मुक्तक

ख़्वाबे-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर
इन आँसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर
जब से चला हूँ मैं कहीं ठहरा न एक पल
राहें  भी  रो  पड़ीं  मेरी  तलाश  देखकर

©® लोकेश नदीश

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