देख रहा दर्पण मनुज

देख रहा दर्पण मनुज
करने निज पहचान,
बाहर तो सब दिख गया
भीतर से अंजान।
भीतर से अंजान,
खिली लालिमा देख कर
मुस्काया मन ही मन
देखा जब सुन्दर तन।
कहे सतीश बाहर
भीतर रह तू एक,
आंख बंद कर निज
अंतस के भीतर देख।

Comments

6 responses to “देख रहा दर्पण मनुज”

  1. देख रहा दर्पण मनुज
    करने निज पहचान,
    बाहर तो सब दिख गया
    भीतर से अंजान।
    भीतर से अंजान,
    खिली लालिमा देख कर
    मुस्काया मन ही मन
    देखा जब सुन्दर तन।

    मनुष्य को अंदर से बाहर तक पहचानने की बात बताती कभी सतीश जी की बहुत ही प्यारी रचना

  2. पाण्डेय जी की बहुत सुन्दर रचना

  3. Geeta kumari

    कहे सतीश बाहर
    भीतर रह तू एक,
    आंख बंद कर निज
    अंतस के भीतर देख।
    _______ तन से अधिक मन की सुंदरता मायने रखती है, यही जीवन दर्शन समझाती हुई कवि सतीश जी बहुत ही श्रेष्ठ रचना.. कवि ने गागर में सागर भर दिया बहुत उम्दा लेखन

  4. Deepa Sharma

    Wow beautiful thought

  5. लाजवाब रचना

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