“मोहब्बत की सजा”

जी रही हूँ..ज़िन्दगी का बोझ उठा रहीं हूँ_

मोहब्बत की सज़ा बो गये हो तुम मैं गुनाहों की फसल काट रही हूँ_

-PRAGYA-

Related Articles

Responses

New Report

Close