आकलन

कहना है बहुत कुछ
शब्द कम पड़ जाते
अफ़सोस सदा रहता है
काश पूरा कह पाते

उनको कम कहना था
अधिक शब्दों को गाते
बात कितनी छोटी थी
शब्दों की माला बनाते

असमंजस में कितने ही
दोस्त हमेशा रह जाते
कितना सुनना था उनसे
उतना वो काश बोल पाते

कुछ के भंडार भरे है
खाली करते चले जाते
सभी सुनकर ऊब चुके है
उन्हें देखते ही छुप जाते

आकलन कहने सुनने की
सही सही न कर पाते
कितने ही प्यारे चहेते
उबासी लेते पर सो न पाते

Comments

3 responses to “आकलन”

  1. सुन्दर रचना

  2. Amita

    सुंदर प्रस्तुति

  3. कहना तो बहुत कुछ है तुझसे बहुत सुंदर

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