6 Comments

  1. कवि गीता जी की यह रचना समसामयिक यथार्थ पर आधारित है। इन दिनों जो घटित हो रहा है उस पर उनकी कवि दृष्टि निरंतर पड़ी हुई है, और बेबाकी से कविता के रूप में मुखरित हुई है। बिना किसान सभी कुछ अपूर्ण है। यदि अन्नदाता न हों तो देश व समाज कैसे जीवित रहेगा। लेकिन विडंबना यह है कि इस कड़ाके की ठंड में वे सड़कों पर हैं। अब हल धर से जुड़ी समस्याओं का हल होना ही चाहिए। बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

  2. सही कह रहे हैं सर यह बिल्कुल यथार्थ चित्रण है ।आपकी दी हुई इतनी सुन्दर समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी
    अभिवादन सर

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