पुनर्विवाह (Part -2)

पुनर्विवाह (Part -2)
विवाह संस्कार अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं, किसी भी महिला के लिए विधवा होने के दर्द से बड़ा दर्द, दुनिया में और कुछ नहीं होता और वो भी तब जब वो नई नवेली शादीशुदा हो और अपने जीवन साथी के साथ लंबे समय तक जिंदगी बिताने के सपने बुन रही हो। लेकिन प्रकृति के आगे किसी का जोर नहीं चलता और कई मामलों में भरी जवानी में ही पति की मौत हो जाती है और उस विधवा औरत पर एक तरह से मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ता है। आज पहले जैसी स्थिति तो नहीं क्योंकि कानूनी तौर पर अब विधवा औरत का पुनर्विवाह किया जा सकता है। कानून की दृष्टि से तो सब ठीक है लेकिन सामाजिक स्तर पर देखें तो आप को ऐसे विरले घर मिलेंगे जहां सास-ससुर ने अपनी विधवा बहू को बेटी समझ कर उसका पुनर्विवाह कर करते है । अपनी बहू का भी संसार उजड़ता देख कर बहुत ज्यादा दुखी थे।
कुछ ऐसा ही हुआ था आरती के साथ। लेकिन आरती सास – ससुर से आरती का ये दर्द देखा नहीं गया जिसके बाद उन्होंने कुछ ऐसा कदम उठाया कि अब चारों तरफ उनकी ही चर्चा हो रही है। इस फैसले से कुछ लोग यानि कुछ रिश्तेदार राजी भी नहीं थे
दरअसल, आरती का पति भी अपने माँ- बाप का इकलौता लड़का था भरी जवानी में बेटे की अचानक हुई मौत से पूरा परिवार सदमे में चला गया।
अपने पति की अचानक मौत से आरती भी पूरी तरह से टूट गई। आरती अपने पति के बारे में सोच-सोचकर डिप्रेशन में चली गई थी। कभी-कभी उसे लगता था कि वो सब कुछ छोड़-छाड़कर अपने मायके चली जाए, लेकिन फिर आरती अपने बूढ़े सास-ससुर का ख्याल आता था तो अपने कदम रोक लेती थी।
इधर, आरती के सास-ससुर से भी अपनी बहू की ये हालत देखी नहीं जा रही थी, जिसके बाद उन्होंने एक सराहनीय कदम उठाते हुए फैसला किया कि आरती की शादी करा दी जाए। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत थी कि क्या आरती दूसरी शादी करने को राजी होगी? अगर आरती राजी हो भी गई तो दूसरी शादी किस के साथ करेगी ? आरती के सास-ससुर को ये चिंता थी कि क्या आरती दूसरी शादी से खुश भी रहेगी या नहीं ? कुछ पता नही था………….
आरती के सास-ससुर ने अपने इकलौते बेटे की मौत के बाद अपनी बहू को न केवल पढ़ाया बल्कि पढ़ाने के बाद (Asha Workers) नौकरी भी करवा रहे है। ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सके। लेकिन भरी जवानी में पहाड़ जैसी जिंदगी का बोझ लेकर आरती कैसे आगे बढ़ेगी। इसकी चिंता भी आरती के सास-ससुर को सताने लगी। इसी दरम्यान आरती के सास-ससुर ने बड़ा फैसला यह लिया कि वैधव्य के जरिए आरती की जिंदगी बर्बाद होने के बजाए अब बहू को बेटी बनाकर विदा किया जाएगा। सास-ससुर के फैसले पर आरती भी हैरान थी, आरती के सास-ससुर ने बड़ी हिम्मत करके आरती से दूसरी शादी की बात की पर जिस चीज का डर था वही हुआ आरती ने दूसरी शादी से मना कर दिया
आरती ने अपने दिल की बाते अपने सास ससुर के सामने रख दी और नाना प्रकार के प्रश्न पूछे………….. जो प्रश्न आरती ने किये वो भी सही थे माँ – बाबू जी (mother in low & father in low) आपकी सेवा कौन करेगा मेरे जाने के बाद, आपके बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा ?
जैसे आप मेरे से प्यार करते है क्या वो भी मुझे से उतना ही प्यार करेंगे ? और आरती ने सीधा साफ़ मनाना कर दिया मैं आपको छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.. आरती रोते हुए अपने कमरे में चली गई……
ससुराल वालो ने पूरी परिवार को बैठा कर एक बार फिर से सोचा आरती की सासु माँ ने अपने भाई से बात करके भाई के लड़के से शादी करवाने के बारे में सोचा!
भाई के लड़के को घर जमाई बनने के लिए राजी कर लिया, जैसे – तैसे आरती को भी बहुत समझाया और शादी तैयार कर लिया I हालांकि काफी मान-मनौवल के बाद आरती शादी करने को तैयार हो गई। शादी के एक साल बाद आरती ने बेटी को जन्म दिया तो आरती का घर किलकारियों से गूंजने लगा।
ऐेसे परिवार समाज के लिए रोशन की मीनार का ही काम करते हैं। औरत प्रति जितना सम्मान समाज दिखाएगा उसी से समाज की परिपक्वता का पता चलता है। समय की मांग है कि अब अतीत के रुढि़वादी व दकियानुसी विचारों को छोडक़र वर्तमान की परिस्थितियों को सम्मुख रख और औरत की भावनाओं का सम्मान करते हुए नई परम्पराओं की स्थापना होनी चाहिए। हमें हमेशा यह याद रखना होगा पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि पूरक हैं और दोनों का विकास एक-दूसरे पर निर्भर है। इस विकास में आने वाली बाधाओं को दूर करने में ही समाज की भलाई है। आरती के सास-ससुर ने जो कदम उठाया उसके लिए उन्हें बहुत-बहुत साधूवाद । (Thank You)
उपरोक्त परिवार का यह कदम समाज को राह दिखाने वाला है। बेशक कानून ने विधवा पुनर्विवाह को मान्यता दी है लेकिन सामाजिक स्तर पर उपरोक्त कदम उठाने का साहस करने वाले बहुत कम हैं। इसके विपरीत बहू को अशुभ समझकर उसकी हर तरह से प्रताडऩा की जाती है। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि आज 21वीं सदी में भी जहां इंसान चांद व मंगल तक पहुंच चुका है और विकास की चरम सीमा को छू रहा है ऐसे में भी अधिकतर विधवाओं का जीवन नारकीय ही होता है। हां, कुछ अपवाद अवश्य होते हैं, जैसे बाबा बारोह का यह दंपत्ति जिसने बहू को बेटी बनाकर उसका पुनर्विवाह किया ।

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