बड़े शहर की जिंदगी…

बड़े शहर की जिंदगी को छोड़ ,
अब छोटे शहर की जिंदगी को,
जीकर देख रहे हैं
यहां भी लोग हैं; वहां भी लोग थे,
यहां सोच बड़ी, वहां सोच छोटी ,
न निभाते हैं रिश्ते को,
न जानते हैं इंसानियत को,
कौन आपका अपना है,
कौन आपका पराया,
पर जुड़े हैं अब भी सब,
रुपए की चाह में,
हैसियत की छांव में…….

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Responses

  1. शहरीकरण और ग्रामीण जीवन में अंतर ,सोंच में अंतर बखूबी बयां किया है प्रतीमाजी ।

  2. तुलनात्मकता के साथ बड़ी सहजता से आपने भाव रखें हैं और अपनी श्रेष्ठ काव्य प्रतिभा का प्रदर्शन किया है

    1. इतनी सुंदर समीक्षा व मेरे काव्य का सम्मान करने के लिए हार्दिक धन्यवाद आपका प्रज्ञा जी

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