दिन का वो कोना

दिन का वो कोना जिसे सब शाम कहते हैं ,
मैं उनको काट कर अलग रख देता हूँ..
मेरी सब शामें बंद हैं अलमारी में बरसों से…

चुभती हुई रातों से जो एक सुई मिल जाए,
तो लम्बे से दिनों से एक धागा मांगूँ..

उन टुकड़ों को सी कर..
एक चादर जो बन जाए कभी..
तो पूरे दिन को मैं शाम की तरह जी लूँ.

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

6 Comments

  1. Astrology class - November 8, 2019, 8:45 pm

    Nice

  2. Astrology class - November 8, 2019, 8:48 pm

    Nice

  3. राही अंजाना - November 8, 2019, 9:03 pm

    Waah

  4. nitu kandera - November 9, 2019, 5:13 pm

    Wah

  5. देवेश साखरे 'देव' - November 9, 2019, 9:48 pm

    बहुत खूब

  6. NIMISHA SINGHAL - November 9, 2019, 11:56 pm

    Wah kya khub

Leave a Reply