मुक्तक

1- है बहुत सख्त वक़्त के क़ैद खाने कि सलाखे,
जिन्दगी लाख बन जाए पंछी – मगर उड़ नहीं सकती ।

2- हकीकत से मुह मोड़ने का प्रयास तो देखो,
अक्सर आईने तोड़ दिया करते है लोग ।

3 – अपनी किश्ती को खुद ही संभल ए मुसाफिर ,
अक्सर मांझी बन कर साथ छोड़ दिया करते है लोग ।


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4 Comments

  1. Feran kurrele - July 11, 2016, 12:24 am

    bahut sundar

  2. Anil Goyal - July 12, 2016, 5:55 am

    धन्यवाद

  3. राम नरेशपुरवाला - September 21, 2019, 4:27 pm

    सुन्दर

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