आलसियों के महाराज (बाल कविता)

भिन-भिन करती,
मक्खियां आई!
भी-भी करते,
मच्छर लाई!

गोलू बड़े ही मस्त मौला,
जिन्न को झट से आवाज लगाई,
मुस्कुराकर जिन गोलू से बोला,
चैन से सोएं मेरे साईं,
मच्छरदानी! अभी लगाई।

भी -भी ,भिन-भिन,
मच्छर कांटे!
गिन -गिन ,
गिन -गिन,
सपनों की गहराइयों से,
गोलू ने फिर की लड़ाई।

ओ रे मच्छर!
तुझको जरा-सी शर्म ना आई,
तुझे ना आती, मुझे तो आती,
नींदें मेरी बड़ी सुहानी,
तुमने नालायक क्यों भगाई।

ऊपर से ये मच्छरदानी,
पास मेरे ये क्यों ना आई,
आजा तनिक! लग जा ज़रा,
मेरी चारपाई करें दुहाई ।

और इतनी दूरियां अच्छी नहीं,
चद्दर को उसने, तंज लगाई।

तुम तो बहुत ही प्यारी हो,
पैरों की मेरे दुलारी हो,
ज़रा आ जाओ!
मेरी चरण पादुकाओं!

ओह ! ये शौचालय कितना दूर!
निर्दई पापा ! क्यों बनवाईं।
अचानक मां की आवाजें आई,
सो गया बेटा!
गोलू ने फिर दुबकी लगाई,
सब्र से महसूस,
किया ज़रा-सा,
ओह ! आ गया मेरा, तिलस्मी जिन्न!

मगर ये टॉयलेट,
बड़ी खिसियानी ,
नींद के पल में; जोर से आईं,
क्या करूं ,क्या ना करूं!
अब तो जाना; पड़ेगा भाई!
😔😔😣🙄

—मोहन सिंह मानुष


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4 Comments

  1. Rishi Kumar - November 16, 2020, 2:40 pm

    Oooo
    Very good

  2. Pragya Shukla - November 16, 2020, 9:56 pm

    बहुत सही👌👌👌👏👏

  3. Suman Kumari - November 17, 2020, 3:56 pm

    सुन्दर

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 18, 2020, 8:05 am

    सुंदर

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