किससे शिकवा करें..

‘किससे शिकवा करें दामन ये चाक होना था,
मगर करते भी क्या, ये इत्तेफाक होना था..

गमों की भीड़ हमारी कश्मकश में उलझी रही,
तय हुआ यूँ हमें गम-ए-फिराक होना था..

जिसे हवाओं से हमने कभी न घिरने दिया,
उसके तूफान की हमें खुराक होना था..

हवा मिलती रही रह-रह के बुझती आतिश को,
मेरे ही सामने घर मेरा खाक होना था..

शहर से दूर किया दफ्न ज़माने ने हमें,
हमारे साथ ही ये भी मज़ाक होना था..

किससे शिकवा करें दामन ये चाक होना था,
मगर करते भी क्या, ये इत्तेफाक होना था..’

– प्रयाग धर्मानी

मायने :
शिकवा – शिकायत
चाक – फटा हुआ
कश्मकश – असमंजस
गम-ए-फिराक – जुदाई का गम
आतिश – आग

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