दिन का वो कोना

दिन का वो कोना जिसे सब शाम कहते हैं ,
मैं उनको काट कर अलग रख देता हूँ..
मेरी सब शामें बंद हैं अलमारी में बरसों से…

चुभती हुई रातों से जो एक सुई मिल जाए,
तो लम्बे से दिनों से एक धागा मांगूँ..

उन टुकड़ों को सी कर..
एक चादर जो बन जाए कभी..
तो पूरे दिन को मैं शाम की तरह जी लूँ.


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7 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 8, 2019, 8:45 pm

    Nice

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 8, 2019, 8:48 pm

    Nice

  3. राही अंजाना - November 8, 2019, 9:03 pm

    Waah

  4. nitu kandera - November 9, 2019, 5:13 pm

    Wah

  5. देवेश साखरे 'देव' - November 9, 2019, 9:48 pm

    बहुत खूब

  6. NIMISHA SINGHAL - November 9, 2019, 11:56 pm

    Wah kya khub

  7. Abhishek kumar - November 24, 2019, 2:13 pm

    गुड

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