बेवफा से वफ़ा
दिल ले के वो नादान, दग़ाबाज़ी करते चले गए।
रेत में हम उनके लिए, महल बनाते चले गए।।
हमें क्या पता था, खूबसूरत समंदर की बेवफ़ाई।
हम तो समंदर की सुरत पे, एतवार करते चले गए।।
जो होना था सो तो हो गया, क्या करे “अमित ” ।
ए आँखें भी बिन सावन के ही, बरसते चले गए।।
अतिसुंदर
Thanks Pabdit Jee
Beautiful poem
Thank u so much
उम्दा पंक्तियाँ
शुक्रिया मेहरबान।
सुन्दर
धन्यबाद।
सुन्दर रचना
शुक्रिया सुमन जी।