“गुनाहों की देवी”

अपने गुनाहों को मैं
हमेशा छुपा लेती हूँ
शर्म आती है तो नजरों को
झुका लेती हूँ
दीवार पर दिखते हैं
कारनामे जब अपने
आवेश में आकर मैं दीपक को बुझा देती हूँ ।

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