को बृषभानुलली सम

धवल चन्द्र सम उसका चेहरा ।
कनक कपोल पे एक तील का पहरा।
अरुण अधर अनार कली सम।।
भृकुटी कमान नजर शर शोभित ।
कुहू कुम्भ लट घुर्मित केशपाश से शोभित।
भधुर बोल बड़ मधुर डलीसम।।
उन्नत भाल नासिका अति उन्नत।
सुखद मनोहर अंक जस जन्नत ।
‘विनयचंद ‘को करुणाकारी को बृषभानु लली सम।।


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5 Comments

  1. Pragya Shukla - April 11, 2020, 10:31 am

    Good

  2. Dhruv kumar - April 12, 2020, 10:15 pm

    Nyc

  3. NIMISHA SINGHAL - April 14, 2020, 2:51 pm

    Nice

  4. Abhishek kumar - May 10, 2020, 10:45 pm

    जय श्री राधे

  5. Abhishek kumar - May 17, 2020, 12:42 pm

    👌

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