यूं तो हंसीनों की कमी नहीं तेरे शहर में।
एक तुझ पे ही दिल आया पहली नज़र में।
और कोई नजर आता नहीं, एक तेरे सिवा,
इंकार नहीं, प्यार घोलकर पिला दो ज़हर में।
रहने को तो हम हुस्नों के बीच भी रहे हैं,
ना थी वह बात, उन हुस्नों के असर में।
नहीं कहता चांद तारे कदमों में बिछा दूंगा,
सजाकर रखूंगा ताउम्र तुम्हें दिल के घर में।
दिल की गहराई में ‘देव’ उतर कर तो देख,
नहीं मिलेगा ऐसा सैलाब गहरे समंदर में।
देवेश साखरे ‘देव’
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