“परिपक्व बंधन”

हमारे परिपक्व बंधन पर था
घोर अंधेरा छाया
एक भंवरे ने आकर के
तेरा हाल बताया
तेरी बेचैनी पर मेरी आँख
भर आई
तेरी नादानी पर मुझको
हँसी खूब है आई
ये कैसा अल्हण पन है ?
यह फागुन का मौसम है
आ बाँहों में तू आ जा
यह मन अब भी पावन है
है तूने दूरी बनाई
है पास तुझे ही आना
एक वादा अब कर देना
फिर दूर कभी ना जाना….

Comments

16 responses to ““परिपक्व बंधन””

  1. Geeta kumari

    हमारे परिपक्व बंधन पर था
    घोर अंधेरा छाया
    एक भंवरे ने आकर के
    तेरा हाल बताया
    ह्रदय की व्यथा बयान करती हुई कवि प्रज्ञा जी की बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बहुत खूब

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  5. किसी से नाराजगी व्यक्त करती तथा उसे याद करती हुई रचना

  6. अत्यंत सुंदर रचना

  7. कमाल की कविता है
    नमन है आपकी लेखनी को
    १०० टका सच कहा

  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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