अज़ीब संपनता

 क्या अज़ीब संपनता है

इस देश की

क्या खूब साधनता है

यहां की

किसी के यहां तो

रोज़ कोई

नया पकवान बनता है

और कहीं तो

रोज़ कोई

भूखा ही मरता है

ये असमानता भी

क्या खूब बन पड़ी है

जो अलगअलग जगहों पर भी

समान रूप से खड़ी है।

 

हम खेतों में

इतना उत्पाद उगाने का

दावा करते हैं

कि विदेशों में भी

उसे भेजने का

वादा करते है

लेकिन मिटा पा रहे

हम अपने ही देश के

कितने ही गरीबों के

 भूखे पेट की भूख

क्या इस बात पर

हम कभी

ध्यान भी कर रहे हैं।

 

गरीबों की गरीबी

मेज़बूरो की मज़बूरी

मासूमो की मासूमियत

और जरूरतमंदो की जरूरत

आज़ सिर्फ

इतनी ही बनकर रह गई है

कि पत्रकारों को

खबर मिल जाए

छापने के लिए

चैनलों को मुद्दा मिल जाए

बहस करने के लिए

और हमारे आदरणीय नेताओं को

मौका मिल जाए

भाषण देने के लिए

या फिर सोशल मीडिया को

कोई नया वीडियो मिल जाए

इंटरनेट पर डालने के लिए।

 

  समस्याएँ तो बहुत पुरानी हैं

लेकिन साथ में

एक और समस्या पुरानी है

कि कितनों ने ही

कितने ही तरीकों से दिखाई है

और कितनी ही बार समझाई है

लेकिन लगता नहीं

कि किसी कर्ताधर्ता के

समझ में आई है

ही लगता है

कि किसीके समझ में आनी है

क्योंकि

जो बैठे हैं उंचे पदों पर

उनके लिए अभावपने का

कहां कोई मानी है।

 

कईं बार तो

मुझे खुद पर भी

शक होने लगता है

कि आज़ अभावी हूँ

तो सोचता रहता हूँ

अभावी लोगों के दुख भी

लिखता रहता हूँ

लेकिन कल अगर

अभाव से दूर हो जाऊँ

तो कहीं मैं

ये बातें करना भी छोड़ जाऊँ

डर ये मेरे भीतर

देख देखकर आया है

दुनियाँ का हाल

कर देता है जो

कईं बार मुझे बेहाल।

 

लोग अक्सर करते हैं

ये कारनामा

पहले अपनी समस्याओं के सवाल

लेकिन बाद में

संपनता आने पर

उन्ही समस्याओं को

कहने लगते हैं बवाल

क्योंकि ये समस्याऐं

अब उनकी

खुद की कहां रहती हैं

जो अब ये बातें

उनके समझ में

आने को रहती हैं।

 

                                   कुमार बन्टी

 

 

 

 

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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