दो गज़ ज़मीन

मै उनके गली में दो गज़ ज़मीन मांगी
एक आशियाना बनाने को
उसने इतनी बड़ी शर्त रखी कि ,
मैं दंग रह गया
सोचने लगा मेरी इतनी औकात कहाँ
जो उनकी ख्वाईश को हम पुरा कर सके
मै वापस वहीं चला गया जहाँ
आशिक़ गम की समंदर में
डुबकी पे डुबकी आज भी लगा रहे है।


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3 Comments

  1. Sandeep Kala - December 23, 2020, 10:12 pm

    शानदार लिखा है आपने

  2. Pragya Shukla - December 24, 2020, 2:48 pm

    हृदयविदारक तथा दिल को कुरेदती हुई रचना

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 24, 2020, 2:59 pm

    अतिसुंदर भाव

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