इक हद होती है

हर बात की आखिर
इक हद होती है

सच लगता था कभी
झूठ आज साबित हुआ
अँधेरे में थी जिंदगी
उजाले पर काबिज हुआ

भविष्य देखने का दावा
अब तो खोखला पड़ा
जिसकी हथेली थी खाली
वो ही सिंघाशन चढ़ा

लगता था कभी जंगलराज
खत्म न हो पायेगा
इक चायवाला आसमा को
जमी की हकीकत दिखायेगा

अब तो लगता असंभव
कुछ भी नहीं है यहाँ
कुछ भी मुमकिन है
ये है अपना हिंदुस्तान

उम्मीद की किरण जागी
सत्ताधारी दहशत में है
सरकारी कुर्षीधारी की अकड़
लम्बी आकस्मिक छुट्टी पर है

समर्थ की ही होती परीक्षा
नयी चुनौती आती है
असमर्थ की सुस्ती देख
मुश्किल भी शर्माती है

हिम्मतवाले से हार परास्त
एकता बढ़ती जाती है
दबे कुचलों को मिलता बल
मानवता उठती जाती है

Comments

5 responses to “इक हद होती है”

  1. बहुत खूबसूरत पंक्तियां

  2. Pragya Shukla

    यथार्थ प्रस्तुत करते हुए
    जिस प्रकार आपने समसामयिक शासन
    का व्याख्यान किया और
    प्रधानमंत्री जी की अच्छाईयों को गिनाया है आपका देश प्रेम दर्शाती है और साहित्य सृजन करने की आपमें असीम क्षमता है..

  3. Geeta kumari

    शासन व्यवस्था का समसामयिक यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है, राजीव जी आपने अपनी कविता में, शब्दावली भी सुंदर है । देश भक्ति की भावना को दर्शाती हुई बेहद खूबसूरत रचना ।

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