कलम भी रो पड़ी…

मेरे जीवन की कहानी
दुःख ही रही
आखिर क्या लिखूँ आज
जो अभी तक मैंने लिखा नहीं…
विधाता ने मेरे भाग्य में
आँसुओं के सिवा कुछ
भी लिखा नहीं…
मेरे पतझड़ समान जीवन पर
बरसात हमेंशा बनी रहती है
हर पल नैन बरसते रहते हैं…
मेरी व्यथा से
सारे पन्ने भर गये
कलम भी बेबस होकर
रोने लगी
इतना दर्द था मेरे एक-एक
लफ्ज में…!!

Comments

12 responses to “कलम भी रो पड़ी…”

  1. Geeta kumari

    बहुत हृदय स्पर्शी रचना है प्रज्ञा…
    कलम क्या कागज़ भी रो पड़ा होगा ।
    …… उत्कृष्ट लेखन

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बड़ी मार्मिक भाव

  3. Pratima chaudhary

    मेरी व्यथा से
    सारे पन्ने भर गये
    कलम भी बेबस होकर
    रोने लगी
    इतना दर्द था मेरे एक-एक
    लफ्ज में…!!
    अत्यंत मार्मिक, मानवीकरण का सुन्दर प्रयोग

    1. Pragya Shukla

      Thank you so much

  4. दर्द की कविता।
    सुन्दर भावाभिव्यंजना

  5. This comment is currently unavailable

  6. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत मार्मिक

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