गीत, गज़लें लिख रही हूँ..

गीत, गज़लें लिख रही हूँ
कुछ अलग ही दिख रही हूँ
होंठों पर हैं लफ्ज अटके
मन ही मन में पिस रही हूँ
आ गई अब शाम, दिन की
दोपहर ही लग रही हूँ
गुनगुनी-सी देह है और
ठण्डी-ठण्डी रात है
नींद है भटकी हुई सी
सिमटी-सिमटी लग रही हूँ
कुछ अलग ही दिख रही हूँ..

Comments

18 responses to “गीत, गज़लें लिख रही हूँ..”

  1. This comment is currently unavailable

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद

  2. Geeta kumari

    वाह, प्रज्ञा जी….. कमाल का लेखन है आपका हृदय की वेदना का बहुत ही खूबसूरती से वर्णन किया है।…… कलम को सलाम

    1. आभार दी मैं भी सोंचा करती हूँ सबकी जी भर के तारीफ करूं पर कुछ समझ ही नहीं आता
      ऊपर से समयाभाव भी रहता है

      1. Geeta kumari

        बस… यही तुम्हारी तारीफ़ मान ली मैने तो….Be happy dear pragya rani.

  3. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

    1. Suman Kumari

      बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति है मैम।
      इस रचना के माध्यम से खुद की प्रस्तुति , क़ाबिले तारीफ़ है ।

  4. Satish Pandey

    गीत, गज़लें लिख रही हूँ
    कुछ अलग ही दिख रही हूँ
    बहुत ही सुन्दर पंक्तियों का सृजन किया है प्रज्ञा जी, भाषा की लय और सरलता काबिलेतारीफ है, आंतरिक रस व् संगीत की सृष्टि करती हुई सुन्दर कविता है, इस प्रतिभा को सैल्यूट है।

    1. आप बड़े हैं आपको मेरा नमस्कार भाई

  5. Rishi Kumar

    लाजवाब

  6. अतिसुन्दर

  7. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर पंक्तियां

  8. Antariksha Saha Avatar
    Antariksha Saha

    Bahut umda

Leave a Reply

New Report

Close