तकिया

तकिया
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रोती रही कईयों दिन तक,
दोस्त खबर भी देते रहें,
हम भी रोते घर बैठे,
जब कोई पूछे हाल मेरा,
झूठी हंसी दिखाते रहें,
कब सोया कब जागा हूं,
मैं जानू या रात ही जाने,
आकर देख मेरे तकिए को
है गीली आंसू से,
उसे नहीं सिखाया हूं,
कैसे धूप में रख दूं उसको,
तकिया है कपड़ा ना,
डरता हूं घरवालों से पूछेंगे कैसे भीगी
कुछ भी जवाब दे पाऊं ना
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’——-


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4 Comments

  1. Pragya Shukla - October 31, 2020, 1:12 pm

    बहुत सुंदर

  2. Geeta kumari - October 31, 2020, 2:53 pm

    बहुत ख़ूब लिखा है

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 31, 2020, 5:36 pm

    अतिसुंदर

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