तलाश

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खुद को तलाशते गुमनामी में कहीं खो न जाऊँ।
शोहरत की हसरत में गुमनाम कहीं हो न जाऊँ।

चढ़ते सूरज को तो सारी दुनिया सलाम करती है,
डरता है दिल की मैं अंधेरे में कहीं सो न जाऊँ।

सितारे की मानिंद रौशनी आती रहे, धुंधली सही,
भीड़ में मगर, नज़रों से ओझल कहीं हो न जाऊँ।

सुना है, हाथों की लकीरों में नसीब छिपा होता है,
अश्कों से मैं हाथों की लकीरें कहीं धो न जाऊँ।

यूँ तो हमेशा प्यार के ही फूल खिले, पर डरता हूँ,
दिले-ज़मीं पर नफ़रत के बीज कहीं बो न जाऊँ।

देवेश साखरे ‘देव’

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14 Comments

  1. nitu kandera - October 30, 2019, 11:26 am

    Nice

  2. Poonam singh - October 30, 2019, 2:19 pm

    Nice

  3. Kumari Raushani - October 30, 2019, 7:41 pm

    उम्दा पोस्ट

  4. महेश गुप्ता जौनपुरी - October 30, 2019, 9:52 pm

    वाह बहुत सुंदर रचना

  5. NIMISHA SINGHAL - October 30, 2019, 11:44 pm

    Wah

  6. Abhishek kumar - November 24, 2019, 11:58 pm

    👏👏

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