गरीब के लाल

नये कपड़े, नयी उमंग,
पटाखे और डिब्बे की मिठाई ।
गरीबी में पल रहे लाल के
किस्मत में कहाँ है भाई ।।
दीप जला कर खेल कूद कर।
अपनी शौक को खुद में ही,
कभी सिमटते हुए देखा है भाई?।।


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6 Comments

  1. Pragya Shukla - November 7, 2020, 6:32 pm

    बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति की है आपने
    आपकी इस कविता ने मुझे भाव विभोर कर दिया और शिल्प ने सावन की चकाचौंध बढ़ा दी है..
    जिस तरह आपने प्रश्न अलंकार का उपयोग किया है एवं गरीब की दीपावली कैसी होती है बताया है वह काबिले तारीफ है..
    मैं एक बात और जोड़ना चाहूंगी गरीब के लाल यानी गुदड़ी के लाल….

  2. Praduman Amit - November 7, 2020, 6:55 pm

    आपकी समीक्षा ही मेरे लिए अनमोल तोहफ़ा है। आप हमेशा मेरी हौसला अफ़जाई की है। इसके लिए मै आपको तहे दिल से धन्यवाद देता हूँ ।

    • Pragya Shukla - November 7, 2020, 7:51 pm

      आभार सर आपका और मैं हमेशा ही आपके साथ हूँ

  3. Geeta kumari - November 7, 2020, 7:45 pm

    गरीब बच्चों के भावों की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 8, 2020, 8:38 am

    बहुत खूब

  5. Dhruv kumar - November 8, 2020, 9:44 am

    Nice

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