देख लिया

देख लिया दुनिया तुझको
अब और नहीं कुछ चाहत है,
हर तरफ चेहरे पर एक चेहरा है
अपनों से ही हर जन आहत है।
अब और फरेब की गुंजाइश नहीं
यहां अपनापन की लगी नुमाइश है
ढिठता की हद पार किए
दिखती ‌नही‌ शरमाहट है।


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6 Comments

  1. Satish Pandey - January 27, 2021, 9:22 pm

    कवि सुमन जी की बेहतरीन प्रस्तुति। उत्तम रचना

  2. Geeta kumari - January 27, 2021, 10:15 pm

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  3. Suman Kumari - January 28, 2021, 4:22 am

    सादर धन्यवाद

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - January 28, 2021, 7:50 am

    अतिसुंदर भाव

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