प्रकृति से दूर हो रहा मानव
दु:खों से चूर हो रहा मानव,
वन प्रकृति की आभा बढ़ाते ,
शुद्ध पवन दे उम्र बढ़ाते
वृक्ष बचाओ वृक्ष लगाओ
वरना एक दिन पछताओगे,
ना खाने को भोजन होगा,
शुद्ध पवन भी ना पाओगे।
देख कुल्हाड़ी कांपा तरुवर,
रोता है चिल्लाता है,
उसकी चीख ऐ लोभी मानव,
तू क्यों ना सुन पाता है
मात्र मृदा और जल देने से,
तरु हमको क्या-क्या दे जाता है
फ़ल-फ़ूल तरकारी देता,
प्रकृति सुरम्य बनाता है,
उसकी रक्षा का दायित्व
मानव तुम पर ही आता है।।
____✍️गीता
*वन प्रकृति की आभा*
Comments
6 responses to “*वन प्रकृति की आभा*”
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प्रकृति से दूर हो रहा मानव
दु:खों से चूर हो रहा मानव,
वन प्रकृति की आभा बढ़ाते ,
शुद्ध पवन दे उम्र बढ़ाते
———- कवि गीता जी की बहुत सुंदर पंक्तियाँ और बहुत बेहतरीन रचना।-
आपकी दी हुई उत्कृष्ट एवं प्रेरक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी
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बहुत खूब
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बहुत-बहुत धन्यवाद सर
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बहुत खूब
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बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी
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