मुक्ति की तलाश

*यह कविता एक ऐसे व्यक्ति पर आधारित है जो की अपनी मृत्यु के पश्चात अपनी व्यथा सुना रहा है*

मैं अब दुबारा जीना नहीं चाहता
जब जिंदा था तब कौन सा जीने दिया तुमने
अब जाकर सुकून से बैठा हूं
कभी इस डाल पे कभी उस डाल पे

यहां से कुछ दूर ही
मेरा घर हुआ करता था
मरने के बाद रहा कुछ दिन वहां भी
फिर कुछ लोग आए
और तोड़ गए
सोचा घर के पीछे वाले आम के पेड़ में रह लूं
पर गली के बच्चे पत्थर बहुत मारते हैं
जून की इस गर्मी में
छांव भी नसीब नहीं होने देते

घर तोड़ने वाले फिर आए
विकास के नाम पर यह पेड़ भी काट दिया
अब वहां से एक सड़क गुजरती है
जहां मैं गुजरा था

बड़ी मुश्किल से एक पेड़ मिला
इन पर्यावरण प्रेमियों के शहर में
पर तुम लोगों की सांसों का शोर यहां भी सोने नहीं देता

तुमसे अच्छा तो यह पेड़ हैं
चुपचाप सोते हैं, खर्राटे भी नहीं लेते
बरसी होने को है अगले महीने
पर कभी किराया भी नहीं लेते

इस संसार से मुक्त होकर बैठा हूं मुक्ति की तलाश में
मरने के बाद भी मरने के इंतजार में क्योंकि, मैं अब दुबारा जीना नहीं चाहता

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