भुलाके सादगी हमने

भूलाके सादगी हमने अपनी अस्तित्व ही मिटायी है ।
ब्रह्मचर्य को जिन्दगी का हिस्सा न बनाके अपनी सारी शक्तियाँ यूँही गँवाई है ।
किया है दुरूपयोग नरतन का हमने ऐसे ही व्यर्थ में जिन्दगी जी है हमने ।
भूलाके सादगी हमने अपनी अस्तित्व ही मिटायी है ।।

अनमोल-सी रत्न को हमने चंचल मन पे नचाया है ।
रत्न को रत्न नहीं हमने मिट्टी समझे गँवाया है उसे ।
सारी-की-सारी सादगी भूलाके हमने ।
बेकार-सी सादगी अपनाई है ।।

ब्रह्मचर्च को समझ लेते जरा हम ।
जिन्दगी खुशनुमा बन जाती हमारी ।
आज हम माथे नहीं पिटते ।
गैर अगर अपनी संस्कृति अपना लेते ।।

अपनी संस्कृति है सबसे न्यारा, इसी में है उध्दार हमारा ।
कर लो नर अपनी संस्कृति से प्यार, इसी में है तेरा कल्याण ।।
मत भटकते तुम इधर-उधर की संस्कृति में , इस से होगा तेरा उपहास ।
बचाओ निज राष्ट्र की मर्यादा को तुम, अपनी संस्कृति को धन्यवाद करो तुम ।
निज राष्ट्र में हो या परराष्ट्र में अपनी संस्कृति को उर में जिन्दा रखो तुम ।।
कवि विकास कुमार

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