आलाप

जो बढ़ रहा है हाथ नापाक उसे तोड़ना होगा,
हाथ मिलाया था जो बेशक उसे छोड़ना होगा,

रच लिए बखूबी प्रपंच और चढ़ लिए ढेरों मंच,
अब उतर कर जंग में इनका सर फोड़ना होगा,

वार्तामाप नहीं अब और कोई भी आलाप नहीं,
ये मानलो इन हवाओं का भी रुख मोड़ना होगा।।

राही अंजाना

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

10 Comments

  1. देवेश साखरे 'देव' - September 16, 2019, 3:18 pm

    वाह

  2. Poonam singh - September 16, 2019, 3:29 pm

    Good one

  3. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 16, 2019, 3:50 pm

    वाह बहुत सुन्दर

  4. ashmita - September 16, 2019, 4:39 pm

    Nice

  5. राम नरेशपुरवाला - September 16, 2019, 4:53 pm

    Kya baat h

Leave a Reply