✍✍✍काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती ,
शिर्फ एक इंसायनित की नाम होती,,
तो दिल्ली मै बैठे गद्देदार की रोटी नही सिझती।
रामायण और कुरान मे भेद बताकर अपनी रोटी सेकते है गद्देदार ,,
अगर बच्चे प्रर्थाना करते तु ही राम है,तु रहीम है, तु करीम —–
तो सौ वर्षो से हो रही गाथा मे भेद बताकर मुल्क को बाटँते हो गद्देदार,
अब बस करो अपनी रोटी सेकना गदे्दार मेरे बच्चे के हाथ मे फुल के बदले हथियार देना बंद करो।
मेरे मुल्क को मत बाँटो तु बाँट लो अपना परिवार हो सके तो छोड़ मेरे मुल्क को चल जा दुसरे मुल्क के गद्देदार को पकड़ ले तु हाथ,,
मेरे मुल्क को मत बाँटो गद्देदार।।
खुन पसीना से सीचा है गाँधी इसे मत तु कर वर्वाद ,
तु छोड़ दे मेरे मुल्क को गद्देदार।।✍✍✍
ज्योति
काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती
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Comments
2 responses to “काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती”
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Waaaaah
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अभार आपका
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