ज़िन्दगी की तारीख

ज़िन्दगी की तारीख नहीं होती_

वरना हर तारीख पर फ़क़त ज़ख़्मों का हिसाब होता शाद-ए-लम्हें कहाँ खर्च हो गये कभी हिसाब ही नहीं मिलता_
-PRAGYA-

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5 Comments

  1. Antariksha Saha - August 19, 2019, 2:35 pm

    Good one

  2. ashmita - August 22, 2019, 2:52 pm

    Nice

  3. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 11, 2019, 12:24 am

    वाह बहुत सुंदर रचना

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