**स्वयंवर**

सीता सम हो स्वयंवर
हर नारी को मिले
अपना वर चुनने का अधिकार
तभी तो बनेगी राम-सीता की जोड़ी..

परिवार ढूंढ लाते हैं रावण-सा
दामाद और भेज देते हैं संग में
अपनी दुलारी
कैसे रहेगी ? कैसे निभेगी ?
जब मिलती नहीं है जरा भी सोंच दोनों की
आखिर दुलारी
होती है प्रताड़ित झेलती है जीवन भर
रावण को या फिर
छोंड़ जाती है बेबस हो दुनिया बेचारी…

लड़के की खातिर ढूंढ लाते हैं
शूर्पनखा-सी पत्नी
और बनाते हैं उसे अपने घर की लक्ष्मी
वो तो बेटा ही जानता है
कैसे कटती हैं उसकी रातें
किससे कहे वह
अपने दिल की बातें…

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Responses

  1. आपने इस कविता के माध्यम से विवाह की एक परिभाषा दी है कि जिस प्रकार प्राचीन काल में स्त्रियों को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार मिलता था उसी प्रकार आधुनिक युग में भी अधिकार मिलना चाहिए जिससे विसंगत जीवनसाथी मिलने की उम्मीद ना रहे अच्छा और उत्तम जीवन साथी जीवन की नैया को पार लगाता है

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