माँ बाप के नाम

पैदा कलम से कोई कहानी की जाए,
फिर जज़्बातों की तर्जुमानी की जाए!

खिलावे हैं खुद भूखे रहकर बच्चों को
माँ-बाप के नाम ये जिंदगानी की जाए!

ग़म से तो हाल ही में ही बरी हुए हम,
मुब्तिला होके बर्बाद जवानी की जाए!

सबको आदत हैं बे-वजह हंगामे की,
कभी हक़ की भी हक़बयानी की जाए।

‘तनहा’आईना के सामने लिखे ग़ज़ल,
ऐसे उसकी खुद की पासबानी की जाए!

तारिक़ अज़ीम ‘तनहा’

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