रिश्तों का सत्य

रिश्तों का सत्य जो लगता यथार्थ से परे सदा
मानते हुए छलावा हम जुड़े रहना चाहते है सदा

ये रिश्तें जो खून से बनते ,खून में ही पनपते है
अंत होता है खून में ही ये सनते है सदा

इन्हे तोड़ने का साहस भी न कोई जुटा पाया कभी
है कोई इस खोखलेपन से गहरा जुड़ा है सदा

अदा करना जरूरी नहीं जितना जताना जरूरी है
इन रिश्तों ने जताया है अपना हक़ वो सदा

जिसे सीखे गए बस औरों को सीखने के लिए
सिखाये है रिश्तों ने ऐसे ही दस्तूर सदा

इन रिश्तों का भ्रम कब तक कोई पाले
अहसास एक पल भी न होने का रहता है सदा

तोड़ डाले पर होगा ये यथार्थ से सीधा पलायन
जुड़े बैठे है अनचाहे इन रिश्तों से सदा

राजेश’अरमान’ ०५/०२/१९९२

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