हमारे परिपक्व बंधन पर था
घोर अंधेरा छाया
एक भंवरे ने आकर के
तेरा हाल बताया
तेरी बेचैनी पर मेरी आँख
भर आई
तेरी नादानी पर मुझको
हँसी खूब है आई
ये कैसा अल्हण पन है ?
यह फागुन का मौसम है
आ बाँहों में तू आ जा
यह मन अब भी पावन है
है तूने दूरी बनाई
है पास तुझे ही आना
एक वादा अब कर देना
फिर दूर कभी ना जाना….
“परिपक्व बंधन”
Comments
16 responses to ““परिपक्व बंधन””
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हमारे परिपक्व बंधन पर था
घोर अंधेरा छाया
एक भंवरे ने आकर के
तेरा हाल बताया
ह्रदय की व्यथा बयान करती हुई कवि प्रज्ञा जी की बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति-

Thanks di
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बहुत खूब
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Tq
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Thanks
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Tq
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किसी से नाराजगी व्यक्त करती तथा उसे याद करती हुई रचना
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Tq
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अत्यंत सुंदर रचना
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धन्यवाद
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कमाल की कविता है
नमन है आपकी लेखनी को
१०० टका सच कहा-

धन्यवाद
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बहुत सुन्दर प्रस्तुति
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Tq
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