक की बातें सुनकर
    मन में ममता भर लाई हूं।
    मैं घर आ गई,
    लेकिन उस बालक की बातें,
    मेरे मन से ना गई
    अगले दिन फ़िर पहुंची उसी दुकान में,
    फ़िर उसी बालक की आवाज आई मेरे कान में
    वही बालक फिर पुतले से बातें कर रहा था।
    मैंने तुरंत एक जोड़ा खरीदा,पैक कराया
    और चौकीदार को बुलाया
    उस बच्चे तक पैकेट कैसे पहुंचाना है,
    यह सब उसको समझाया।
    पुतला बोल पड़ा बालक से,
    कल तेरा जन्म-दिन है पप्पू,
    मेरे पैरों के पास एक पैकेट है देखो,
    यह उपहार मेरी तरफ से रखो।
    पप्पू हैरानी से बोला, तुम बोलते भी हो..
    हां, कभी-कभी बोलता हूं,
    तुम जैसे प्यारे बच्चों के आगे मुंह खोलता हूं।
    कल अच्छे से जन्म-दिन मनाना,
    लो यह नए वस्त्र ही पहनना।
    भोला पप्पू पैकेट लेकर चला गया,
    एक अजीब सी खुशी मिली मुझे,
    मेरी आंख का एक आंसू छलक गया।
    _____✍️गीता

  • क्यूँ मांगे हम हाथ तुम्हारा

    क्यूँ मांगे हम हाथ तुम्हारा
    जब हमें तुम्हारी जरूरत नहीं,
    हम तुम्हारे काबिल नहीं,
    तुम हमारे मुनासिब नहीं ।।
    ———————————
    क्यूँ मांगे हम हाथ तुम्हारा
    जब हमें तुम्हारी जरूरत नहीं ।।1।।
    —————————————–
    सुना है रिश्ता बराबरी में होता
    लेकिन मेरा दिल अब किसी पे ना मरता
    तु जो चाहे कर ले सितम
    मैं सब-कुछ सह लूँगा सनम ।।
    —————————————-
    क्यूँ मांगे हम हाथ तुम्हारा
    जब हमें तुम्हारी जरूरत नहीं ।।2।।
    ————————————————
    ये रिश्ता है,
    जुटेगा उसी से
    जो लिखा है उसने
    फिर क्यूँ हम किसी से गिला करे ।।
    —————————————–
    क्यूँ मांगे हम हाथ तुम्हारा
    जब हमें तुम्हारी जरूरत नहीं ।।3।।
    कवि विकास कुमार

  • मैं सबके सामने खड़ा हूँ

    मैं सबके सामने खड़ा हूँ,
    तुम मुझे जानने की कोशिश तो कर
    मैं बतला दूँगा, मैं कौन हूँ
    तुम मन से विकार हटा के तो देख ।।1।।
    —————————————
    चलती राहों पे चलके पा सकते हो मुझे
    अंदर की आवाज को अगर ना दबाओगे
    तो मुझे शीघ्र ही खोज लोगे तुम
    मैं वहीं हूँ, जहाँ तुम हो ।।2।।
    ———————————
    दुनिया की भीड़ तुम्हें लाख मारने की कोशिश कर
    लेकिन मैं तुम्हें हरवक्त साथ दूँगा
    तु मेरा नाम जिह्वा से सिद्ध करके तो देख
    मैं सबके सामने खड़ा हूँ ।।3।।
    ———————————–
    कवि विकास कुमार

  • बुरा नहीं है जग में कोई

    जय श्री राम ।।
    —————————–
    बुरा नहीं है कोई जहां में
    हर लोग हरि-खिलौना है,
    सबका अपना-अपना पाठ है,
    सबको वही निभाना है ।।
    ———————————–
    बुरा नहीं है कोई जहां में
    हर लोग हरि-खिलौना है ।।1।।
    ————————————-
    तीन गुण होता नरों में
    मायापति की माया सबको नचाती है,
    मन ही राम को मारती है,
    मन ही राम को जीताती है ।।
    —————————————–
    बुरा नहीं है कोई जहां में
    हर लोग हरि-खिलौना है ।।2।।
    ——————————————-
    मन भटका, माया मारी
    तब जाके मायापति की याद आई
    राम नाम है, जग में हर दुःख की दवा
    जो कोई लेता इसे, वही जीतता मन की व्यथा ।।
    ———————————————-
    बुरा नहीं है कोई जहां में
    हर लोग हरि-खिलौना है ।।3।।
    कवि विकास कुमार

  • दोहरा चरित्र

    जब भी प्रेम करने वालों को कोसा गया
    मैंने बंद कर लिए अपने कान…
    जब भी प्रेमियों पर अत्याचार किये गए
    मैंने मूँद लीं अपनी आँखें…!!

    जब भी किसी प्रेमी युगल ने देखा मेरी तरफ
    उम्मीद से, मैंने उन्हें निराश किया..
    अखबारों में आये दिन छपने वालीं
    प्रेमियों के कत्ल की खबरें भी
    रहीं मेरे दिल पर बेअसर…!!

    अपनी कविताओं में प्रेम के क़सीदे
    पढ़ने वाले हम….
    प्रेम की ताकत का बखान
    करने वाले हम…
    अपने लेखन में प्रेमियों की हिमायत
    करने वाले हम…
    अपने जीवन मे क़भी डटकर खड़े नहीं हो
    पाते सच्चा प्रेम करने वालों के साथ…!!

    वास्तव में प्रेम पर लिखीं गईं हमारी सारी
    कविताएं कोशिशें हैं अपनी धिक्कारती हुई
    अंतरात्मा की आवाज़ को दबाने की…!!
    दरअसल हम बेचारे हैं
    निश्चित ही हम दोहरे चरित्र के मारे हैं…!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • मेरी कल्पना

    जी करता है कागज में तस्वीर तेरी ऊतार दूं ,
    दिल के किसी कोने का राज उसमें उकेर दूं |
    ख़्वाब में था जो, हकीकत में उसे देख रहा हूं ,
    खुद पे नहीं अंकुश, मन विचलित कर जाता हूं |

    कल्पना थी कि कोई मुझसे भी प्रेम करे ,
    इस टूटे हुए दिल का हाल मुझसे पूछ पड़े |
    इंतजार में अखियां जन्मों से तरसी हुई हैं ,
    चेहरा है सामने पर सवाल अब भी वही है |

    जिस तरह राधा, कृष्ण की दीवानी थी कभी ,
    तुम भी अपने इस कृष्ण में आज समा जाओ |
    प्रेम अपने भीतर का लफ्जों तक ले आओ ,
    संकोच भरा है हृदय का, इजहार से मिटा दो |

  • रमता योगी बहता पानी

    JAY SHRI RAM

    वृक्ष कबहुँ नाही फल भखे,
    नदी ना संचे नीर
    परमारथ के कारण साधुन धरा शरीर ।।
    ———————————————–
    रमता योगी बहता पानी
    कभी न रूकता सुनो रे भाई!
    जिसको जिससे मिलना है
    मिलकर ही रहेगा ।
    जो मरा है अबतक
    उसको एक दिन जीना ही पड़ेगा ।।
    —————————————
    रमता योगी बहता पानी
    कभी न रूकता सुनो रे भाई! ।।1।।
    ———————————
    मन-माया लाख कोशिश कर ले,
    नैनन को दबाने को
    पर एक दिन आत्मा तो परमात्मा से मिलती ही है ।।
    ——————————————————-
    रमता योगी बहता पानी
    कभी न रूकता सुनो रे भाई! ।।2।।
    ————————————–
    मोहान्ध कब-तक होओगे
    कब-तक अंदर की आवाज को दबाओ
    एक-ना-एक दिन खूद को जानोगे ही
    उस-दिन खूद को पाओगे ।।
    ———————————–
    रमता योगी बहता पानी
    कभी न रूकता सुनो रे भाई! ।।3।।
    ————————————–
    राम भक्त विकास कुमार

  • उमंग रोशनी है, उसे न मंद रखना

    उमंग ऐसी जगाओ स्वयं के जीवन में,
    फटक न पाए निराशा कभी भी जीवन में।
    रखी नहीं रहती सजा के थाल में खुशियां,
    वरन स्वयं की मेहनत से,
    जीतनी आज हैं तुम्हें खुशियां।
    उमंग रोशनी है, उसे न मंद रखना,
    हौसले कम न हों बुलंद रखना।
    फूल से बन सको, न बन पाओ,
    मगर तहजीब में सुगंध रखना।
    कष्ट को तेल की कढ़ाई सा
    स्वयं को मानकर जलेबी सा
    पहले तपना उबलना भीतर तक
    खांड में जा मिठास पी लेना।
    खुद के अनुकूल कर परिस्थिति को
    कष्ट के बाद सुख से जी लेना।
    उमंग बढ़ती रहे बढ़ती रहे
    उमंग पर उमंग पा लेना।

  • समय कीमती धन

    समय कीमती धन है सबसे,
    सृष्टि का निर्माण हुआ है तब से।
    समय खर्च करने से आपको,
    कुछ धन मिल सकता है।
    किंतु धन खर्च करने से,
    बीता समय नहीं मिलता है।
    सोच समझ कर समय खर्च करो,
    बेवजह ना इसको व्यर्थ करो।
    जीवन में हमें समय देते हैं जो लोग,
    हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं वो लोग।
    या यूं समझो कि….
    उनके लिए महत्वपूर्ण हैं हम,
    तभी तो देते हैं वह हमें अपना कीमती धन।
    जिसका नाम है समय
    समय के साथ उनकी भी कद्र करो,
    और समय पर समय की कद्र करो क्योंकि,
    यदि समय बीत जाएगा तो फ़िर,
    मानव तुम पछताओगे।
    कितनी भी कोशिश कर लो तुम,
    बीता समय न वापस पाओगे।।
    _____✍️गीता

  • स्वयं जल कर उजाला करना है

    जिंदगी में अभाव रहते हैं
    मगर तुझे अभाव में सँभलना है,
    पैर रख कर कंटीली राहों में
    लक्ष्य तक स्वयं पहुंचना है।
    बाहरी छोड़ कर सारा दिखावा
    आत्मा के स्वरों को सुनना है।
    छोड़ कर उलझनें व घबराहट
    खूब हिम्मत का मार्ग चुनना है।
    ढक सके जो भी मन की पीड़ाएँ
    इस तरह का लिबास बुनना है।
    सब बढ़ें खूब सारी उन्नति को
    तुझे नहीं जलन में भुनना है।
    आँसुओं का बहाव आये तो
    उसे सुखा सुखा के चलना है,
    गर कभी क्रोध खुद में आये तो
    उसे रुका रुका के चलना है।
    यदि कभी पा सकें सफलता तब
    तन जरा सा झुका के चलना है।
    अभाव रोकें तेरी राह और भावों को,
    तुझे किसी भी तरह भय से नहीं दबना है।
    जब कभी घेर ले अंधेरा तब
    स्वयं जल कर उजाला करना है,
    खूब उत्साह भर निगाहों में
    निराशा का दिवाला करना है।

  • किसकी उपमा दूँ

    खूबसूरत हो मगर
    कैसे कहूँ कैसे हो,
    किसकी उपमा दूँ
    और बोलूं कि ऐसे हो।
    पुराने कवियों ने
    कहा कि फूल हो तुम
    अब बताओ नया
    क्या कहूँ कि क्या हो तुम।
    परन्तु कुछ तो कहूँ
    लेखनी की जिद है यह,
    कह रही श्वास का
    सहारा हो, लिख दे यह।
    जिन्दगी खूबसूरत है
    कि आप हो इसमें,
    मन रमा है सब खिला है
    आप हो इसमें
    कपोल आपके
    जिन्दगी का दर्पण हैं,
    नैन आशा है, मन की
    नासिका गुमान सी है।
    सुबह की लालिमा है
    होंठ में सजी लाली,
    नैन में रम रहा
    जो काजल है
    मनोहर सांझ का
    लगता पल है।
    समूचा चेहरा यह
    क्या लिखूं किस कि कैसा है
    पेड़ में लग रहे
    लाली लिए फल जैसा है।

  • पर्यावरण क्या है

    कविता-पर्यावरण है क्या
    ——————————-
    सभी सुनो,
    पर्यावरण है क्या,
    क्या इसकी परिभाषा है,
    प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से,
    जीव जंतु मानव –
    जिससे प्रभावित हो,
    उसी को कहते पर्यावरण है|
    अंबर भू धूप हवा
    पानी वर्षा भूख अकाल
    दूषित जल कोयला कंकड़
    मोरम मिट्टी अंबर बिजली
    सब पर्यावरण के अंश ही है|
    मानव जिससे पीड़ित होगा,
    मानव जिससे हर्षित होगा,
    दूषित जिससे अंबर होगा,
    सरिता जिससे सूखी होगी,
    सागर की सारी मछली-
    पानी में रहकर भूखी होगी,
    या पानी पीकर मरती होगी,
    समझ जरा जग के बंदे
    कांटा उपवन पर्वत नंगे,
    जल थल अंबर सब दूषित है,
    यह बात सभी पर्यावरण के अंतर्गत है
    ———————————————
    –✍️ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—

  • क्यों समझते हो नहीं

    मजबूरियां तुम दूसरे की
    क्यों समझते हो नहीं,
    भाव दिखते वेदना के
    क्यों समझते हो नहीं।
    गोद में बच्चा पकड़कर
    ठुस भरी बस में कोई
    माँ खड़ी हो तो उसे
    क्यों सीट देते हो नहीं।
    यदि कोई बालक किसी का
    हो भटकता राह में,
    ला उसे सदमार्ग में
    क्यों लीक देते हो नहीं।
    गर कोई माने न माने
    फर्ज अपना मानकर
    पथ भटकते को भला
    क्यों सीख देते हो नहीं।
    जब कोई बच्ची दिखाती
    खेल रस्सी में कदम रख
    तालियों के साथ
    मजबूरी समझते हो नहीं।
    मूंगफलियां बेचते जो
    दौड़ते हैं गाड़ियों में
    उन निरीहों की व्यथा को
    क्यों समझते हो नहीं।

  • आपसे दूर हूं

    कविता-आपसे दूर हूं
    ————————-
    पापा मैं आपसे दूर हूं
    आपके आशीष से भरपूर हूं,
    कमबख्त काम ने घेरा है मुझे
    ऐसा बंधक है बनाया
    न गांव आ सकता
    ना शहर छोड़ सकता,
    गांव में जब आता हूं,
    शरण स्नेह पाता हूं,
    सरकार अब तुम दया करो,
    मां बाप से बच्चों को न अलग करो,
    शहर के जैसा गांव में भी,
    अच्छी, सस्ती ,सुविधा ,युक्त,
    यूनिवर्सिटी की व्यवस्था करो,
    क्यों जाएं दूर शहर
    प्रेम पर ना ढाओ का कहर,
    मात-पिता संग रहने दो
    उनकी आज्ञा में चलने दो
    मम्मी पापा का छांव मिलेगा,
    स्नेह संस्कार से हर बालक,
    उच्च आदर्शों के संग आज्ञाकारी बनेगा,
    ना कोई फिर
    एसिड फेंके,
    ना हत्या –
    ना जुर्म करें,
    बाल अपराध घट जाएगा,
    जिस दिन से मम्मी पापा का –
    पैर छूकर, बच्चा कॉलेज विश्वविद्यालय जाएगा
    ————————————————-
    कवि-ऋषि कुमार प्रभाकर

  • स्मृति शेष

    ईमेल, चैटिंग ही अपना भविष्य
    क्या हस्तलेखन अब है स्मृति शेष ?
    नववर्ष का कार्ड नहीं
    प्रेमपत्र लेखन स्वीकार नहीं
    कलम कागज का जमाना बना अतीत विशेष
    क्या हस्तलेखन अब है स्मृति शेष ?
    क्या बस गोल वृत को काले-नीले से
    भरकर पूर्ण करन ही इसकी जिम्मेदारी
    हस्ताक्षर करने को ढूंढा करते नर- नारी
    शर्ट की शोभा नहीं मांगने की लगी बीमारी
    नहीं रह पाएगी यह सर्जनात्मक क्षमता विशेष
    क्या हस्तलेखन अब है स्मृति शेष ?

  • मगर तुम पंख उगाओ(कुंडलिया छन्द)

    ऊंचे उड़ना चाहता, है मेरा मन आज,
    लेकिन पंख उगे नहीं, माने खुद को बाज।
    माने खुद को बाज, हवा में उड़ता है बस,
    भूल असलियत स्वयं, भूमि पर गिरता है बस।
    कहे लेखनी उड़ो, मगर तुम पंख उगाओ,
    निज मेहनत से तुम, सच्ची मंजिल को पाओ।
    *************************
    चादर छोटी रह गई, पैर देखते ख्वाब,
    ठंड लग रही ठंड को, आग में है अब्वाब।
    आग में है अब्वाब, मिटे अब कैसे ठिठुरन,
    चादर छोटी नहीं, मगर उसमें है सिकुड़न।
    कहती कलम जितनी, चादर है पैर खोलिए,
    छोड़ सभी उलझनें, खुशी के बोल बोलिए।
    —— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय
    विशेष- कुंडलिया छन्द।

  • भूखा गली में सोया

    दर्द आम जन का
    समझो तो तब मनुज हो
    आवाज बन सको तो
    सचमुच में तब मनुज हो।
    भूखा गली में सोया
    पूछा नहीं किसी ने
    बच्चा भी उसका रोया
    पूछा नहीं किसी ने।
    वो गिर पड़ा अचानक
    पैरों में दम नहीं था,
    लोगों ने समझा कोई
    दारू पिया हुआ है।
    पैसे का बल दिखा कर
    शोषण किया था उसका
    सब देख कर भी हमने
    यह मुँह सिया हुआ है।
    मतलब ही क्या है हमको
    लूटे किसी को कोई,
    यह सोच कर ही हमने
    यह मुँह सिया हुआ है।
    वो रो रही थी पथ में
    हमने न पूछा कुछ भी
    हम चल दिए फटाफट
    यह मुँह सिया हुआ है।
    ठंडा उसे लगा था,
    चिपका हुआ था माँ से
    हमने किया न कुछ भी
    यह मुँह सिया हुआ है।
    ऐसे में कैसे बोलें
    हम दर्द जानते हैं,
    इंसान-जानवर में
    हम फर्क जानते हैं।
    सचमुच में यदि मनुज हैं
    मुँह खोलना ही होगा,
    दर्द में मनुज के
    कुछ बोलना ही होगा।

  • बावरी

    कविता-बावरी
    ——————–
    सुन बावरी
    क्यों लड़ती है मुझसे,
    एक दिन रूठ जाऊंगा,
    तूझे क्या पूरा शहर छोड़ जाऊंगा,
    संग में कॉलेज आना जाना,
    पार्को में समय बिताना,
    होटल में खाना खाना,
    फोन पर चैटिंग करना
    मेरे खातिर मम्मी पापा से,
    चैटिंग नंबर रोज मिटाना,
    छत से छिप छिप कर बातें करना,
    फिर किसके संग करेगी तू,
    जब मैं ही ना रहूं इस दुनिया में,
    इसीलिए तो कहता हूं
    जब तक हूं मिल ले मुझे से,
    जब तक हूं लड़ ले मुझसे,
    कहती नहीं क्यों नहीं मन की बात
    मैं समझ गया अब
    क्यों लड़ती है मुझसे
    चल चाह तेरी मैं पूरी कर दूँ,
    मम्मी पापा को आज बुला ले,
    सिंदूर से तेरी मांग सजा दूं,
    मरने का श्राप सदा देती है
    क्रोध में आ कर लड़ती है
    जिस दिन भर दूँ, मांग मैं,
    करवा चौथ का व्रत रखकर,
    रहूं सुहागन ईश्वर से वरदान भी मागेगी,
    ————————————————-
    **✍️ ऋषि कुमार प्रभाकर—

  • मेरा मन भी करता है

    इन मैले वस्त्रों में घूमूं,
    अच्छा नहीं लगता है।
    मैं भी कुछ बनूं,उडूं गगन को चूमूं,
    मेरा मन भी करता है।
    माँ संग जाना बर्तन धोना,
    अच्छा नहीं लगता है।
    मैं भी कुछ पढूं-लिखूं,
    मेरा मन भी करता है।
    फ़िर आकर अपनी झुग्गी में,
    मन्द रोशनी में बैठूं,
    अच्छा नहीं लगता है।
    मेरे घर भी बल्ब जलें,
    पढ़कर किसी परीक्षा में बैठूं
    मेरा मन भी करता है।
    बहुत हो चुका घर-घर का काम,
    अब मैं भी विद्यालय जाऊं,
    मेरा मन भी करता है।
    मैंने माँ का मैला आंचल ही देखा,
    सदा मन मारते देखा,पर
    अब अच्छा नहीं लगता है।
    पढ़ लिखकर कुछ काबिल बन कर,
    माँ को सुंदर साड़ी भेंट करूं,
    मेरा मन भी करता है।
    ____✍️गीता

  • सुख दुःख

    एक विरोधाभास रहा है
    हमेशा से हमारी कल्पनाओं
    और वास्तविकता के बीच..!!

    जहाँ कल्पनाएं सुख की मीठी नदी है,
    वहीं वास्तविकता दुःख का खारा सागर..!!

    मगर हम हमेशा
    वास्तविकता की अवहेलना कर
    चुनते हैं कल्पनाओं की नदी में गोते लगाना!!

    ये जानते हुए भी कि
    अनेकों नदियाँ अपना अस्तित्व खोकर
    भी मिटा नहीं सकती सागर के खारेपन को..!!
    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • गांव में आई हूं

    गांव में आई हूं मैं ।
    बहुत दिनों के बाद।
    खेतों में सरसों पीली देखी,
    गगन की रंगत नीली देखी।
    खूब चमकते तारे देखे,
    बहुत दिनों के बाद।
    गेहूं की सुनहरी बाली देखी,
    तरुवर की झूलती डाली देखी।
    गन्नों की हरियाली देखी,
    बहुत दिनों के बाद।
    चूल्हे पर बनी साग और रोटी,
    दूध पर वह मलाई मोटी।
    रस की बनी खीर खाई है,
    बहुत दिनों के बाद।
    ताजा-ताजा गुड़ बनकर आया,
    गरम-गरम गाजर का हलवा खाया,
    सभी छोटे बड़ों का प्रेम पाया,
    बहुत दिनों के बाद।
    गांव में आई हूं मैं,
    बहुत दिनों के बाद।
    ____✍️गीता

  • जहर पिला दो

    कविता-जहर पिला दो
    —————————–
    जहर पिला दो
    जहर खिला दो
    मम्मी पापा उपकार करो
    जन्म नहीं देना मम्मी
    दर्द मेरा एहसास करो
    मुझ नन्हीं बच्ची पर
    हवसी रहम नहीं करता है,
    मन की प्यास बुझा कर के
    मुझ को आग हवाले करता है
    रोती हूं खून से लथपथ
    मुंह में कपड़ा होता है
    मुंह पर चांटा मार रहा
    कुत्तों सा नोच रहा होता है
    चाह नहीं मां मैं भी आऊं
    आंचल में तेरे दूध मैं पाऊं
    होगा मां भला तेरा-
    दूध के संग जहर पिला दो,
    बचपन बीते संग संग तेरे,
    मिले सयानी सब के संग,
    जात पात के भेंट चढ़ जाऊंगी
    जिस दिन मम्मी तुम सबको
    अपने कान्हा का पता बताऊंगी
    समय के संग
    सुंदरता आए,
    सुमन भी अपनी,
    पहचान बनाए
    क्या दोष मेरा आप बता दो
    एसिड से तन है जलता
    इससे बचने का उपाय बता दो,
    घुट घुट के मरने से अच्छा है
    झुक झुक के चलने से अच्छा है,
    मां मुझको बचपन में ही जहर पिला दो,
    खान-पान वेशभूषा पर
    मां आज भी पाबंदी है
    देश मेरा आजाद हुआ है
    निर्भय होकर मुझे –
    चलने की आजादी नहीं है
    जहर पिला दो
    भ्रूण हत्या कर दो
    मां मैं तेरी प्यारी गुड़िया हूं,
    दुख नहीं मुझको
    मैं तेरे हाथों से मर जाऊंगी,
    मां समझ मुझे,
    फिर धरती पर लाना मुझे
    सब कुछ सह सकती हूं
    पर रेप का दर्द नहीं सह पाऊंगी,
    —————————————–
    कवि-ऋषि कुमार प्रभाकर–

  • लेकिन जो हुआ गलत ही था

    गणतंत्र पर ऐसा होना
    हम सबकी ही नाकामी है
    सबका पत्थर हो जाना
    हम सबकी ही नादानी है।
    न इधर झुके न उधर झुके
    सूखी लकड़ी से अड़े रहे,
    अलग रंग के झण्डे क्यों
    ऐसे राहों पर खड़े रहे।
    दुनिया हँसती है इन सब से
    ऐसी बातें तो उचित नहीं
    ऐसे उलझन को देख देश की
    जनता सारी व्यथित रही।
    चाहे कमियां जिसकी भी हों
    लेकिन जो हुआ गलत ही था
    कहना क्या है सुनना क्या है,
    यह राष्ट्र पर्व पर गलत ही था।
    नाम देश का ऐसे कैसे
    ऊँचा होगा मनन करो,
    कुछ भी हो मिलजुल कर सारे
    भारत माँ को नमन करो।

  • अपना गणतंत्र

    अपनी तमाम विषमताओं के साथ
    अनगिनत विविधताओं के बावजूद
    सबसे माकूल व्यवस्था है ‌अपना गणतंत्र।
    इस बदलते समय की बस यह मांग है
    लोक के प्रति तंत्र की सहिष्णुता
    और तंत्र के प्रति लोक की समझदारी
    लोक से परे लोक का उल्लघंन
    तंत्र की नाकामी की‌ ओर बढ़ता कदम
    कैसे कहें माकूल व्यवस्था है अपना गणतंत्र।
    अपनी है चुनौतियां, जो अपनों के द्वारा दी गई
    पङोसी बेख़ौफ़ देख हमें दम्भ से मुस्करा रहा
    अपने इस संघर्ष से हौसले दुश्मनों के बुलन्द
    ऐसे में, कैसे कहें माकूल व्यवस्था है ‌अपना गणतंत्र‌।
    समय के साथ, करते कमी अब भी दूर क्यूं नहीं
    दूर होता जा रहा, फिसलता जन गण का विश्वास
    बिखरता आत्मसम्मान आसक्त होता यह शासन
    फिर बता कैसे कहें, माकूल व्यवस्था है गणतंत्र ।

  • गणतंत्र दिवस की झांकी

    सुन्दर-सुन्दर झांकियों में समाया भारत,
    आज राजधानी के राजपथ पर आया भारत।
    केरल कर्नाटक आंध्र प्रदेश अरुणाचल,
    सब की झांकी आई है।
    केरल ने नारियल के सुनहरे फाइबर से,
    सारी झांकी सजाई है।
    कर्नाटक ने स्वर्ण युग की,
    यादें ताजा करवाई हैं।
    आंध्र प्रदेश ने देखो नंदी की मूर्ति लगाई है,
    लोपाक्षी स्थापत्य कला की,
    देश को भव्यता दिखलाई है।
    अरुणाचल ने पूर्व से पश्चिम तक की,
    पुरातन सभ्यता दिखलाई है।
    यह उगते सूर्य की सुन्दर धरा कहलाई है।
    यह देखो अब दिल्ली की बारी है,
    इसकी झांकी बहुत ही प्यारी है।
    चांदनी चौक का पुनर्विकास,
    लाल किला और फतेहपुरी भी दिखलाई है।
    डिजिटल इंडिया की,
    विश्व को झलक दिखलाने को,
    आधुनिकिकरण की झांकी बनवाई है।
    तीन मॉडल रोबोट के दिखलाए,
    मोबाइल में आरोग्य सेतु डलवाए,
    आधुनिकिकरण की लहर भारत में आई है।
    दिव्यांग जन सशक्तिकरण की,
    झांकी प्रथम बार ही आई है।
    बाधा मुक्त माहौल पर है जोर,
    सांकेतिक भाषा भी दिखलाई है।
    आयुष मंत्रालय की झांकी,
    औषधीय गुण वाले पौधों का
    प्रदर्शन करने आई है।
    प्रतिरोधक क्षमता के बारे में बतलाया,
    चवनप्राश का गुण समझाया।
    स्वस्थ तन तो, स्वस्थ मन
    यह मंत्र समझाने आई है।
    लौह पुरुष सरदार पटेल की,
    झांकी भी राजपथ पर आई है।
    कोबरा कमांडोज़ के कार्यों के बारे में,
    विश्व को समझाने आई है।
    आत्मनिर्भर भारत की झांकी,
    राजधानी के राजपथ पर आई है।
    भारत के वैज्ञानिकों की बनी कोरोना की,
    वैक्सीन विश्व भर में छाई है।
    वैज्ञानिकों के सम्मान हेतु,
    भारतीय वैज्ञानिक की,
    आदम कद की प्रतिमा लगाई है।
    अशांत समुंदर में भी,
    साहसिक कार्य करने वाली
    जय जवान की झांकी आई है।
    सागर हितों की रक्षा करती,
    यह तटरक्षक की झांकी कहलाई है।
    साठ हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर,
    सड़क बनाई, दुर्गम स्थानों पर हवाई पट्टी बिछाई
    यह सेना की लाइफ लाइन कहलाई है।
    फूलों से दी अमर शहीदों को श्रद्धांजलि,
    इंडिया गेट, राष्ट्रीय स्मारक एवम् हेलीकॉप्टर,
    सब फूलों से ही बनाए।
    राजधानी के राजपथ पर
    खूब सुगंधि बिखराए।
    गणतंत्र दिवस की आप सभी को
    बहुत-बहुत शुभकामनाएं।।
    ____✍️गीता

  • जय हिंद, जय हिंद

    जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद
    जय भारत, जय भारत,
    जय भारत, जय भारत,
    जय हिंद, जय हिंद।
    हम सबको मिलकर इसकी
    उन्नति में जुट जाना है,
    सब तरफ रहे खुशहाली,
    हरियाली को पाना है।
    सब ओर कुसुम खिल जायें
    जन-जन के दिल मिल जायें,
    गुंथ एक सूत्र में माला
    भारत को मुस्काना है।
    गणतंत्र का उजियारा
    रोशन कर दे दुनिया को,
    जन-जन हो जाये तत्पर
    खुद की किस्मत लिखने को।
    राजा खुद ही प्रजा खुद
    सब राजा सब प्रजा हों
    गणतंत्र खूब फले अब
    सब बराबरी दर्जा हों।
    कमियां सब दूर किए जा
    उन्नति भरपूर किये जा,
    जय हिन्द का कहकर नारा
    भारत में नूर भरे जा।
    आओ मिलजुल कर गायें
    जय भारत के गीतों को,
    जय हिंद, जय हिंद
    जय हिंद के संगीतों को।

  • *गणतंत्र दिवस*

    भारतीय होने पर गर्व है,
    आज 26 जनवरी का पर्व है।
    देश के दुश्मनों को मिलकर हराएं,
    आओ हर घर में तिरंगा फ़हराएं।
    ना केवल जश्न मनाना है,
    ना केवल झंडा फ़हराना है,
    जो कुर्बान हुए वतन पर,
    उनको भी शीश नवाना है।
    आचरण हुआ देश का दूषित,
    चलो सब को जगाते हैं।
    हुआ था लाल रंग धरा का,
    देश के जिस-जिस लाल से,
    उन वीर शहीदों को,
    आओ मिलकर शीश झुकाते हैं।
    भूख, गरीबी और लाचारी
    आओ भारत भूमि से मिटाएं,
    भारत के हर वासी को,
    उसके सब अधिकार दिलाएं।
    आओ मिलकर नए रूप में,
    हम गणतंत्र दिवस मनाएं।
    इस दिन को पाने को ही,
    वीरों ने रक्त बहाया था।
    वंदे मातरम और जय हिंद का,
    नारा खूब लगाया था।
    हुई थी रक्त रंजित धरा,
    जिन शहीदों के लहू से,
    हम गली-गली उन वीरों की गाथा गाएंगे,
    नई पीढ़ी तक उनकी आवाज पहुंचाएंगे।
    आओ फिर से गणतंत्र दिवस मनाएंगे।
    _____✍️गीता

  • हार जाना नहीं

    हार मिलती है मगर, हार जाना नहीं,
    सैकड़ों हार से भी, हार जाना नहीं।
    तोड़ दे यदि परिस्थिति, टूट जाना नहीं,
    प्यार कर जिन्दगी से, रूठ जाना नहीं।
    निराशा घेर लेगी, जब कभी भाव तेरे,
    उठेगा दर्द मन मन में, छिलेगा घाव तेरे।
    तब भी तू हौसले को, डिगाना मत स्वयं के,
    सदा चलते रहें यह, कर्मपथ पांव तेरे।
    अश्रु बाहर न निकलें, भाव बिल्कुल न बहकें,
    तेरे आँगन में मन के, सदा उगड़न ही चहकें।
    न हो सुनसान गालियाँ, न सुनसान आँगन,
    सदा होता रहे मन, नया सा रंग रोगन।

  • खुद पर रखो पूर्ण विश्वास तुम

    पहले खुद पर रखो
    पूर्ण विश्वास तुम,
    तब जमाने से मांगो
    खुला साथ तुम।
    हीन भावों को खुद से
    करो दूर तुम,
    शक की बातें स्वयं से
    रखो दूर तुम।
    हो गलत यदि कहीं पर
    क्षमा मांग लो
    दूसरों की कमी को
    करो माफ तुम।
    दाग अपने स्वयं ही
    करो साफ तुम,
    अपने अंतस से बाहर
    करो नाग तुम।
    खुद के व्यवहार को
    तोलना है कठिन
    खुद की कमियों में
    खुद बोलना है कठिन।
    तत्वदर्शी है वो जो
    समझता है सब,
    दूर वो करके कमी
    वो निखरता है तब।
    दम है विश्वास में
    पहले खुद पर रखो,
    हार का जीत का
    स्वाद सबका चखो।
    कह रही लेखनी
    खूब उत्साह से
    जिन्दगी को जियो
    खूब उत्साह से।

  • कविता : सम्मान तिरंगा (२६ जनवरी विशेष )

    यह तिरंगा तो ,हमारी आन बान है

    यह दुनिया में रखता ,अजब शान है

    यह राष्ट्र का ईमान है ,गर्व और सम्मान है

    स्वतन्त्रता और अस्मिता की ,यह एक पहचान है

    क्रान्तिकारियों की गर्जन हुंकार है

    विभिन्नता में एकता की मिसाल है

    एकता सम्प्रभुता का कराता ज्ञान है

    धर्म है निरपेक्ष इसका ,जाति एक समान है

    यह तिरंगा तो ,हमारी आन बान है

    यह दुनिया में रखता ,अजब शान है ||

    भेदभाव की तोड़ दीवारें

    यह सबको गले लगाता है

    राष्ट्र पर्व की पावन बेला में

    यह देश प्रेम जगाता है

    जल थल नभ में गौरवता से

    इसने अपना रंग जमाया है

    कश्मीर से कन्याकुमारी तक

    वीरों की गाथा को सुनाया है

    यह तिरंगा तो ,सरहद का निगेह बान है

    नयनों की थकानों का अभिराम है

    यह तिरंगा तो ,हमारी आन बान है

    यह दुनिया में रखता ,अजब शान है ||

    ‘प्रभात ‘ अर्जुन के धनुष की टंकार है तिरंगा

    मुरलीधर की मुरली की पुकार है तिरंगा

    बंकिम की स्वर लहरी का राग है तिरंगा

    “आनन्द मठ ” के पृष्ठों की आग है तिरंगा

    प्रगति विकास का प्रतीक ,उच्च निशान है तिरंगा

    सीमा पर लड़ने वालों का ,आत्म सम्मान है तिरंगा

    ऐ तिरंगे तेरी खातिर ,वीरों ने गोली खाई है

    अनगिनत शीष चढ़ाये ,तब आजादी पायी है

    यह तिरंगा तो , मेरे देश की माटी की मुस्कान है

    यह तिरंगा तो ,हमारी आन बान है

    यह दुनिया में रखता ,अजब शान है ||

  • सर्दी के मौसम में..

    इस सर्दी के मौसम में,
    दिन कितनी जल्दी ढलता है।
    जिसके घर में प्रतीक्षारत हो कोई,
    उसका पग घर की ओर,
    जल्दी-जल्दी चलता है।
    इस सर्दी के मौसम में,
    दिन कितनी जल्दी ढलता है।
    जो है तनहा इस जगत में,
    कोई प्रतीक्षारत भी ना हो घर में,
    उसे कौन सी जल्दी जाने की,
    वो धीरे-धीरे ही चलता है।
    इस सर्दी के मौसम में,
    दिन कितनी जल्दी ढलता है।।
    _____✍️गीता

  • लड़कियाँ

    घर आँगन में फूलों सी खिलती हुई लड़कियाँ!
    फ़ीकी दुनिया में मिसरी सी घुलतीं हुई लड़कियां!!

    उदासियों की भीड़ में हँसती हुई मिलती हैं!
    ज़िम्मेदारी के बोझ तले पिसती हुई लड़कियाँ!!

    ढल जाती हैं पानी सी हर बार नए आकार में!
    रिश्ते निभाके ख़ुद से बिछड़ती हुई लड़कियाँ!!

    लड़ रही हैं आज ख़ुद को बचाने के लिए!
    मंदिर में देवियों सी पुजती हुई लड़कियाँ!!

    निकल रही हैं खोल से अब पंख नए ले कर!
    तितली बन आकाश में उड़ती हुई लड़कियाँ!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’

  • द्रौपदी की प्रतिज्ञा

    # द्रौपदी की प्रतिज्ञा

    द्रौपदी का परिचय-

    आ खींच दुशासन चीर मेरा, हर ले मेरा सौंदर्य सजल ।
    आ केश पकड़ कर खींच मुझे, अपना परिचय दे ऐ निर्बल ।
    मैं राजवंशिनी कुल कीर्ति हूँ, गांधारी हूँ मैं कुंती हूँ ।
    अतुलित हूँ मैं अभिमानी हूँ, ना भूल अरि मैं रानी हूँ ।।

    है अग्निकुण्ड मेरा उद्भव, मुखमण्डल का ये तेज देख ।
    सौंदर्य ना मुझसा जग में द्वय, नैंनो में रति का वेग देख ।
    जग में मुझसा सौंदर्य कहाँ, है मुझसा अतुलित शौर्य कहाँ ।
    है अनल समाये अंग मेरे, मुझसा प्रचंड विध्वंश कहाँ ।।

    द्रौपदी हूँ सुन मैं नारी हूँ, ना सोच की मैं लाचारी हूँ ।
    मुझसे पलता है जग सारा, मुझमें है विष-अमृत धारा ।
    मुझमें कुरुक्षेत्र समाया है, मुझमें करुणा की रस-धारा ।।

    है यौवन मेरी मृगतृष्णा, मुझे पाने का ना स्वप्न देख ।
    हठधर्मी तू हठधर्म त्याग, नतमस्तक हो घुटनों को टेक ।
    ना भूल कर मुझे साधने की, सोच ना हद लाँघने की ।
    बंधनों से मुक्त हूँ मैं, रक्त-रंजित शस्त्र हूँ मैं ।।

    द्रौपदी की चेतावनी-

    पहचान अरि अपना हित तू, ये युद्ध प्रबल टल जाने दे ।
    हाथों को अपने जोड़ के झुक, मुझे क्रोध रहित हो जाने दे ।
    नारी सदैव गौरव गाथा, नारी नारायण की भाषा ।
    नारी में सृजन समाया है, नारी जग की मृदु अभिलाषा ।
    नारी का तू अपमान ना कर, भीषण अधर्म का काम ना कर ।
    तू ठहर, ना कर ये नादानी, ना छेड़ मुझे ऐ अभिमानी ।।

    अंतिम अवसर तूझे देती हूँ, तू सोच दण्ड मुझे छूने का ।
    अपने जीवन की रक्षा कर, वर सुखद विरासत जीने का ।।

    द्रौपदी का विलाप-

    चीरहरण का पाप किया, कुल की मर्यादा खाक किया ।
    तेरी मति गयी है मारी, जो तूने भीषण अपराध किया ।।

    नीर निरीह हुए ओझल, चछु ने चंचलता खोयी ।
    तू अबोध दुशासन ना समझ सका की वीर द्रौपदी क्यों रोयी ।
    तू बोल ये उपवन क्यों उजड़ा, ऋंगार रति का क्यों बिखरा ।
    पंचवटी सा पावन तन मेरा, लंपट नैंनो में क्यों सिहरा ।।

    शर्मसार हुई जग-जननी, करके विलाप वो रोयी है ।
    क्या चीरहरण अब धर्म हुआ, क्यों वीर सभा यूँ सोयी है ।

    द्रौपदी की रौद्र प्रतिज्ञा-

    करती हूँ प्रण ये केश खोल, ऋंगार कभी ना साधूंगी ।
    जब तक ना रक्त मिले तेरा, ये केश कभी ना बाँधूंगी ।।

    द्युत हार गये सुत कुंती के, पर शस्त्र ना हारे वीरों ने ।
    तू देख भयंकर रण होगा, अब तीर लड़ेगे तीरों से ।।

    देती हूँ तुझको परिचय अब, मेरे जीवन का प्रसंग देख ।
    तू देख मुझे आरम्भ देख, मेरे बल का तू दम्भ देख ।
    तू देख हलाहल डोला है, उद्घोष समर के बोला है ।
    ये युद्ध देख विकराल देख, अपने बच्चों का काल देख ।
    मेरे प्रण में है युद्ध छुपा, कुरुक्षेत्र की धरती लाल देख ।
    न्योछावर होते नर शीश देख, निज कुल के बुझते दीप देख ।
    तू देख दुशासन काल देख, मेरे भीतर महाकाल देख ।
    तू देख प्रलय अब आनी है, ये सूर्य तेज छिप जानी है ।
    तू देख निशब्द दिशाओं को, तू देख वीभत्स भुजाओं को ।
    तू देख व्याघ्र मंडराते हैं, हर्षित मन से मुसकाते हैं ।

    मुखमंडल का ये तेज देख, निर्भयता का संदेश देख ।।
    मैं अर्धनग्न शर्मायी हूँ, पर किंचित ना घबरायी हूँ ।

    तू सतीत्व मेरा हरने आया, यौवन मेरा वरने आया ।
    अब अग्निकुण्ड ये फूटेगा, सौभाग्य मनुज के लूटेगा ।
    बन गिद्ध निशाचर टूटेंगे, वीरों के शव को लूटेंगे ।
    हवन कुंड सज जायेंगे, कौरव आहुति बन आयेंगे ।
    धूं-धूं कर चिता जलेगा, सब वीरगति को पायेंगे ।।

    आ दुशासन खींच मुझे, अपने भुज बल से भींच मुझे ।
    कर ले तू अपने मन को शांत, हो जाने दे ये युद्ध तमाम ।

    जिस रण की थी ना चाह मुझे, तू कुरुक्षेत्र तक लाया है ।
    ये तेरे वश की बात नहीं, ये कालगति की माया है ।

    अब पांसे फेकेगा काल यहाँ, यम वीरों के केश संवारेंगे ।
    पांडव जीते या हारेंगे, पर तुम सौ को संहारेगे ।

    कवि- अजीत कुमार सिंह

  • *राष्ट्रीय बालिका दिवस की बधाई*

    बेटियों का कल बेहतर बनाने को,
    आओ उनका आज संवारें।
    बेटी पर अभिमान करो,
    जन्म लेने पर उसका सम्मान करो।
    बेटी को शिक्षा का अधिकार दो,
    बेटी को भी बेटों जैसा ही प्यार दो।
    उसकी शिक्षा में करो कोई कमी नहीं,
    विवाह करने की कोई शीघ्रता नहीं।
    बेटी से घर में रौनक है, मनता हर त्यौहार है
    बेटी प्रभु का दिया एक सुंदर उपहार है।
    तो आओ मिलकर कलंक हटाएं,
    भारत भूमि से बेटी की भ्रूण हत्या का।
    बेटी ही ना होगी तो बहू कहां से लाओगे
    फिर वंश को कैसे बढ़ाओगे।
    भ्रूण हत्या का कुकृत्य करके,
    संसार को क्या मुंह दिखलाओगे।।
    ______✍️गीता

  • प्रमाण

    अनुभव  के अतिरिक्त कोई आधार नहीं ,
    परमेश्वर   का   पथ   कोई  व्यापार  नहीं।
    प्रभु में हीं जीवन कोई संज्ञान  क्या लेगा?
    सागर में हीं मीन भला  प्रमाण क्या  देगा?

    खग   जाने   कैसे  कोई आकाश  भला?
    दीपक   जाने  क्या  है  ये  प्रकाश भला?
    जहाँ  स्वांस   है  प्राणों  का  संचार  वहीं,
    जहाँ  प्राण  है  जीवन  का आधार  वहीं।

    ईश्वर   का   क्या  दोष  भला   प्रमाण में?
    अभिमान सजा के तुम हीं हो अज्ञान में।
    परमेश्वर   ना  छद्म   तथ्य  तेरे  हीं  प्राणी,
    भ्रम का   है  आचार  पथ्य  तेरे अज्ञानी ।

    कभी  कानों से सुनकर  ज्ञात नहीं  ईश्वर ,
    कितना भी  पढ़  लो  प्राप्त ना  परमेश्वर।
    कह कर प्रेम  की बात भला  बताए कैसे?
    हुआ  नहीं  हो  ईश्क उसे समझाए कैसे?

    परमेश्वर  में      तू    तुझी   में    परमेश्वर ,
    पर  तू  हीं  ना  तत्तपर  नहीं कोई अवसर।
    दिल  में  है  ना    प्रीत   कोई उदगार  कहीं,
    अनुभव  के अतिरिक्त  कोई  आधार नहीं।

    अजय अमिताभ सुमन

  • पैदा कर लो आग

    अपनी आदत बदल कर,
    पाओ खूब सुकून।
    रोज सीखना है नया,
    ऐसा रखो जुनून।
    सोते समय नहीं कभी,
    हो उलझन में ध्यान,
    कभी कभी तलवार को
    दे दो उसकी म्यान।
    गुस्सा छोड़ो आप भी
    नींद निकालो खूब
    कभी कभी आनन्द लो
    तुम सपनों में डूब।
    छोड़ो सारी झंझटें
    रातों को लो नींद,
    वरना उलझन में समय
    जायेगा फिर बीत।
    कोशिश कर उम्मीद रख
    बदलो खुद का भाग,
    ठंडे-ठंडे मत रहो
    पैदा कर लो आग।

  • पैदाइशी समझदार तो

    पैदाइशी समझदार तो
    हम भी न थे,
    मगर परिस्थिति ने
    समझने लायक बना दिया
    पैदाइशी जिम्मेदार तो
    हम भी न थे,
    मगर छोटी सी उम्र में
    आई जिम्मेदारी ने
    जिम्मेदारी उठाने लायक बना दिया।
    हमारी उम्र के बच्चे
    गुड्डे-गुड़ियों से खेलते हैं
    औऱ हम बचपन में ही
    सयानी बन गई
    अपनी किस्मत से खेलते हैं।
    छाती से चिपका कर
    छोटे से भैया बहनों को
    फुटपाथ पर हम ठंड झेलते हैं।
    सुना है बच्चे एक गिलास सुबह
    एक शाम, दूध पीते हैं,
    हम दूध कहाँ
    आधा पेट रहकर जीते हैं।
    लोग कहते हैं समाज बहुत आगे चला गया है।
    लेकिन हमारा वक़्त वहीं का वहीं रह गया है।

  • मुझे वरदान दो

    कविता -मुझे वरदान दो
    —————————-
    वरदान दो वरदान दो
    मुझे वरदान दो,
    उठी है जो लहर मुझ में
    हो विकट रूप जैसा
    गति तेज सुनामी जैसा
    साकार हो आकार हो
    प्रकार हो ,मेरे ना विपरीत हो,
    वह काम दो ,जिससे नाम हो
    मेरे काम से पहचान हो,
    ईश्वर तुझ से ही आशा है
    ऐसा मुझे वरदान दो, वरदान……
    तूफान के वेग जैसा
    चिड़ियों के उड़ान जैसा
    हमें दो ताकत ऐसी
    गिद्ध में नेत्र ज्योति जैसी
    आकाश में विस्तार जैसी
    सरिता की धार जैसी,
    पृथ्वी के धैर्य जैसा
    मेरा पहचान हो ऐसी
    ऐसा मुझे वरदान दो,
    वरदान दो….
    हो गंगा की लहर मुझ में
    आप सबका पाप धूल जाए
    हो ऊंचाई हिमालय सी
    हवा शत्रु को रोक पाए
    मातृभूमि की सेवा में
    जीवन अर्पण कर जाएं
    मेरा सुख सबके सुख में
    सच्चा सुख मातृभूमि की रक्षा में
    सबको प्यारा हो
    ऐसा मेरा जीवन दर्शन हो, वरदान दो…
    ——————————————————–
    **✍️ऋषि कुमार प्रभाकर

  • अभिलाषा

    ये सृष्टि हर क्षण अग्रसर है
    विनाश की ओर…
    स्वार्थ, वासना और वैमनस्य की बदली
    निगल रही हैं विवेक के सूर्य को..!!

    सुनो! जब दिन प्रतिदिन घटित होतीं
    वीभत्स त्रासदियाँ मिटा देंगी मानवता को
    जब पृथ्वी परिवर्तित हो जाएगी असंख्य
    चेतनाशून्य शरीरों की भीड़ में…!!

    जब अपने चरम पर होगी पाशविकता
    और अंतिम साँसे ले रहा होगा प्रेम…
    जब जीने से अधिक सुखकर लगेगा
    मृत्यु का आलिंगन…!!

    तब विनाश के उन क्षणों में भी तुम्हारी
    उँगलियों का मेरी उँगलियों में उलझना,
    पर्याप्त होगा मुझमें जीने की उत्कण्ठ
    अभिलाषा जगाये रखने के लिए..!!

    ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
    (23/01/2021)

  • जख़्म

    जख़्म तुझको मैं दिखा देता हूँ,
    दर्द अपना मैं भुला लेता हूँ।

    पास आकर जो बैठ जाते हैं,
    उनको अपना मैं बना लेता हूँ।

    कहते हैं मुझसे मन की अपनी,
    मैं भी मन उनसे लगा लेता हूँ।

    करते हैं खुल के बातें मुझसे,
    तो खुल के मैं भी सुना लेता हूँ।

    हैं नहीं जानते दिल की मेरे,
    दिल में जिनको मैं छुपा लेता हूँ।

    बैठ ख़ामोशी से देखो मुझको,
    आँख परिंदों से मिला लेता हूँ।

    घर है ना छत है सर पर मेरे,
    राही खुद से ही खफ़ा रहता हूँ।।

    राही अंजाना

  • कविता : हौसला

    हौसला निशीथ में व्योम का विस्तार है
    हौसला विहान में बाल रवि का भास है
    नाउम्मीदी में है हौसला खिलती हुई एक कली
    हौसला ही है कुसमय में सुसमय की इकफली
    हौसला ही है श्रृंगार जीवन का
    हौसला ही भगवान है
    हौसले की ताकत इस दुनियां में
    सचमुच बड़ी महान है ||
    हौसले की नाव में बैठ जो आगे बढ़ा
    मुश्किलों के पर्वतों पर वो चढ़ा
    हौसला नव योजनाओं का निर्माण है
    हौसला विधा का महाप्राण है
    हौसले से ही उतरा धरती पर आकाश है
    हौसला ही शक्तियों का पारावार है
    हौसला है सच्चा मीत जीवन का
    हौसला ही भगवान है
    हौसले की ताकत इस दुनियां में
    सचमुच बड़ी महान है ||
    चलो खुद अपनी ताकत पर
    बदल सकते हो तकदीरें
    चमकेगा भाग्य का सूरज
    तुम्हारे मेहनतकश पसीने से
    मंजिलें दूर दिखेंगी
    अपने ख्वाबों को मत छोड़ो
    आलस छोड़ कर करो मेहनत
    व्यर्थ नहीं यों डोलो
    हौसलों के द्वारा ही मानव
    विजयपथ पर गतिवान है
    हौसले की ताकत इस दुनियां में
    सचमुच बड़ी महान है ||
    ‘प्रभात ‘ रात दिवस जीवन का धागा
    यहाँ वहां से उलझा है
    ओर नहीं है ,छोर नहीं है
    सिर्फ हौसलों से सुलझा है
    हौसलों के आगे झुक जाते
    बड़े से बड़ा शत्रु भी
    हौसले के आगे नतमस्तक है
    बड़े से बड़ा कष्ट भी
    हौसले ने ही हराया ,असम्भव शब्द को
    हर्ष में बदला है दर्द और विशाद को
    हौसलों के द्वारा ही मानव
    विजयपथ पर गतिवान है
    हौसले की ताकत इस दुनियां में
    सचमुच बड़ी महान है ||

  • खूबसूरत है नजारा

    पास बैठे हो
    बहुत ही खूबसूरत है नजारा
    कैद करना चाहता है
    इन पलों को मन हमारा ।
    जिन्दगी की खुशी
    सबसे बड़ी तो आप हो
    आज आई है खुशी जब
    आप बैठे पास हो।
    थे कहाँ अब तक
    रहे क्यों, दूर दिल की वादियों से
    अश्क की नदियों में रखकर
    क्यों छुपे थे कातिलों से।
    हम भी क्या बातें पुरानी
    कर रहे हैं आज फिर से
    ये नहीं लम्हें हैं ऐसे
    हाथ से जाने दें फिर से।
    आज आंगन खूबसूरत
    लग रहा है खूब सारा,
    खिल गये हैं फूल
    गुलदस्ता हुआ है मन हमारा।
    अब न जाना दूर
    दिल के पास ही रखना बसेरा
    रात बीती हो गया है
    नेह का सच्चा सवेरा।

  • हिन्दी गीत- तुम झूठी या मै झूठी

    हिन्दी गीत- तुम झूठी या मै झूठी
    चलो दोनों बात आज सच कहते है |
    तुम झूठी या मै झूठा
    चलो दोनों बात आज तय करते है |
    मुझको आता नही है चैन तुझको देखे बिना |
    क्यो कर लिया है प्यार तूने मुझको परखे बिना |
    एक दूजे के दिल क्यो हम रहते है |
    चलो दोनों बात आज सच कहते है |
    तुम झूठी या मै झूठा
    चलो दोनों बात आज तय करते है |
    जब आती है याद मेरी तुम क्यो तड़प जाते हो |
    हो के बेचैन मेरी बांहों मे क्यो मचल जाते हो |
    क्यो दोनों सदा संग रहते है |
    चलो दोनों बात आज सच कहते है |
    तुम झूठी या मै झूठा
    चलो दोनों बात आज तय करते है |

    श्याम कुँवर भारती (राजभर )
    कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
    बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286

  • यौवन की तकदीर (दोहा छन्द)

    सच्चा सच में रह गया, ठगा ठगा सा आज,
    आशा चोरी कर गये, अपने धोखेबाज।
    जिनके मन में जम रहा, काले धन पर नाज,
    वे भी आज सफेद से, खूब दिखे नाराज।
    भूखा चूहा रेंगता, देख रहा है बाज,
    सोच रहा है चैन से, पेट भरूँगा आज।
    आर्थिक हालत मंद है, यही सुना है आज,
    बेकारी से गिर रही, है यौवन पर गाज।
    पढ़ा-लिखा भूखा रहा, और खा रहे खीर,
    कौन लिख रहा इस तरह, यौवन की तकदीर।
    ——— डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
    मात्रागत सुधार कर संशोधन प्रस्तुत।

  • संदेश

    पुराने मित्र मेरे! जिंदगी की,
    हर ख़ुशी तुझको मिले,
    तेरी खुशियों से निकल
    कुछ तार मुझ तक भी
    जुड़े हैं, ठण्ड से सिकुड़े हुए से,
    बेरहम यादें संजोये,
    गाँठ बांधी हो किसी ने
    संवेदनाओं के गले में,
    सिर्फ सांसें ले रहा कुछ
    बोल पाता हो नहीं,
    बोलने की भी जहाँ
    कुछ आवश्यकता हो नहीं,
    बिन कहे बस सांस से
    सन्देश कहता जा रहा हो ,
    पुराने मित्र मेरे! जिंदगी की,
    हर ख़ुशी तुझको मिले।
    ……………… डा. सतीश चन्द्र पाण्डेय, चम्पावत,
    काव्य विशेषता- यह परकीय संवेदना है, पात्र के किसी बहुत पुराने मित्र से जुड़ी संवेदना है।

  • यौवन की तकदीर (दोहा छन्द)

    सच्चा सच में रह गया, ठगा ठगा सा आज।
    आशा चोरी कर गए, अपने धोखेबाज।।
    जिनके हृदय में रहा, काले धन पर नाज।
    वे क्यों ऐसे श्वेत से, आज हुए नाराज।।
    भूखा चूहा रेंगता, देख रहा है बाज।
    सोच रहा है चैन से, पेट भरूँगा आज।।
    अर्थव्यवस्था मंद है, यही सुना है आज।
    बेकारी से गिर रही, है यौवन पर गाज।।
    मेहनतकश हैं भटक रहे, और खा रहे खीर।
    कौन लिख रहा इस तरह, यौवन की तकदीर।।

  • सोच समझ के बोल

    सोच समझ के बोल रे बंदिया
    सोच समझ के बोल
    जो तु बोले, तेरा पीछा ना छोड़े
    मांगे हर अल्फाज़ अपना हिसाब
    मान-अपमान दिलवाते, दिखलाये संस्कार
    यही बनाए तेरे वैरी यही बनाए यार
    सोच समझ के बोल रे बंदिया
    सोच समझ के बोल
    छलकेगा प्यार तेरा जिन अल्फाज़ों से
    वो तेरा दामन खुशियों से भर देंगे
    करेगा क्रोध जब तु इन्ही अल्फाज़ों से
    फिर पीछा ना छूटे दर्द भरी तनहाईयों से
    सब सच है कहते
    सोच समझ के बोल रे बंदिया
    सोच समझ के बोल ।

  • खुद को कमतर आंक मत(कुंडलिया)

    खुद को कमतर आंक मत, खुद पर रख विश्वास,
    दूर रह उन चीजों से, जो देती हों त्रास,
    जो देती हों त्रास, मार्ग तेरा रोकें जो,
    उनसे मत कर नेह, तुझे कमतर मानें जो।
    कहे कलम तू प्यार, कर ले पहले खुद से
    मुश्किल सारी दूर, रहेंगी खुद ही तुझसे।
    *************************
    करना हो विश्वास जब, खुद में कर विश्वास।
    बिना कर्म के फल खाऊँ, ऐसी मत कर आस।
    ऐसी मत कर आस, कर्म ही सर्वोपरि है,
    कर्म बिना इंसान, स्वयं का ही तो अरि है।
    कहे लेखनी कर्म बिना कुछ नहीं जगत में,
    राज कर्म ही चला रहा है सदा जगत में।
    ——– सतीश चंद्र पाण्डेय।

  • *हिन्दी की परीक्षा*

    **हास्य रचना**
    हिन्दी की परीक्षा थी उस दिन,
    चिंता से हृदय धड़कता था
    बूंदा-बांदी भी हो रही थी,
    रह-रहकर बादल गरजता था।
    भीगता-भागता विद्यालय पहुंचा,
    पर्चा हाथों में पकड़ लिया,
    फ़िर पर्चा पढ़ने बैठ गया,
    पढ़ते ही छाया अंधकार,
    चक्कर आया सिर घूम गया।
    इसमें सवाल वे आए थे,
    जिनमें मैं गोल रहा करता,
    पूछे थे वे ही प्रश्न कि जिनमें,
    डावांडोल रहा करता
    छंद लिखने को बोला था,
    मेरी बोलती बंद हो गई।
    अलंकार के प्रकार पूछे थे,
    मेरी लेखनी कहीं खो गई।
    यमक और श्लेष में अंतर,
    कभी समझ ना आता था
    उपमा और रूपक का भेद भी,
    कभी जान ना पाता था।
    बस एक अनुप्रास ही आता था मुझको,
    वही अलंकार भाता था मुझको,
    उसका प्रश्न ही नहीं आया
    यमक-श्लेष और उपमा-रूपक,
    दोनों प्रश्न छोड़ आया
    गांधी जी पर निबंध आ गया,
    मैं चाचा नेहरू रट कर आया था
    लिख दिया महात्मा बुद्ध ,
    महात्मा गांधी जी के चेले थे
    गांधी जी के संग बचपन में,
    आंख मिचौली खेले थे।
    रिक्त स्थान की पूर्ति करनी थी
    सूर्य की किरणों में…..रंग हैं
    मैंने लिखा “सुनहरा”
    बाद में पता चला सात रंग,
    मैं तो हैरान था थोड़ा परेशान था
    मैंने तो बस सुनहरा रंग ही देखा,
    यह सात रंग कहां से आए,
    खैर जो होगा अब देखा जाए
    उचित मुहावरा लगाइए…
    एक अनार सौ…..
    मैंने लिखा खाने वाले,
    बाद में पता चला,”बीमार”आना था।
    यह जानकर मैं हैरान था,
    थोड़ा सा परेशान था।
    चिकना घड़ा का अर्थ….
    मैंने लिखा बहुत सुंदर
    बाद में पता चला, बेशर्म होता है
    मैं फ़िर हैरान था….
    चिकना घड़ा तो कितना सुंदर होता है।
    अंगूर खट्टे हैं का अर्थ___
    मैंने लिखा छोटे अंगूर
    बाद में पता चला___
    कोई वस्तु ना मिले तो बुरा बता दो
    अर्थात झूठ बोल दो..
    मैं हैरान था बड़ा परेशान था,
    झूठ बोलने को मना करते हैं,
    मुहावरे के नाम पर बोल दो
    इस सच से मैं अनजान था।
    मैं बालक भोला-भाला,
    मेरा ह्रदय डोल गया,
    छोटे अंगूर ही खट्टे होते हैं,
    मैं तो सत्य ही बोल गया।
    यह सौ नंबर का पर्चा था,
    मुझको दो की भी आस नहीं,
    चाहे सारी दुनिया पलटे,
    पर मैं हो सकता पास नहीं।
    परीक्षक ने सारे पर्चे जांच लिए,
    जीरो नंबर दे कर के,
    मेरे बाकी के नंबर काट लिए।
    _____✍️गीता

  • गठबंधन

    तीन छात्र थे केवल कक्षा में।
    आ बैठ गए तीनों परीक्षा में।।
    प्रथम श्रेणी में पास किया एक
    दूजा द्वितीय दर्जे को पाया।
    तीजा तेतीस फीसदी लाकर
    तीजे दर्जे तीजे स्थान पे आया।।
    अफसोस कि तीनों आखिर
    छात्रवृत्ति से कुछ दूर रह गए।
    बासठ पर पहला अटका है
    छप्पन पर मगरुर रह गए।।
    सोच में देख दोनों को तीजा
    लगा ठहाका जोर से बोला।
    मिले वजीफा पच्चासी पर
    फिर क्या मुश्किल है भोला।।
    बारी -बारी तुम दोनों से
    गठबंधन आ मैं करता हूँ।
    छःछः मास तुम दोनों संग
    निज लब्धांक शेयर करता हूँ।।
    पौ बारह में रहेंगे तीनों
    आखिर इसी आधार पर।
    लोकतंत्र सरकार यहाँ
    जब बनती इसी आधार पर।।
    हमें तो चाहिए कुछ पैसे
    आखिर पढ़ने के खातिर।
    इनको तो सबकुछ मिलता है
    वेतन पेंशन सुविधा आखिर।।

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