दीवाली आ रही है

दीवाली आ रही है
फुटपाथ में भी,
नंगे -धड़ंगे, भूखे, ठिठुरते
सोचते हैं कल हम
गुब्बारे बेचेंगे।
एक दस बरस के
नन्हें के बापू ने
गुब्बारे खरीदने को
दस रुपये दिए हैं।
दस के गुब्बारे
खरीदेगा कल वो,
भर उनमें साँसों को
बेचेगा कल वो।
जो भी मिलेगा लाभ
उनसे फिर वो
खरीदेगा गुब्बारे
बेचेगा फिर वो।
शाम होते-होते
कमा कर के खुशियां
दिवाली के सपने
सजायेगा फिर वो।

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Responses

  1. ऐसी दीवाली की कल्पना करना ही मन को पीड़ा पहुंचाती है…
    उम्दा रचना

  2. दीवाली पर सभी बच्चे बहुत ही ख़ुश होते हैं और ख़ूब खर्च करते हैं, एक गरीब बच्चे की भावनाओं का बेहद मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है कवि सतीश जी ने, अपनी कविता में । बहुत ही यथार्थ परक प्रस्तुति

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