घास पूस की झोपड़ी
मैया है बीमार
चौदह की गुड़िया ने थामी,
है घर की पतवार।
भूख बीमारी बेहाली के
झंझावात घिरे हैं,
गलत नजर से देख रहे
श्वानों से सिरफिरे हैं।
चूल्हा-चौका सब करना है
भैया-बहनों की देखभाल,
नन्हें हाथों ने जिम्मेदारी
अच्छे से है ली संभाल।
हालातों से जूझ-जूझकर
हुए तजुर्बे जीवन के,
लगी हुई है खूब निभाने
फर्ज-कर्ज इस जीवन के।
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संपादक की पसंद
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नन्हें हाथों ने जिम्मेदारी
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कल्पतरु सी बने कविता
कल्पतरु सी बने कविता,
सब के दुख हरे कविता
बेरोज़गारों को रोज़गार मिले,
बिछुड़ों को उनका प्यार मिले
ऐसी सुंदर बने कविता,
सुरतरू सी बने कविता
शोहरत की चाह हो उसे शोहरत मिले,
दौलत की चाह हो उसे दौलत मिले
निरोग रहे सभी का तन,
खुशियों से भरा हो सबका मन
ऐसी मंगल बने कविता,
देवतरू सी बने कविता
सबका सुखी घर-संसार रहे,
ऐसी कविता मेरी कलम कहे
“गीता” कहती है कुछ कर्म करो,
हो सके तो कुछ धर्म करो
मेहनत का फ़ल मीठा होता,
ये कथन कहे मेरी कविता
_____✍️गीता -
ग़ालिब
कविता- गालिब
——————-
कवि जागो
लेखक जागो,
जागो जग के
शायर सब ,
रोयेंगे कल
यदि आज नहीं
जागे हम|
प्रकृति हमारा
खंडहर हो रहा
कल कहाँ से
उपमा लायेंगे
जब फूल नहीं
बागों में,
सुगंध नही
फूलों में,
निर्मल जल की
आस नहीं,
बोतल से-
मिटती सबकी
प्यास नही|
सूख रही
सरिता सारी
रोती आज
धरा भी है
बे मौसम
वर्षा होती है
प्यासी धरती
रहती है।
जंगल में आग लगी
कई जीव बलिदान हुए
हो व्याकुल जल से हिरनी,
क्या लोग सभी –
सागर का खारा पानी पीएं
सावन में अब
जोश नहीं
बसंत में अब वो
फूल नहीं,
पतझड़ में
वर्षा होती है
वर्षा में अब,
वर्षा नहीं
नव कवि
‘दिनकर’ के बेटों
‘वर्मा’ के सब
बच्चें सुनो
कलम उठा
गीत बना,
क्यों चुप हो
ग़ालिब के बच्चों
आओ मिलकर सब
एक काम करें
पर्यावरण पर
हम कविता
तुम शायरी,
और कोई गीत लिखें।
—————————–
—ऋषि कुमार प्रभाकर -
गीत- क्या चाहते हो |
गीत- क्या चाहते हो |
दूर जो जाऊ पास बुलाते हो |
पास जो आउ नजरे चुराते हो |
सच बताओ तुम क्या चाहते हो |
मालूम है तुमको तुमसे प्यार है कितना |
सागर की गहराइयों से गहरा है उतना |
उतर आंखो दिल चले जाते हो |
सच बताओ तुम क्या चाहते हो |
मुझे देख तेरा यूं मुसकुराना है गजब |
पास आकर तेरा यूं गुंगुनाना है अजब |
नजरे मिला फिर नजरे चुराते हो |
सच बताओ तुम क्या चाहते हो |
बुलाऊँ तुम्हें तुम पास आते नही हो |
पास आकर तुम कुछ सुनाते नही हो |
मुझे देखकर क्यो तुम शर्माते हो |
सच बताओ तुम क्या चाहते हो |
बीते नहीं दो दिन मिलने तड़प जाना |
आए नही मिलने मुझपर भड़क जाना |
मिलने जो आउ छुप क्यो जाते हो |
सच बताओ तुम क्या चाहते हो |
कभी हंसना रोना क्या हाल बना रखा है |
क्या बताऊँ तूने जीना मुहाल कर रखा है |
ख्वाबो मे मुझसे झगड़ जाते हो |
सच बताओ तुम क्या चाहते हो |श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286 -
चैन गंवा कर खूब कमाया (चौपाई छन्द)
खुद खुश रहना औऱ सभी को
खुश रखना हो जीवन का पथ,
याद रखो नश्वर है जीवन
मिट जाना है बस इसका सच।
तेरा-मेरा मेरा-तेरा
कहते-कहते बीते पल-क्षण
अंत समय तक समझ न पाया,
जीवन का सच्चा सच यह मन।
चैन गंवा कर खूब कमाया,
जमा किया जो खाते में धन,
खाने तक का समय नहीं था,
जीवन भर का था पागलपन।
कुछ भी हाथ नहीं रहता है
आशा में रह जाता है सब
अतः देखकर यह सारा सच
खुश रहने की ठानो तुम अब।
———- चौपाई छन्द में रचना।
————– डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय -
कविता : इन्सान नहीं मिल पाया है
हर मन्दिर को पूजा हमने
भगवान नहीँ मिल पाया है
इस भूल भुलैया सी दुनिया में
इन्सान नहीं मिल पाया है ||
हर व्यक्ति स्वार्थ में डूब रहा
मन डूब गया भौतिकता में
संवेदनाओं का क़त्ल हुआ
झूंठ दगाबाजी करने में
कौन यहाँ पर ज़िन्दा है
मुझे समझ न आया है
इन तथा कथित इन्सानों में
इन्सान नहीं मिल पाया है
हर मन्दिर को पूजा हमने
भगवान नहीँ मिल पाया है
इस भूल भुलैया सी दुनिया में
इन्सान नहीं मिल पाया है ||
रहकर साथ अलग दिखते हैं
दौलत पर इतराते हैं
अपनों को छोड़कर लोग
गैरों को अपनाते हैं
भड़काने को आग विकल है
सबके मन में छुपी जलन है
कलियुग का सब दोष कहूँ क्या
इनकी वाणी में फिसलन है
देवत्व दिला सकने वाला
वह स्वार्थहीन उपकार नहीं मिल पाया है
इन तथा कथित इन्सानों में
इन्सान नहीं मिल पाया है
हर मन्दिर को पूजा हमने
भगवान नहीँ मिल पाया है
इस भूल भुलैया सी दुनिया में
इन्सान नहीं मिल पाया है ||
-
अच्छे से कट जाये।
मन के भीतर तक पहुँच गई,
ठंडक की ठंडी हवा
अब क्या हो इस ठिठुरन का हल
कुछ है क्या इसकी दवा।
होती तो मैं खा लेता,
सबको उसे खिला देता,
जितने भी मौसम होते हैं
उन सबमें खूब मजे लेता।
ठंडक में ठंड सताती है
गर्मी में बदन पसीने से
इतना तर हो जाता है
नींद नहीं आ पाती है।
ठंडा हो या गर्मी हो
या बरसात की नमी हो,
सब सह लेता यह शरीर
बन जाती कोई औषधि तो।
लेकिन हो तो वो सस्ती हो
जिसको गरीब भी खा पाये,
जीवन के कुछ पल उसके भी
जिससे अच्छे से कट जाये। -
मृग मरीचिका
वो छत क्या
अचानक गिर गई
गिरी नही
ऐसा कहो गिराई गई
नींव संवेदनहीनता की
रेत लालच की
ईंट भ्रष्टाचार की
सीमेंट बेईमानी का
माया का जाल बिछा
मूल्यों को तिजोरी में बंद
इंसानियत को दफना
निर्माण ……..
नहीं बस ढांचा खड़ा किया
जनता है तो मोल चुकता
करने को
जो चुकाती हैं कीमत
इन्सान होने की
एक सांस अधिक
ना ले पाओगे
फिर किस मृगमरीचिका
में गठरी बांध रहे हो
इस हादसे के बोझ के
गट्ठर को छोड़ ना पाओगे । -
पीपल का वृक्ष
कविता -पीपल का वृक्ष
—————————-
जीवन जीने का आधार क्या है,
हर धर्मों का सार क्या है,
मानव क्या पाता है,
जीवन में क्या खोता है|
वृक्ष लगाओ संदेश मिला है,
रोग मिटेंगे, वैज्ञानिकों ने बताया है|
मंदिर की सुंदरता बढती है
जब पीपल नीम की छांव मिले,
आओ वृक्ष लगाकर उपकार करें,
भारत मां का सिंगार करें|
गेंदा, गुड़हल और गुलाब,
खिले चमेली सुंदर बाग|
देव शरण कैसे जाएं,
कहां से बेल के पत्ते लाएं|
भवन बने हैं चारों ओर,
वृक्ष नहीं है एक भी ओर|
बढ़ई से पूछो,
हमें किन किन कामों में लाया है|
ताजमहल हो ,या लाल किला-
या मस्जिद, रावण, राम की मंदिर हो,
खिड़की दरवाजा चौखट किस से बनता है?
कहे ऋषि अब कृपा करो,
गगन व धरा पर दया करो|
शोध करो विकास करो,
जीवों पर अब दया करो|
सभी धर्मों के लोग सुनो
पीपल का वृक्ष लगाओ
मुफ्त में 24 घंटे ऑक्सीजन पाओ,
——————————————–
**✍️ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’——- -
सर्दी का सितम
दुनिया से कटा कश्मीर,
बर्फ़ से अटा कश्मीर
मौसम का हुआ
पहाड़ों पर कहर
कांपा श्रीनगर और कांपा,
जम्मू-कश्मीर का हर शहर
डल झील जम गई,
उसकी रफ्तार थम गई।
बद्रीनाथ के पथ पर ,
बिछी बर्फ की सफेद चादर।
आसमान से गिरे
बर्फ के फ़ाहे
बन्द हो गई हैं,
आने जाने की सब राहें।
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में,
पर्वतों पर है बर्फबारी
कांप उठे सब नर और नारी
पर्वत कांप उठे सर्दी से,
सूर्य का कहीं पता नहीं
सर्दी का हर तरफ सितम है
सबको सर्दी सता रही।
डलहौजी की राहों ने भी,
ओढ़ रखी है बर्फ की चादर
हिमपात से लुढ़का पारा,
कांप उठा हिमाचल सारा
______✍️गीता -
बिरह भक्ति गीत- मेरे श्याम सावरिया |
बिरह भक्ति गीत- मेरे श्याम सावरिया |
चुराकर दिल मेरा मुझे दीवाना बना दिया |
सुनो मेरे श्याम सावरिया |
सुनाकर मीठी बाते मुझे अपना बना दिया |
सुनो मेरे श्याम सावरिया |नैनो मे बसकर चल दिये कहा चुपके चुपके |
तेरे बिना राधा रोये सबसे छुप छुपके |
करके जुदा मुझे खुद से बेगाना बना दिया |
सुनो मेरे श्याम सावरिया |जब पास होते थे मीठी मुरली सुनाते थे |
आओ प्यारी राधा आओ मुझको बुलाते थे |
छोड़ गए छलिया मुझको अंजाना बना दिया |
सुनो मेरे श्याम सावरिया |रोती है कीतनी राधा सुनो निष्ठुर निर्मोही |
याद मे तेरी भटकूँ मै पगली खोई खोई |
प्यार मे अपने दुशमन जमाना बना दिया |
सुनो मेरे श्याम सावरिया |बहती है यमुना एक गोकुल तीरे तीरे |
दूजे बहे यमुना धार राधा नैन धीरे धीरे |
मै बावरी को मरने का बहाना बना दिया |
सुनो मेरे श्याम सावरिया |
अब ना आओगे कान्हा राधा नहीं पाओगे |
मनमोहिनी मुरली श्याम किसको सुनाओगे |
प्यार मे तेरे तड़पूँ गोरी को खिलौना बना दिया |
सुनो मेरे श्याम सावरिया |श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286 -
दूजे की भी मदद कर(कुंडलिया छन्द)
दूजे की भी मदद कर, अपना ही मत देख।
ठिठुर रहे जो सड़क पर, उनको भी तो देख।
उनको भी तो देख, खिला दे रोटी उनको,
पहना दे रे वस्त्र, इतना सक्षम है तू तो।
कहे ‘लेखनी’ आज, जरूरत जिनको है वे
पीड़ा में हैं जरा, मदद उनकी तू कर ले।
——- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय -
हाय मैं सड़क बेचारी
मैं सड़क बेचारी
ज्यों अबला नारी।
पग पग दलित
परम दुखियारी।। हाय मैं सड़क बेचारी
काट दिया कोई कहीं पर
और बहा दिया पानी घर का।
भोजन के दोनें और छिलके
सब फेंक रहे मेरे ऊपर आ।।
चले बटोही नाक बन्द कर
थूके और देकर कुछ गारी।। हाय मैं सड़क बेचारी……
गंदे लोग गंदी प्रशासन
कमर टूट गई जिसके कारण।।
आखिर कहाँ गुहार लगाऊँ
मैं नहीं जाती दफ्तर सरकारी।। हाय मैं सड़क बेचारी…
जीर्णोद्धार होगा पुनर्निर्माण होगा
हो जाएगी अब मेरी काया पलट।
योजनाएं बनी कागज पर
और हो गई मेरी कुछ काटम- कट।।
निर्माणाधीन हीं बीत गए
कुछ मास वर्ष दो – चारी।। हाय मैं सड़क बेचारी….
ठेकेदार अभियन्ता आफिसर
दे लेके एक राग अलापे।
हमने तो कर निर्माण दिया था
टूट गए सब बाढ़ के ढाहे।।
‘विनयचंद ‘ अब मान भी जाओ
है फरमान सरकारी।। हाय मैं सड़क बेचारी….. -
मासूम बचपन
बारिश में भीगते-भागते
खिलखिलाते वो दो बच्चे
ना सिर पर छतरी,
ना तन पर कोई रेनकोट
तेज़ हुई बारिश तो,
बैठ गए लेकर एक दीवार की ओट
चेहरे पर हंसी की फुलझड़ी
बालों से टपक रही थी
मोतियों की लड़ी
भीग कर भी खिलखिला रहे
दिख रहा ना कहीं कोई ग़म,
देख-देख मैं सोच रही थी
यही तो है मासूम बचपन
_____✍️गीता -
प्रेम-विवाह
यदि कोई युवक-युवती
चाहें प्रेम विवाह करना
तो उनके और परिवार के
सुख की खातिर,
कभी मना नहीं करना
प्रेम-विवाह नहीं होगा तो
माता-पिता की मर्जी वाले विवाह में,
वह सुख महसूस नहीं होगा
स्मृति में रहेंगी बीती यादें
फ़िर वो घर महफूज़ नहीं होगा
प्रेम किसी से विवाह किसी से,
यदि ऐसा हो जाता है
ज़िन्दगी भर का यह नाता
उस मजबूती से ना जुड़ पाता है
जाति धर्म कुंडली सब छोड़ो,
दिल से दिल का नाता जोड़ो
फ़िर दिल ना टूटेंगे,
सुहागिनों के घर ना छूटेंगे
भारतीय समाज में व्यवस्था-विवाह
माना एक सिंहासन है,
पर प्रेम विवाह की करो व्यवस्था,
दो प्रेमियों को मिलाने का,
ये भी तो एक माध्यम है
यदि ऐसा ना हो तो..
निज साथी में फ़िर ढूंढे वही पुराना,
ना मिल पाए उस जैसा तो
आरंभ हो उनका कुम्हलाना
निज संतानों पर ऐसे ना प्रहार करो,
दिलवा दो दिल पसंद साथी
ऐसे तुम उनसे प्यार करो
युवाओं के माता-पिता से,
हाथ जोड़ विनती है मेरी
जबरदस्ती के बंधन में बांध के,
ना उनकी ज़िन्दगी का बुरा हाल करो,
उनकी मर्जी का देकर जीवनसाथी
उनकी ज़िन्दगी को खुशहाल करो
_____✍️गीता -
सहधर्मिणी तुम्हारी
आँखों में खटकती, फ़िर दिल में कैसे रहती
जद्दोजहद में गिर गिरकर मैं पग रखती
खुद ही खुद से हारी
कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी ।
फ़िजाओ के रूख़ -सा मिज़ाज तेरा बदला
फिर भी धैर्य के संग ठहरा रह मन पगला
लेके उम्मीद सारी,
कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी ।
अपेक्षाओं के मोतियों से,गुथी आशाओं की माला
तुम्हे भली जो लगे, उस रूप में खुद को ढाला
छोङी चाह प्यारी,
कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी ।
तेरा-मेरा रिश्ता, रहे हमेशा सही- सलामत
हमसे जुङी है दो कुल, परिवार की चाहत
अपने अहम् को भी वारी,
कैसे कहूँ मैं हूँ सहधर्मिणी तुम्हारी । -
बेजान हुआ यह जीवन
बेरंग हुआ उसका जीवन, रूप बदलकर स्याह हुआ ।
लाल रंग से टुटा नाता, दूर सोलहो श्रृंगार हुआ ।।
बिछोह हुआ उस प्रीतम से जिससे उसका ब्याह हुआ ।
जिसने पहनाया था चूङा जिससे शुरू परिवार हुआ ।।
कालचक्र का तान्डव,सिन्दूर,आलता बेजान हुआ ।
बीच भंवर में नाता टूटा, सारा जीवन बेजार हुआ ।।
गभी बारात ले धुमधाम से,सजी थी महफ़िल शाम की।
शहनाई की धुन बजी थी, बनी थी मैं जब आपकी ।।
कभी हल्दी सजी थी जिन हाथों में, उनके नाम की।
आज उन्हीं के नाम से नाता बाकी सब बेकाम की।।
हाथों में खनकी थी उनसे ही हरे काँच का कंगन।
पलकों पे सजा, भाया था जो उनको सूर्ख अंजन ।।
साथ ले गये हाथों की रौनक, कहाँ रहा वो खनखन।
तुम जो गये, निर्जन-सा, बेकाम हुआ मेरा तनमन ।।
कभी सधवा थी कहलाती, शुभ कर्म में थी सहभागी ।
तीज-त्यौहार में सज, तेरे लिए, तेरे संग थी सहगामी ।।
आज तुम्हारा साथ जो छूटा, सब व्रत से नाता टूटा ।
कैसे यह भाग्य रूठा, बनी अभागिन,अछूत कुल्टा ।।
किस्मत में ये वदा था या ईश्वर ही मुझसे खफा था।
देखते-ही-देखते, उजङी बगिया जो अभी खिला था ।।
मौला की नियत में खोट होगी, ये कहाँ किसे पता था।
धूमिल धरा पे चुपचाप पङा, इसे कहाँ कोई गिला था।।
तुम तो चले गये ही, मुझे किस के सहारे छोङा ।
अर्धांगनी तुम्हारी, जन्मों जन्म के, कसम को तोङा ।।
कैसे गुज़र करूँगी, किस तरह नन्हीं को रखूगी ।
“पा पा” की तोतली बोली, सुन कैसे क्या कहूँगी।।
तुम तो चले गये ही, मुझे किस के सहारे छोङा ।
अर्धांगनी तुम्हारी, जन्मों जन्म के, कसम को तोङा ।।
कैसे गुज़र करूँगी, किस तरह नन्हीं को रखूगी ।
“पा पा” की तोतली बोली, सुन कैसे क्या कहूँगी।।
हे भाग्य विधाता, बता इस पीङा में, क्या भला है ।
जब मर्जी बिना तेरी एक पत्ता भी ,ना कहीं हिला है ।।
हर जर्रे-जर्रे पर हक, बस तेरा ही नाम वदा है ।
बता दे, तेरे दर पर, क्यूँ नहीं मुझे भी आसरा मिला है ।। -
संतोष
सुखी है आदमी कब
जब उसे संतोष है,
अन्यथा उलझन है
मन में रोष है।
जो मिला उस पर
नहीं कुछ चैन है,
इसलिए यह मन मेरा
बेचैन है।
गर मेरे मन में
भरा संतोष है,
चमचामते दिन
मधुर सी रैन है।
हो अगर संतोष
तन पुलकित है यह
होंठ में मुस्कान
मन में चैन है। -
सब्जी वाला
वो मुफ्त में पालक काट दिया करता है
सब्जी के साथ मुफ्त में,
धनिया मिर्ची भी बांट दिया करता है
जेब से, मानो या न मानो
वो सब्जी वाला दिल से,
बहुत अमीर हुआ करता है
और तुम किस जगह चकाचौंध में,
मॉल चले जाते हो
सब दिखावटी है वहां पर,
वहां का सब्जी वाला..
“कैरी बैग” के भी पैसे मांग लिया करता है।
_____✍️गीता -
पूस में किसान
कुछ दिन बचे हैं पूस के
ये भी निकल हीं जाऐंगे।
सर्दी है चारों ओर व्यापित
कब तक हमें सताऐंगे।।
क्या कंबल रजाई कफी है
सर्दी भगाने के खातिर।
तन मन की गर्मी काफी है
खुद को बचाने के खातिर।।
बेशक़ बिछौना पुआल का
सुख नींद सुला जाऐंगे।।
तन पे फटी है चादर
जलती अंगीठी आगे।
बैठे हैं खेतों के मेड़ पे
सारी सारी रात जाने।
कुछ दिन की तो बात है
अच्छी फसल ही पाऐंगे।
बादल घने आकाश मे
घनी अंधेरी रात है।
किनमिन -सी हो रही
कैसी ये झंझावात है।।
किस आश में ‘विनयचंद ‘
गिर कर संभल जाऐंगे ।
मजदूरों और किसानों की
विरले ही नकल लगाऐंगे।। -
कस्तूरी
इश्क़ और मुश्क में
इश्क़ तो सभी जानें
और मुश्क ??
इसका क्या अर्थ है
मुश्क मतलब है कस्तूरी
कस्तूरी हिरण की नाभि में है
फिर भी इधर उधर भागे वो
कहां से आई है ये सुगंधि,
उसके ही अंदर है
ये भी ना जाने वो
घूमे इधर-उधर होकर दीवाना
यह सुगंधि उसके अंदर है
यह भी ना वो पहचाना
भागता है दौड़ता है
कभी-कभी करता है अहित अपना
निशा के अंधेरे से लेकर
जब तक हो ऊषा का उजाला
कस्तूरी मृग कस्तूरी की सुगंधि से ही
हैरान, परेशान हुआ मतवाला
_______✍️गीता -
जज़्बात
यूँ अपने जज़्बात नुमाया क्यों करते हो !
मेरी ख़ातिर अश्क बहाया क्यों करते हो !!क़िस्मत के लिक्खे से मैं भी वाकिफ़ हूँ !
बातों से मुझको बहलाया क्यों करते हो !!जब साथ तुम्हारा है ही नहीं मुक़द्दर में !
फिर मेरे ख़्वाबों में आया क्यों करते हो !!भूल के तुमको जिसने जीना सीख लिया !
उसकी ख़ातिर नींदें ज़ाया क्यों करते हो !!अपना बनकर दुनिया ज़ख़्म लगाती है !
सबको अपने राज़ बताया क्यों करते हो !!पत्थर दिल इंसानों की इस बस्ती में !
तुम शीशे के महल बनाया क्यों करते हो !!©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
-
रिमझिम-रिमझिम जल बरसा
रिमझिम-रिमझिम जल बरसा,
आ गए काले बादल
दिन में छाया घोर अंधेरा
नभ में जैसे फैला काजल
बादल की आंख से जल बरसा
धूप को ये सारा जग तरसा
सर्दी के मौसम में
और भी ठंडा मौसम हुआ
देखो ना…
सब कुछ कितना निर्मल हुआ
लगता है सब धुला-धुला सा
अब मौसम हो गया खुला-खुला सा
धूल निकली वृक्ष, लताओं की
ठंडी-ठंडी पवन चली है
हरित पर्ण हिला-झुला कर,
दिखा रही है शान अपनी अदाओं की
कोहरा भी छंट गया,
कितना स्पष्ट सा दिख गया
______✍️गीता -
जीवन कठिन हुआ जीवों का
आज धूप नहीं है
बादल छितरे हैं नील गगन में
ठिठुर रहा है जीवन
बर्फ भरी है आज पवन में।
कैसे उठूँ रजाई से,
यह ठंडक मुझे रुलाई दे
कुछ गर्मी लाने की बातें
अब कैसे मुझे सुनाई दें।
चाय हाथ में आने तक
ठंडी हो जाती है, भैया,
ऐसे में कोई छोड़ गया है
सड़कों में बूढ़ी गैया।
जीवन कठिन हुआ जीवों का
खूब पड़ रही है ठंडक,
पाले की चादर चमड़ी पर
दांत कर रहे हैं टक-टक। -
मेरे हवाले कर दो…
‘रेत पर लिख दो और लहरों के हवाले कर दो,
आज इस साल की सब बन्द रिसालें कर दो..इस नए साल में बाहर न कोई ढूंढे तुम्हे,
मेरे रब तुम अगर दिलों को शिवाले कर दो..किसी भूखे के लिए ये बड़ी वसीयत है,
कि उसके नाम कभी चंद निवाले कर दो..किसी की ऊँची हैसियत से जला क्यूँ कीजे,
जलो ऐसे कि हर तरफ ही उजाले कर दो..किसी को हश्र दिखाना हो किसी आशिक का,
मुझी को ताक पर रखकर के मिसालें कर दो..तुम अपनी यादों से कह दो कि रिहा कर दें मुझे,
मैं थक गया हूँ मुझको मेरे हवाले कर दो..रेत पर लिख दो और लहरों के हवाले कर दो,
आज इस साल की सब बन्द रिसालें कर दो..’– ‘प्रयाग धर्मानी’
मायने :
रिसालें – पतली किताबें
शिवाले – मंदिर
मिसालें – उदाहरण
रिहा – आज़ाद -
वही सागर का तट
वही सागर का तट
बालुकामय सतह।
जहाँ आनन्द मनाया
कुछ इस तरह।।
खाया -खेला
नाचा-गया।
गीले बालुका पर
अंगूठा घुमाया।
कुछ इस तरह।।
अंकित हुआ
बीस सौ बीस।
कितने दुखो के
भरे हैं टीश।।
सागर के लहरों ने
मिटा दिया वो अंकन।
पर दिल में एक
अधूरी यादों का है कंपन।।
शायद लिखा हुआ होगा
अब तक ज्यों का त्यों।
चल पड़े आज फिर
उसी ओर आखिर क्यों।।
शायद कुछ खोजने
और करने मन को हल्का।
वही अधूरी यादे
अंकित बीस बीस हल्का।।
समझ न पाया क्या था
हकीकत या फिर मन का टीश।
होकर आदत के वशीभूत
लिख डला बीस सौ एकीश।
ठीक उसी तरह
जैसे पृष्ठ पलट रहा हो कैलेंडर का।
‘विनयचंद ‘ ने भी लिख डाला
अपने मन के अन्दर का।। -
मैं, मैं न रहूँ !
खुशहाल रहे हर कोई कर सकें तुम्हारा बन्दन।
महक उठे घर आँगन, हे नववर्ष! तुम्हारा अभिनन्दन।।
दमक उठे जीवन जिससे
वो मैं मलयज, गंधसार बनूँ !
उपवास करे जो रब का
उस व्रती की मैं रफ़्तार बनूँ !
सिंचित हो जिससे मरूभूमि
उस सारंग की धार बनूँ !
दिव्यांगता से त्रस्ति नर के
कम्पित जिस्म की ढाल बनूँ !
मैं, मैं ना रहूँ,
हारे- निराश हुए मन की,
आश बनूँ !
बिगत वर्ष में में
जिनका अबादान मिला
कृतज्ञता ज्ञापित,
उनकी मैं शुक्रगुजार बनूँ!
मुकाम कैसा भी आये
पर मन में थकान न आये
हे ईश! हर मुश्किल में
संभलने का समाधान बनूँ! -
आर्यन सिंह की बेस्ट शायरी
1.
हम जमाने से बेहद सताए हुए हैं
मगर अपनी इज्जत बचाए हुए हैं
मार डालेगा दुश्मन जमाना तेरा
इसलिए तुझको दिल में छुपाए हुए हैं
भले जुल्म कर ले ये सारा जमाना
मगर फिर भी हम दिल लगाए हुए हैं2.
सच बता दो मुझे आप आओगे कब
टूटे रिश्तों को फिर से निभाओगे कब
हैं खयालात दिल में छुपाए बहुत
वो हकीकत कहानी सुनाओगे कब
पूछता हूँ बता दो जरा सच मुझे
फिर से रंगीन रातें मनाओगे कब3.
मैं सागर की गहराई हूं तुम नहीं किनारा पाओगे
मैं दहकता हुआ अंगारा हूं तुम छूने पर जल जाओगे
मैं हूं अनन्त मैं हूं अथाह है मुझे समझना नामुमकिन
है आसमान मेरा मुकाम तुम कब तक पीछे आओगे4.
अब ना हमें आजमाना कभी
ना निगाहें किसी से लडाना कभी
तेरे होंठो से शबनम की आहट मिले
ऐसी रश्क़ ए कमर ना हिलाना कभी
अपने नाजुक बदन को संभालो जरा
मुझ कमीनों से दिल ना लगाना कभी5.
ये ना पूछो कि अब हम किधर जाएंगे
छोड़ देंगे नवाबी सुधर जाएंगे
इस जमाने में इज्जत गवाई अगर
जिंदा रहते हुए भी बिखर जाएंगे
मैं रहूं ना रहूं पर कसम है मुझे
कि अमर नाम दुनिया में कर जाएंगे6.
है सौगंध मुझको झुकूंगा नहीं
अपने कर्तव्य पथ पर रुकूँगा नहीं
गर मुकम्मल मेरा दूर मुझसे हुआ
माफ खुद को कभी कर सकूंगा नहीं
जब तक मंजिल ना पा लूंगा एक जिंदगी
है कसम कि मैं तब तक थकूंगा नहीं7.
इश्क़ के ख्वाब अब ना सजाया करो
झूठी तारीफ अब ना सुनाया करो
जिनके सपनों में झूठे सजीदे हुए
उनको हृदय से अब ना लगाया करो
रह गई वो मचलती जवानी कहाँ
अब मोहब्बत की गजलें ना गाया करो8.
कभी मशहूर मेरी जवानी रही
प्यार में डूबती वो कहानी रही
आज बेशक है तन्हा मेरी जिंदगी
पर कभी इश्क़ की एक निशानी रही
आ गया अब बुढ़ापा तो क्या हो गया
कभी लैला भी मेरी दिवानी रही9.
मैं जंग हूं मैं जीत हूं
बहता हुआ एक गीत हूं
मैं राग हूँ अनुराग हूं
अनुरक्त व वैराग्य हूं
मैं आन हूं मैं शान हूं
इस देश का अभिमान हूं
हिन्दुत्व का हूं अंश मैं
और कृष्ण की संतान हूं10.
संघर्ष थम गया है बस मुकाम बाकी है
इतिहास के पन्नों पर अभी नाम बाकी है
मनाएंगे जश्न मुकम्मल ए फतह का…
मगर अभी रुक जाओ ”
और थोड़ा सा काम बाकी है -
आर्यन सिंह अहीर की शेर ओ शायरी
1.
जो कल था वही आज हूं
थोड़ा खफा हूं थोड़ा नाराज हूं
2.
जिस दिन किस्मत के सितारे बदल जायेंगे
देखते ही देखते नजारे बदल जाएंगे
नाव क्या चीज है खरीद लेंगे समुंदर
बस थोड़ा सा रिस्क है किनारे बदल जायेंगे
3.
निकले हैं घर से तो मंजिल जरूर पाऊंगा
कसम खाई है वो करके दिखाऊंगा
4.
झूठी शान का परिंदा ज्यादा फड़फड़ाता है
जिसमें जान होती है ना वह कहता नहीं करके दिखाता है
5.
हम कहते नहीं करके दिखाते हैं
वक्त आने पर सब को आजमाते हैं
जो समझते हैं अपना काम आएंगे वही
वरना दिखावा करने वाले तो दूर निकल जाते हैं
6.
जब इंसान मोहब्बत में धोखा खाता है
तभी कुछ कर दिखाने का मौका आता है
7.
रेत की नाव है समुंदर के पार जाना है
ना कोई जरिया है ना कुछ बहाना है
खुद की भुजाओं पर रख भरोसा और कूद जा समुंदर में …
अरे जो असंभव है वही तो करके दिखाना है
8.
जिंदगी के प्रश्नों का खुद ही जवाब हूं मैं
बड़ा गुलाम बनने से बेहतर कि छोटा नवाब हूं मैं
9.
उनको दिल पर रखो जो तुम्हारी कामयाबी पर तालियां बजाते हैं
उनको दिमाग पर रखो जो तुम्हारे सामने मुस्कुराते हैं और पीठ पीछे गालियां सुनाते हैं ! -
नव वर्ष 2021 की हार्दिक शुभकामनाएं ( आर्यन )
नववर्ष 2021 की जय श्री राम जय श्री कृष्ण 🙏🙏🚩🕉 और सप्रेम शुभकामनाओं के साथ आपके लिए –
अब बीत गया दुख भरा समय फिर नया सवेरा आया है.
कोरोना का गम भूल जाओ संदेश प्रेम का लाया है !!सन बीस ने भरसक किया तंग सबको हैरत में कर डाला.
लांकडाउन का वो रूझान इसने घर घर में भर डाला.लेकिन हर भारतवासी ने मिलकर कर्तव्य निभाया है
कोरोना का गम भूल जाओ अब वक्त खुशी का आया है !!
बेशक ये साल खराब रहा पर अच्छा भी परिणाम रहा.हो गया अवध में शिलान्यास घर-घर में जय श्री राम हुआ.
गली गली हर घर घर में अब भगवा ध्वज लहराया है
कोरोना का गम भूल जाओ यह वक्त खुशी का आया है !!
जो होना था हो गया यार मत फिक्र करो बेगाने की.
इस वर्ष नया क्या करना है बस सोचो बात ठिकाने की.इन विषम दिनों ने मुश्किल में भी जीना हमें सिखाया है
कोरोना का गम भूल जाओ अब वक्त खुशी का आया है !!सन दो हजार इक्कीस हो मंगलमय सुंदर सब का सौभाग्य रहे .
धर्म देश मां – बाप गुरु वेदों के प्रति अनुराग रहे.अंबर की ललित तरंगों ने फिर नव प्रभात चमकाया है
अब बीत गया दुख भरा समय फिर नया सवेरा आया है !!
करता हूं प्रार्थना ईश्वर से सब में सद्बुद्धि जगा देना.
हम जैसे भूले भटकों को प्रभु सच्चा मार्ग दिखा देना.
आर्यन ने आज आपके लिए पैगाम नया भिजवाया है
सब मस्त रहो सब व्यस्त रहो अब वक्त खुशी का आया है !!
सभी भारतवासियों को नवबर्ष 2021 की हार्दिक
सप्रेम शुभकामनाएं ”
Regards –
भगवाधारी विशुद्ध सनातनी हिंदू –
आर्यपुत्र आर्यन सिंह अहीर
लेखक एवं कथावाचक
प्रमुख आर्यावर्त नव निर्माण सेना
Ph * 9720299285 -
तुम्हारा स्वागत ना कर सकी !!
हे नव वर्ष !
तुम्हारा स्वागत
ना कर पाई मैं !तुम्हारे आगमन के
उपलक्ष्य में हजारों
तैयारियां करना चाहती थी
पर कर ना सकी !तुम्हें समेटना चाहती थी
प्रेम से,
दुलार देना चाहती थी,
पर अश्रु धारा प्रवाहित
करने के पूर्वाभ्यास के कारण
सिर्फ रोती रह गई और तू आ गया
बिना किसी आदर-सत्कार के !विगत वर्ष में सिर्फ हृदय में
घाव ही मिले
जिनसे मेरा चट्टान जैसा हौसला
धराशाही हो गया
कितना कुछ लिखना चाहती थी
तुम्हारे लिए
अनगिनत पंक्तियां लिखना चाहती थी
तुम्हारे अभिनन्दन में,
परंतु एक पंक्ति भी ना
समर्पित कर सकी तुम्हें !! -
नव वर्ष आ रहा है
समय की धीर लहरें
बढ़े ही जा रही हैं,
खुद में बीते दिनों को
समाते जा रही हैं।
जा रहा यह बरस अब
वक्त के इस जलधि में,
आ रहा नव-बरस है
आज बिंदास गति में।
रेत सी जिन्दगी है,
बीतता वक्त है यह,
काल के इस उदधि में
समाता वक्त है यह।
नए पल आ रहे हैं
पुराने जा रहे हैं,
रेत में चिन्ह अपने
घोलते जा रहे हैं।
पुराना जा रहा है
उसे है नम विदाई,
नया जो आ रहा है
आज उसकी बधाई।
पा सके थे नहीं जो
आप बीते बरस में,
वो मिले आपको अब
आ रहे नव-बरस में।
नैन आशा जगायें
होंठ मुस्कान लायें,
जहां भी आप जायें
वहां सम्मान पायें।
दूर हो रोग -बाधा
सभी का स्वस्थ तन हो
बनें राहें सरल सब
नहीं कुछ भी कठिन हो।
सभी निज लक्ष्य पायें
उदर का भक्ष्य पायें
झूठ के मार्ग को तज
सत्य के गीत गायें।
रेत सा वक्त है यह
लहर गतिमान है यह
नहीं रुकता कभी भी
सभी को भान हो यह।
निरंतर चल रहा है
वक्त, हम भी चलें अब
इस नए वर्ष में अब
सभी संकल्प लें यह।
जा रहे नव बरस को
आज है नम विदाई,
आ रहे नव बरस की
आज सबको बधाई।
——- डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय -
सन् 2020
सन् 2020 को विदा करते हैं,
दुःखो को खुद से जुदा करते हैं।
खुशियाँ का खुल के आगमन,
हर इक से चलो वफ़ा करते हैं।सन् 2020……
वक्त कट गया मुश्किल था जो,
इसे भूल जाने की ख़ता करते हैं।
चलो बोते हैं ज़मी में नए पौधे,
फिर कोशिश कर बड़ा करते हैं।सन् 2020……
साथ इक दो नहीं हजारों ले गया,
प्रार्थना सब मिल दोबारा करते हैं।
जाने अनजाने में हुई जो गलती,
भुला सब हम गले लगा करते हैं।।*राही अंजाना*
नव वर्ष मङ्गलमय हो।💐🙏💐 -
कश्मकश
सूर्य उदित हुए
सुबह हुई
बड़ी ठंडी सी सुबह थी
सूरज ने भी कोहरे की
चादर ओढ़ रखी थी
वक्त का पता ही ना चला
कब सुबह हुई कब दिन ढ़ला
सुबह, दोपहर सांझ सब
एक सी हो गई
ज़िन्दगी भी यूं ही
कश्मकश में कहीं खो गई
_____✍️गीता -
“स्वर्णिम नवल वर्ष”
कालचक्र ने लिखा था एक रोज़
रेत पर उंगलियों के पोरों से,
वह हस्तलेख मिट गया
सागर की लहरों के थपेड़ों से…
स्वागत है कर जोड़कर २०२१,
खूँटी पर अब टाँग दी
वैमनस्यता भरी कमीज…
सागर की जलधार ने
मिटा दिया एक नाम,
२०२० ऐसे ही गया
आया नव स्वर्ण विहान…
हे नवल वर्ष ! तुम सबके
जीवन में सुख का संचार करो…
दीनों दुःखियों का त्रास हरो,
मानवता का कल्याण करो…
तुम आओ जीवन पथ पर और
प्रेरणा का नव उत्थान करो…
भूखे की रोजी-रोटी बन,
हर नस में रक्त संचार करो…
स्वप्नों के नूतन पुहुप खिलें,
बैरी भी हँसकर गले मिलें…
बोये जाएं सर्वत्र पुष्प,
नहीं हृदय में शूल मिले…
कुछ ऐसा हो यह नवल वर्ष,
सबके गृह में हो समृद्धि- हर्ष…
अधरों पर केवल मुस्कानें हों,
पलकों के तट पर ना नयन जलधारे हों…
हर मानव नीरोग मिले,
कोरोना ना अब कहीं दिखे…
तरुणाई मुसकाये और
अवनि भी स्वच्छन्द मिले…
जो घाव दिये विगत वर्ष ने
हे आगत ! तू उसका मरहम बन,
सागर में मिल जाए सर्वस्व व्यथा
पुष्पित हो विश्व का तन-मन…“नववर्ष मंगलमय हो” आप सभी को प्रज्ञा की ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं…🙏🙏🙏
काव्यगत सौंदर्य एवं साहित्यिक योगदान:-
यह कविता मैंने सावन द्वारा आयोजित “फोटो प्रतियोगिता” पर लिखी है,
मैंने सावन के लगभग सभी मापदण्डों को ध्यान में रखकर लिखी है तथा हर बारीकी का ध्यान रखते हुए लिखी है…मैंने फोटो में जो भी दिखाया गया है उसको ध्यान में रखते हुए समग्रता का भी समावेश किया है..
मैं कहाँ तक सफल हुई यह तो आप सब ही बताएगें परंतु यह कविता लिखने में मुझे बहुत मनन तथा अध्ययन करना पड़ा जिसके कारण कई दिन लग गये…
अलंकारों के साथ-साथ, रस, नवीनता तथा समाज में सकारात्मक प्रभाव डालने का भी प्रयास किया है…आगे आप सभी की इच्छा चाहे तो कमेंट बाक्स में कुछ लिखकर मेरी मेहनत पर टिप्पणी करें अन्यथा आपकी इच्छा…
-
2021
उठती रहेगी
इक लहर
सागर से निरंतर
जो समाहित कर लेगी
हर पीड़ा
जो दी बीते वर्ष ने
हर बार होगी
इक नईं हिलोर
जो देगी हौंसला
सतत् नवीन
जीवन जीने की
नववर्ष में। -
चैत्र मास
कविता -चैत्र मास
——————–
शिक्षा समाज देश के सजग प्रहरी,
मौन धारण कर के बैठे हो,
बिगड़ रही नव पीढ़ी अपनी
चुप्पी तोड़ो आवाज उठाओ,
बच्चों को इतिहास बताओ,
पता आपको यह त्यौहार नहीं अपना है,
हर हिन्दू का नववर्ष चैत्र मास है,
जो काम मेरा है कर रहा हूं,
गूंगो के शहर में गा रहा हूं,
बने अशिक्षित आज के दिन सब,
गूंगे बहरे हो जाते चैत्र मास में सब,
क्यों प्रथा रीति औरों की अपनाएं,
क्यो अंग्रेजी नववर्ष वर्ष मनाएं,
भूले माँ भारती का हर बेटा
भूल न सकता दिनकर बेटा
एक जनवरी नही है नववर्ष हमारा
कहें ‘ऋषि’ चैत्र मास है नववर्ष हमारा।
———————————————
** ✍ऋषि कुमार प्रभाकर- -
2021
अंधकार का जो साया था,
तिमिर घनेरा जो छाया था,
निज निलयों में बंद पड़े थे,
रोशन दीपक मंद पड़े थे।निज श्वांस पे पहरा जारी,
अंदर हीं रहना लाचारी ,
साल विगत था अत्याचारी,
दुख के हीं तो थे अधिकारी।निराशा के बादल फल कर,
रखते सबको घर के अंदर,
जाने कौन लोक से आए,
घन घोर घटा अंधियारे साए।कहते राह जरुरी चलना ,
पर नर हौले हौले चलना ,
वृथा नहीं हो जाए वसुधा ,
अवनि पे हीं तुझको फलना।जीवन की नूतन परिभाषा ,
जग जीवन की नूतन भाषा ,
नर में जग में पूर्ण समन्वय ,
पूर्ण जगत हो ये अभिलाषा।नए साल का नए जोश से,
स्वागत करता नए होश से,
हौले मानव बदल रहा है,
विश्व हमारा संभल रहा है।अजय अमिताभ सुमन
-
2020—–21
आती जाती हैं ये लहरें, सिर्फ निशां छोड़ जाती है
रेत के ऊपर हर पल नयी, कहानी ये लिख जाती है
टकराकर किनारों से, हर पल नया उठना होगा
बीस बीस के बाद इक्कीस की, इबारत गढ़ना होगायाद रखों इसी सागर में, अमृत विष के प्याले हैं
याद रखों इसी सागर में, छुपे सुनामी छाले हैं
दिखता शांत किन्तु हृदय में, भाटे ज्वार से पाले है
अपने सीने में राज इसने, दफन अनेक कर डाले हैठीक बीस भी सागर की इन शांत लहरों सा दिखता था
सुनामी को हृदय में अपने, दे रखा इक कोना था
ज्वार भाटे सी उठी सुनामी, नाम इसका कोरॉना है
पिया विष का प्याला सब ने, बीस का यही रोना हैअब आया है इक्कीस देखो, संग यह वैक्सीन लाया है
लॉक डाउन से जूझता सूरज, सागर से उग आया है
जो आया है इक्कीस तो अब, सब कुछ ही इक्कीस होगा
ख़तम हुए दिन जीरो के बस, अब आगे बढ़ना होगाबढ़ते बढ़ते आगे हमको, याद यह रखना होगा
भूले ना हम बीस की भूले, यादों को सहेजना होगा
इस सागर में जानवर विषैले, थाल मोती के भी सजे
मंथन यह हमको ही करना, कैसे साल इक्कीस का सजे -
*अभिनंदन नव वर्ष तुम्हारा*
नए वर्ष की नई भोर है
स्वर्णिम-उजियारा चहुं ओर है
चेहरे चमके बगिया महकी
ओस सुबह की फिर से चमकी
उपवन में फिर फूल खिलेंगे
बिछड़े दिल भी आज मिलेंगे
सुंदर है कुदरत की चित्रकारी
क्या जंगल क्या पर्वतों की बर्फबारी
सागर की लहरें भी प्यारी
करती मीठा शोर है
स्वर्णिम उजियारा चहुं ओर है
है उल्लासित जग सारा
दूर होगा सब अंधियारा
खुशियों का लाएगा पिटारा
अभिनंदन नव वर्ष तुम्हारा
______✍️गीता -
“नववर्ष हो इतना सबल”
नववर्ष हो इतना सबल
ना पीर चारों ओर हो,
जिधर भी उठे नजर
सर्वत्र पुष्प ही पुष्प हो..
यह लेखनी अविराम हो,
हर पंक्ति में ऐसे भाव हों…
जाग जाए यह जमीं और
आसमां झुक जाए,
लेखनी हो तरुण-सी
ऐसा नववर्ष आए…
कोरोना की ना मार हो,
फूला-फला संसार हो…
दुर्गम हो, चाहे दुर्लभ हो,
हर पथ मानव को सलभ हो…
युवा हो कर्मठ और हाथ में
उनके पतवार हो,
ना डूबे कभी बहती रहे ऐसी
सुंदर नाव हो…
२०२० तो जलमग्न हो गया,
२०२१ सजकर आ गया…
सबके मनोरथ पूर्ण हो
सबका सुखी संसार हो… -
“बेजुबानों की कुर्बानी”
बेशक मनाओ
त्योहार तुम
दिल खोलकर करो
नववर्ष का स्वागत
पर शराब, बकरी, मुर्गों आदि
जीवों के जीवन का अन्त करके
किस प्रकार मना सकते हो तुम आन्नद !!
कल तुम तो देखोगे अपने जीवन का
नवल प्रभात पर
उन बेजुबान जानवरों का अन्त
तो तुमने अपने भोग-विलास में
कर दिया,
वह नववर्ष का सूर्य कहाँ देख पाएगे ??
तुम्हारे धूमधड़ाके के और दोस्त यारों की
पार्टी में जाने कितने
बेजुबान शहीद हो जाएगे
किसी का जीवन लेने का तुमको
किसने अधिकार दिया ??
तुम तो देखोगे नवल वर्ष पर
यह हक तुमने कितनों से छीन लिया !!!! -
खूब मनाओ तुम खुशी(कुंडलिया रूप)
खूब मनाओ तुम खुशी, इतना रख लो ध्यान,
चमड़ी जिनकी खा रहे, उनमें भी है जान।
उनमें भी है जान, मगर तुम खून पी रहे,
पीकर खून निरीह का, खुशियां क्यों ढूंढ रहे।
कहे ‘कलम’ यह बात, आज तो इन्हें न काटो,
नए साल की खुशियां, तुम इनमें भी बांटो। -
हे ऊपरवाले ! तू अब तो जाग..
कूड़ाघर: रसोईंघर
*******************
मैं अक्सर सोंचा करती थी
आजकल कोई गरीब नहीं…
सब अपने आप में सक्षम हैं
इस दुनिया में अब कोई
असहाय नहीं…
परंतु एक दृष्य देखकर भर आईं मेरी आँखें
मुझको विश्वास ही नहीं हुआ जो देखीं मेरी आँखें
एक बालक छोटे कद का था,
भूंखा था और प्यासा था
कूड़ेदान में बड़ी देर से
जाने क्या ढूंढ रहा था
मेरी उत्सुकता बढ़ी,
मैं वहीं रही कुछ देर खड़ी..
उसने एक पॉलीबैग उठाया
सड़ा हुआ-सा खाना खाया,
चेहरे पर उसके थी इतनी खुशी,
मानों गड़ा हुआ हो सोना पाया…
तब तक वहाँ पर एक आया कुत्ता,
जिसको देख के सहम गया वह बच्चा…
छीन लिया उसने वह खाना,
बिखर गया हर दाना-दाना…
वाह री किस्मत ! वाह रे भाग !
हे ऊपरवाले ! तू अब तो जाग… -
*बेटी का विश्वास*
बेटी और पिता सैर पर जा रहे थे
मधुर संगीत था कोई गीत
गा रहे थे..
होंठों पर दोनों के तसल्ली भरी मुस्कान थी,
बेटी अपने पापा की जान थी..
सैर करते समय एक रास्ते में पुल आया
पिता ने बेटी को प्यार से समझाया
मेरा हाथ पकड़ लो बेटी पुल है
और नीचे गहरी नदी,
बेटी ने कहा नहीं पापा
मैं आपका हाथ नहीं पकड़ूंगी,
आप ही मेरा हाथ पकड़ लो
पिता हँस पड़े और कहने लगे
उसमें क्या अन्तर है ?
चाहे मैं तुम्हारा हाथ पकड़ लूं
चाहें तुम मेरा पकड़ लो…
बेटी ने कहा अन्तर है पापा !
कोई बात हुई तो मैं आपका हाथ छोंड़ भी सकती हूँ,
पर आप चाहे कुछ भी हो जाए
मेरा हाथ नहीं छोंड़ोगे… -
2021 शुभ शगुन
आ रहा है दौ हजार इक्कीस का नव वर्ष
करते हैं हम दिल से अभिनंदन बार-बार
इक्कीस अंक होता है प्यारा सा शगुन
आना तुम हर जीवन में शुभ शगुन रूप धार
पग पैंजनीया बांध आना हर जीवन में रूप नव्य धार
उमंग,उल्लास,उम्मीद लाना जैसे नव शिशु मारे किलकार
वसुधा पर फैले हर और ऐश्वर्य अपार
मेहनत,हिम्मत,जुनून बन छाना जैसे तरुणाई मारे ललकार
हर परिवार में आना बन तीज-त्यौहार
सफलता, स्नेह, सम्मान सर्व को जैसे गुरु पाऐ सत्कार
विश्व में भाईचारा हो, विस्तृत हो शुभ विचार
भय,विपदा,कोरोना पर तुम करना सिंह सा प्रहार
विदाई बेला सब कहे ना जा मेरे यार
आ रहा है दौ हजार इक्कीस का नव वर्ष
करते हैं हम दिल से अभिनंदन बार-बार। -
कविता-स्वागत नए साल का |
कविता-स्वागत नए साल का |
बीत गया वर्ष दो हजार बीस स्वागत नए साल का |
गुजरा वो सब पर रहा भारी पुछो न अब हाल का |
जारी रहा कहर कोरोना फैलाता रहा खूब जहर |
मँडराता रहा मौत का साया सहमा रहा हर शहर |
दुआ करो आए नव वर्ष लाये सपना खुशहाल का |
लोग बेरोजगार हुये किसान मजदूर सब लाचार हुये |
पसरा सन्नाटा शहर अस्पताल मरीज भरमार हुये |
क्या बताए भुखमरी बेकारी व देश खस्ताहाल का |
लगा चक्का जाम हैरान जनता देश हाहाकार हुआ |
ट्रेन चले नहीं बस कार हिले नहीं बंद ब्यापार हुआ |
हाथो को काम नहीं भूखे मज़दूर के हाल बेहाल का |
नया साल आना नया सौगात नई आस संग लाना |
चेहरों मुस्कान चले रोजी दुकान आगाज संग लाना |
उन्नति प्रगति प्रकृति साज विकाश देश मालामाल का|श्याम कुँवर भारती (राजभर )
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो, झारखंड,मोब- 9955509286 -
नेत्रदान:-जीवनज्योति
एक अंधी लड़की देख के
मन में वेदना का ज्वालामुखी फूटा
सोई थी चिर निद्रा में
करुणा से अवधान टूटा…
मन में आया मेर जो
वह सबको आज बताती हूँ
मेरे नेत्र हैं कितने सुंदर
यह सोंच के मैं मुसकाती हूँ…
इन नेत्रों का जीवन
मेरे जीवन से लम्बा होगा
मेरी सुंदर आँखों से कोई
सारी दुनिया को देखेगा…
मर कर भी मैं अपना नाम
अमर कर जाऊंगी
करना चाहती थी कुछ बड़ा,
अब नेत्रदान कर जाऊंगी
नेत्रदान करना,
अपने वंश की बनाये परंपरा
अपनी आँखें देकर
किसी के जीवन में दें प्रकाश फैला.. -
“रक्तदान है महादान”
रक्तदान है महादान
यह ‘प्रज्ञा शुक्ला’ कहती है,
रक्ताल्पता को अक्सर
जीवन में अपने सहती है…
रक्तदान करने से कोई
कमजोरी नहीं आती है,
इतनी दुआएं मिलती हैं कि
झोली भर जाती है…
किसी की बुझती जीवन ज्योति को
रक्त देकर दीप्तिमान करो
रक्तदान कर हे मानव !
मानवता पर एहसान करो…
जाने कितने हैं प्राणी जो
रक्ताल्पता से मर जाते हैं,
रक्त ना मिलने के कारण
कितने दीपक बुझ जाते हैं..
हो यदि सक्षम तो हे मानव !
नियमित रूप से रक्तदान करो
सब यज्ञों से बढ़कर है तुम ये महादान करो… -
गीली रेत पर…..
थमी हुई जिंदगी
थमे हुए पल
रुकती, चुकती सांसें
उंगलियों की पोरों से छूटते
रिश्तों के रेशमी धागे
ठंडी, बेजान दीवारों से टकराते
जीने, मरने, हंसने और रोने के पल
कितना कुछ
लिख गया गुज़रता साल
गीली रेत परकोई तो मौज हो
मिटा जाए इस अनचाही तहरीर के निशान
छू जाए
आते साल का पहला क़दम
कि ज़िंदगी बेख़ौफ फिसल आए
बेजान दीवारों से
फिर लिख जाए अपना नाम
गीली रेत परडॉ. अनू
३१.१२.२०२०